महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
स तद् दिव्यं वनं पश्यन् दिव्यगीतनिनादितम् । प्रविवेश महाबाहुः शक्रस्य दयितां पुरीम् ॥ ७ ॥ जहाँ सब ओर दिव्य संगीत गूँज रहा था, उस दिव्य वनका दर्शन करते हुए महाबाहु अर्जुनने देवराज इन्द्रकी प्रिय नगरी अमरावतीमें प्रवेश किया ॥ ७ ॥
तत्र देवविमानानि कामगानि सहस्रशः । संस्थितान्यभियातानि ददर्शायुतशस्तदा ॥ ८ ॥ संस्तूयमानो गन्धर्वैरप्सरोभिश्च पाण्डवः । पुष्पगन्धवहैः पुण्यैर्वायुभिश्चानुवीजितः ॥ ९ ॥ वहाँ स्वेच्छानुसार गमन करनेवाले देवताओंके सहस्रों विमान स्थिरभावसे खड़े थे और हजारों इधर-उधर आते-जाते थे। उन सबको पाण्डुनन्दन अर्जुनने देखा। उस समय गन्धर्व और अप्सराएँ उनकी स्तुति कर रही थीं। फूलोंकी सुगन्धका भार वहन करनेवाली पवित्र मन्द-मन्द वायु मानो उनके लिये चँवर डुला रही थी ॥ ८-९ ॥
ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः । हृष्टाः सम्पूजयामासुः पार्थमक्लिष्टकारिणम् ॥ १० ॥ तदनन्तर देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों और महर्षियोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुनका स्वागत-सत्कार किया ॥ १० ॥
आशीर्वादैः स्तूयमानो दिव्यवादित्रनिःस्वनैः । प्रतिपेदे महाबाहुः शङ्खदुन्दुभिनादितम् ॥ ११ ॥ नक्षत्रमार्गं विपुलं सुरवीथीति विश्रुतम् । इन्द्राज्ञया ययौ पार्थः स्तूयमानः समन्ततः ॥ १२ ॥ कहीं उन्हें आशीर्वाद मिलता और कहीं स्तुति-प्रशंसा प्राप्त होती थी। स्थान-स्थानपर दिव्य वाद्योंकी मधुर ध्वनिसे उनका स्वागत हो रहा था। इस प्रकार महाबाहु अर्जुन शंख और दुन्दुभियोंके गम्भीर नादसे गूँजते हुए 'सुरवीथी' नामसे प्रसिद्ध विस्तृत नक्षत्र-मार्गपर चलने लगे। इन्द्रकी आज्ञासे कुन्तीकुमारका सब ओर स्तवन हो रहा था और इस प्रकार वे गन्तव्य मार्गपर बढ़ते चले जा रहे थे ॥ ११-१२ ॥
तत्र साध्यास्तथा विश्वे मरुतोऽथाश्विनौ तथा । आदित्या वसवो रुद्रास्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥ १३ ॥ राजर्षयश्च बहवो दिलीपप्रमुखा नृपाः । तुम्बुरुर्नारदश्चैव गन्धर्वौ च हहाहूहूः ॥ १४ ॥ वहाँ साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, आदित्य, वसु, रुद्र तथा विशुद्ध ब्रह्मर्षिगण और अनेक राजर्षिगण एवं दिलीप आदि बहुत-से राजा, तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू आदि गन्धर्वगण विराजमान थे ॥ १३-१४ ॥
तान् स सर्वान् समागम्य विधिवत् कुरुनन्दनः ।
ततोऽपश्यद् देवराजं शतक्रतुमरिंदमः ॥ १५ ॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले कुरुनन्दन अर्जुनने उन सबसे विधिपूर्वक मिलकर अन्तमें सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्रका दर्शन किया ॥ १५ ॥ ततः पार्थो महाबाहुरवतीर्य रथोत्तमात् । ददर्श साक्षाद् देवेशं पितरं पाकशासनम् ॥ १६ ॥ उन्हें देखते ही महाबाहु पार्थ उस उत्तम रथसे उतर पड़े और देवेश्वर पिता पाकशासन (इन्द्र)-को उन्होंने प्रत्यक्ष देखा ॥ १६ ॥ पाण्डुरेणातपत्रेण हेमदण्डेन चारुणा । दिव्यगन्धाधिवासेन व्यजनेन विधूयता ॥ १७ ॥ उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिसमें मनोहर स्वर्णमय दण्ड शोभा पा रहा था। उनके उभय पार्श्वमें दिव्य सुगन्धसे वासित चँवर डुलाये जा रहे थे ॥ १७ ॥ विश्वावसुप्रभृतिभिर्गन्धर्वैः स्तुतिवन्दनैः । स्तूयमानं द्विजाग्र्यैश्च ऋग्यजुःसामसम्भवैः ॥ १८ ॥ विश्वावसु आदि गन्धर्व स्तुति और वन्दनापूर्वक उनके गुण गाते थे। श्रेष्ठ ब्रह्मर्षिगण ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके इन्द्रदेवतासम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा उनका स्तवन कर रहे थे ॥ १८ ॥ ततोऽभिगम्य कौन्तेयः शिरसाभ्यगमद् बली । स चैनं वृत्तपीनाभ्यां बाहुभ्यां प्रत्यगृह्णत ॥ १९ ॥ तदनन्तर बलवान् कुन्तीकुमारने निकट जाकर देवेन्द्रके चरणोंमें मस्तक रख दिया और उन्होंने अपनी गोल-गोल मोटी भुजाओंसे उठाकर अर्जुनको हृदयसे लगा लिया ॥ १९ ॥ ततः शक्रासने पुण्ये देवर्षिगणसेविते । शक्रः पाणौ गृहीत्वैनमुपावेशयदन्तिके ॥ २० ॥ तत्पश्चात् इन्द्रने अर्जुनका हाथ पकड़कर अपने देवर्षिगणसेवित पवित्र सिंहासनपर उन्हें पास ही बिठा लिया ॥ २० ॥ मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय देवेन्द्रः परवीरहा । अङ्कमारोपयामास प्रश्रयावनतं तदा ॥ २१ ॥ तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले देवराजने विनीतभावसे आये हुए अर्जुनका मस्तक सूँघा और उन्हें अपनी गोदमें बिठा लिया ॥ २१ ॥
सहस्राक्षनियोगात् स पार्थः शक्रासनं गतः । अध्यक्रामदमेयात्मा द्वितीय इव वासवः ॥ २२ ॥ उस समय सहस्रनेत्रधारी देवेन्द्रके आदेशसे उनके सिंहासनपर बैठे हुए अपरिमित प्रभावशाली कुन्तीकुमार दूसरे इन्द्रकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ २२ ॥ ततः प्रेम्णा वृत्रशत्रुरर्जुनस्य शुभं मुखम् । पस्पर्श पुण्यगन्धेन करेण परिसान्त्वयन् ॥ २३ ॥ इसके बाद वृत्रासुरके शत्रु इन्द्रने पवित्र गन्धयुक्त हाथसे बड़े प्रेमके साथ अर्जुनको सब प्रकारसे आश्वासन देते हुए उनके सुन्दर मुखका स्पर्श किया ॥ २३ ॥ प्रमार्जमानः शनकैर्बाहू चास्यायतौ शुभौ । ज्याशरक्षेपकठिनौ स्तम्भाविव हिरण्मयौ ॥ २४ ॥ अर्जुनकी सुन्दर विशाल भुजाएँ प्रत्यंचा खींचकर बाण चलानेकी रगड़से कठोर हो गयी थीं। वे देखनेमें सोनेके खंभे-जैसी जान पड़ती थीं। देवराज उन भुजाओंपर धीरे-धीरे हाथ फेरने लगे ॥ २४ ॥ वज्रग्रहणचिह्नेन करेण परिसान्त्वयन् । मुहुर्मुहुर्वज्रधरो बाहू चास्फोटयच्छनैः ॥ २५ ॥
वज्रधारी इन्द्र वज्रधारणजनित चिह्नसे सुशोभित दाहिने हाथसे अर्जुनको बार-बार सान्त्वना देते हुए उनकी भुजाओंको धीरे-धीरे थपथपाने लगे ॥ २५ ॥
स्मयन्निव गुडाकेशं प्रेक्षमाणः सहस्रदृक् ।
हर्षेणोत्फुल्लनयनो न चातृप्यत वृत्रहा ॥ २६ ॥
सहस्र नयनोंसे सुशोभित वृत्रसूदन इन्द्र निद्राविजयी अर्जुनको मुसकराते हुए-से देख रहे थे। उस समय इन्द्रकी आँखें हर्षसे खिल उठी थीं। वे उन्हें देखनेसे तृप्त नहीं होते थे ॥ २६ ॥
एकासनोपविष्टौ तौ शोभयांचक्रतुः सभाम् ।
सूर्याचन्द्रमसौ व्योम चतुर्दश्यामिवोदितौ ॥ २७ ॥
जैसे कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको उदित हुए सूर्य और चन्द्रमा आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार एक सिंहासनपर बैठे हुए देवराज इन्द्र और कुन्तीकुमार अर्जुन देवसभाको सुशोभित कर रहे थे ॥ २७ ॥
तत्र स्म गाथा गायन्ति साम्ना परमवल्गुना ।
गन्धर्वास्तुम्बुरुश्रेष्ठाः कुशला गीतसामसु ॥ २८ ॥
उस समय वहाँ सामगानमें निपुण तुम्बुरु आदि श्रेष्ठ गन्धर्वगण सामगानके नियमानुसार अत्यन्त मधुर स्वरमें गाथागान करने लगे ॥ २८ ॥
घृताची मेनका रम्भा पूर्वचित्तिः स्वयंप्रभा ।
उर्वशी मिश्रकेशी च दण्डगौरी वरूथिनी ॥ २९ ॥
गोपाली सहजन्या च कुम्भयोनिः प्रजागरा ।
चित्रसेना चित्रलेखा सहा च मधुरस्वरा ॥ ३० ॥
एताश्चान्याश्च ननृतुस्तत्र तत्र सहस्रशः ।
चित्तप्रसादने युक्ताः सिद्धानां पद्मलोचनाः ॥ ३१ ॥
महाकटितटश्रोण्यः कम्पमानैः पयोधरैः ।
कटाक्षहावमाधुर्यैश्चेतोबुद्धिमनोहरैः ॥ ३२ ॥
घृताची, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति, स्वयंप्रभा, उर्वशी, मिश्रकेशी, दण्डगौरी, वरूथिनी, गोपाली, सहजन्या, कुम्भयोनि, प्रजागरा, चित्रसेना, चित्रलेखा, सहा और मधुरस्वरा—ये तथा और भी सहस्रों अप्सराएँ वहाँ इन्द्रसभामें भिन्न-भिन्न स्थानोंपर नृत्य करने लगीं। वे कमललोचना अप्सराएँ सिद्ध पुरुषोंके भी चित्तको प्रसन्न करनेमें संलग्न थीं। उनके कटि-प्रदेश और नितम्ब विशाल थे। नृत्य करते समय उनके उन्नत स्तन कम्पमान हो रहे थे। उनके कटाक्ष, हाव-भाव तथा माधुर्य आदि मन, बुद्धि एवं चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अपहरण कर लेते थे ॥ २९—३२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि इन्द्रसभादर्शने
त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें इन्द्रसभादर्शनविषयक तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 338)
चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः
अर्जुनको अस्त्र और संगीतकी शिक्षा
वैशम्पायन उवाच
ततो देवाः सगन्धर्वाः समादायार्घ्यमुत्तमम् ।
शक्रस्य मतमाज्ञाय पार्थमानर्चुरञ्जसा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर देवराज इन्द्रका अभिप्राय जानकर देवताओं और गन्धर्वोंने उत्तम अर्घ्य लेकर कुन्तीकुमार अर्जुनका यथोचित पूजन किया ॥ १ ॥
पाद्यमाचमनीयं च प्रतिग्राह्य नृपात्मजम् ।
प्रवेशयामासुरथो पुरन्दरनिवेशनम् ॥ २ ॥
राजकुमार अर्जुनको पाद्य, (अर्घ्य), आचमनीय आदि उपचार अर्पित करके देवताओंने उन्हें इन्द्रभवनमें पहुँचा दिया ॥ २ ॥
एवं सम्पूजितो जिष्णुरुवास भवने पितुः ।
उपशिक्षन् महास्त्राणि ससंहाराणि पाण्डवः ॥ ३ ॥
इस प्रकार देवसमुदायसे पूजित हो पाण्डुकुमार अर्जुन अपने पिताके घरमें रहने और उनसे उपसंहारसहित महान् अस्त्रोंकी शिक्षा ग्रहण करने लगे ॥ ३ ॥
शक्रस्य हस्ताद् दयितं वज्रमस्त्रं च दुःसहम् ।
अशनीश्च महानादा मेघबर्हिणलक्षणाः ॥ ४ ॥
उन्होंने इन्द्रके हाथसे उनके प्रिय एवं दुःसह अस्त्र वज्र और भारी गड़गड़ाहट पैदा करनेवाली उन अशनियोंको ग्रहण किया, जिनका प्रयोग करनेपर जगत्में मेघोंकी घटा घिर आती और मयूर नृत्य करने लगते हैं ॥ ४ ॥
गृहीतास्त्रस्तु कौन्तेयो भ्रातॄन् सस्मार पाण्डवः ।
पुरन्दरनियोगाच्च पञ्चाब्दानवसत् सुखी ॥ ५ ॥
सब अस्त्रोंकी शिक्षा ग्रहण कर लेनेपर पाण्डुपुत्र पार्थने अपने भाइयोंका स्मरण किया। परंतु पुरन्दरके विशेष अनुरोधसे वे (मानव-गणनाके अनुसार) पाँच वर्षोंतक वहाँ सुखपूर्वक ठहरे रहे ॥ ५ ॥
ततः शक्रोऽब्रवीत् पार्थं कृतास्त्रं काल आगते ।
नृत्यं गीतं च कौन्तेय चित्रसेनादवाप्नुहि ॥ ६ ॥
तदनन्तर इन्द्रने अस्त्रशिक्षामें निपुण कुन्ती-कुमारसे उपयुक्त अवसर आनेपर कहा—'कुन्तीनन्दन! तुम चित्रसेनसे नृत्य और गीतकी शिक्षा ग्रहण कर लो' ॥ ६ ॥
वादित्रं देवविहितं नृलोके यन्न विद्यते ।
तदर्जयस्व कौन्तेय श्रेयो वै ते भविष्यति ॥ ७ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! मनुष्यलोकमें जो अबतक प्रचलित नहीं है, देवताओंकी उस वाद्यकलाका ज्ञान प्राप्त कर लो। इससे तुम्हारा भला होगा' ॥ ७ ॥ सखायं प्रददौ चास्य चित्रसेनं पुरन्दरः । स तेन सह संगम्य रेमे पार्थो निरामयः ॥ ८ ॥ पुरन्दरने अर्जुनको संगीतकी शिक्षा देनेके लिये उन्हींके मित्र चित्रसेनको नियुक्त कर दिया। मित्रसे मिलकर दुःख-शोकसे रहित अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए ॥ ८ ॥ गीतवादित्रनृत्यानि भूय एवादिदेश ह । तथापि नालभच्छर्म तपस्वी द्यूतकारितम् ॥ ९ ॥ चित्रसेनने उन्हें गीत, वाद्य और नृत्यकी बार-बार शिक्षा दी तो भी द्यूतजनित अपमानका स्मरण करके तपस्वी अर्जुनको तनिक भी शान्ति नहीं मिली ॥ ९ ॥ दुःशासनवधामर्षी शकुनेः सौबलस्य च । ततस्तेनातुलां प्रीतिमुपागम्य क्वचित् क्वचित् । गान्धर्वमतुलं नृत्यं वादित्रं चोपलब्धवान् ॥ १० ॥ उन्हें दुःशासन तथा सुबलपुत्र शकुनिके वधके लिये मनमें बड़ा रोष होता था तथा चित्रसेनके सहवाससे कभी-कभी उन्हें अनुपम प्रसन्नता प्राप्त होती थी, जिससे उन्होंने गीत, नृत्य और वाद्यकी उस अनुपम कलाको (पूर्णरूपसे) उपलब्ध कर लिया ॥ १० ॥ स शिक्षितो नृत्यगुणाननेकान् वादित्रगीतार्थगुणांश्च सर्वान् । न शर्म लेभे परवीरहन्ता भ्रातॄन् स्मरन् मातरं चैव कुन्तीम् ॥ ११ ॥ शत्रुवीरोंका हनन करनेवाले वीर अर्जुनने नृत्य-सम्बन्धी अनेक गुणोंकी शिक्षा पायी। वाद्य और गीत-विषयक सभी गुण सीख लिये। तथापि भाइयों और माता कुन्तीका स्मरण करके उन्हें कभी चैन नहीं पड़ता था ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें अर्जुनकी अस्त्रादिशिक्षासे सम्बन्ध रखनेवाला चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 340)
पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
चित्रसेन और उर्वशीका वार्तालाप
वैशम्पायन उवाच
आदावेवाथ तं शक्रश्चित्रसेनं रहोऽब्रवीत् ।
पार्थस्य चक्षुरुर्वश्यां सक्तं विज्ञाय वासवः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! एक समय इन्द्रने अर्जुनके नेत्र उर्वशीके प्रति आसक्त जानकर चित्रसेन गन्धर्वको बुलाया और प्रथम ही एकान्तमें उनसे यह बात कही— ॥ १ ॥
गन्धर्वराज गच्छाद्य प्रहितोऽप्सरसां वराम् ।
उर्वशीं पुरुषव्याघ्र सोपातिष्ठतु फाल्गुनम् ॥ २ ॥
‘गन्धर्वराज! तुम मेरे भेजनेसे आज अप्सराओंमें श्रेष्ठ उर्वशीके पास जाओ। पुरुषश्रेष्ठ! तुम्हें वहाँ भेजनेका उद्देश्य यह है कि उर्वशी अर्जुनकी सेवामें उपस्थित हो ॥ २ ॥
यथार्चितो गृहीतास्त्रो विद्यया मन्नियोगतः ।
तथा त्वया विधातव्यं स्त्रीषु संगविशारदः ॥ ३ ॥
‘जैसे अस्त्रविद्या सीख लेनेके पश्चात् अर्जुनको मेरी आज्ञासे तुमने संगीतविद्याद्वारा सम्मानित किया है, उसी प्रकार वे स्त्रीसंगविशारद हो सकें, ऐसा प्रयत्न करो' ।। ३ ।। एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सोऽनुज्ञां प्राप्य वासवात् । गन्धर्वराजोऽप्सरसमभ्यगादुर्वशीं वराम् ।। ४ ।। इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर ‘तथास्तु’ कहकर उनसे आज्ञा ले गन्धर्वराज चित्रसेन सुन्दरी अप्सरा उर्वशीके पास गये ।। ४ ।। तां दृष्ट्वा विदितो हृष्टः स्वागतेनार्चितस्तया । सुखासीनः सुखासीनां स्मितपूर्वं वचोऽब्रवीत् ।। ५ ।। उससे मिलकर वे बहुत प्रसन्न हुए। उर्वशीने चित्रसेनको आया जान स्वागतपूर्वक उनका सत्कार किया। जब वे आरामसे बैठ गये, तब सुखपूर्वक सुन्दर आसनपर बैठी हुई उर्वशीसे मुसकराकर बोले— ।। ५ ।। विदितं तेऽस्तु सुश्रोणि प्रहितोऽहमिहागतः । त्रिदिवस्यैकराजेन त्वत्प्रसादाभिनन्दिना ।। ६ ।। ‘सुश्रोणि ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि स्वर्गके एकमात्र सम्राट् इन्द्रने, जो तुम्हारे कृपाप्रसादका अभिनन्दन करते हैं, मुझे तुम्हारे पास भेजा है। उन्हींकी आज्ञासे मैं यहाँ आया हूँ ।। ६ ।। यस्तु देवमनुष्येषु प्रख्यातः सहजैर्गुणैः । श्रिया शीलेन रूपेण व्रतेन च दमेन च । प्रख्यातो बलवीर्येण सम्मतः प्रतिभानवान् ।। ७ ।। वर्चस्वी तेजसा युक्तः क्षमावान् वीतमत्सरः । साङ्गोपनिषदान् वेदांश्चतुराख्यानपञ्चमान् ।। ८ ।। योऽधीते गुरुशुश्रूषां मेधां चाष्टगुणाश्रयाम् । ब्रह्मचर्येण दाक्ष्येण प्रसवैर्वयसापि च ।। ९ ।। एको वै रक्षिता चैव त्रिदिवं मघवानिव । अकत्थनो मानयिता स्थूललक्ष्यः प्रियंवदः ।। १० ।। सुहृदश्चान्नपानेन विविधेनाभिवर्षति । सत्यवाक् पूजितो वक्ता रूपवाननहंकृतः ।। ११ ।। भक्तानुकम्पी कान्तश्च प्रियश्च स्थिरसंगरः । प्रार्थनीयैर्गुणगणैर्महेन्द्रवरुणोपमः ।। १२ ।। विदितस्तेऽर्जुनो वीरः स स्वर्गफलमाप्नुयात् । त्वं तु शक्राभ्यनुज्ञाता तस्य पादान्तिकं व्रज । तदेवं कुरु कल्याणि प्रसन्नस्त्वां धनंजयः ।। १३ ।।
'सुन्दरी! जो अपने स्वाभाविक सद्गुण, श्री, शील (स्वभाव), मनोहर रूप, उत्तम व्रत और इन्द्रियसंयमके कारण देवताओं तथा मनुष्योंमें विख्यात हैं। बल और पराक्रमके द्वारा जिनकी सर्वत्र प्रसिद्धि है; जो सबके प्रिय, प्रतिभाशाली, वर्चस्वी, तेजस्वी, क्षमाशील तथा ईर्ष्यारहित हैं, जिन्होंने छहों अंगोंसहित चारों वेदों, उपनिषदों और पंचम वेद (इतिहास-पुराण)-का अध्ययन किया है। जिन्हें गुरुशुश्रूषा तथा आठ गुणोंसे* युक्त मेधाशक्ति प्राप्त है, जो ब्रह्मचर्यपालन, कार्य-दक्षता, संतान तथा युवावस्थाके द्वारा अकेले ही देवराज इन्द्रकी भाँति स्वर्गलोककी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, जो अपने मुँहसे अपने गुणोंकी कभी प्रशंसा नहीं करते, दूसरोंको सम्मान देते, अत्यन्त सूक्ष्म विषयको भी स्थूलकी भाँति शीघ्र ही समझ लेते और सबसे प्रिय वचन बोलते हैं, जो अपने सुहृदोंके लिये नाना प्रकारके अन्न-पानकी वर्षा करते और सदा सत्य बोलते हैं, जिनका सर्वत्र आदर होता है, जो अच्छे वक्ता तथा मनोहर रूपवाले होकर भी अहंकारशून्य हैं, जिनके हृदयमें अपने प्रेमी भक्तोंके लिये अत्यन्त कृपा भरी हुई है, जो कान्तिमान्, प्रिय तथा प्रतिज्ञापालन एवं युद्धमें स्थिरतापूर्वक डटे रहनेवाले हैं, जिनके सद्गुणोंकी दूसरे लोग स्पृहा रखते हैं और उन्हीं गुणोंके कारण जो महेन्द्र और वरुणके समान आदरणीय माने जाते हैं, उन वीरवर अर्जुनको तुम अच्छी तरह जानती हो। उन्हें स्वर्गमें आनेका फल अवश्य मिलना चाहिये। तुम देवराजकी आज्ञाके अनुसार आज अर्जुनके चरणोंके समीप जाओ। कल्याणि! तुम ऐसा प्रयत्न करो, जिससे कुन्तीकुमार धनंजय तुमपर प्रसन्न हों' ।।
एवमुक्ता स्मितं कृत्वा सम्मानं बहु मन्य च ।
प्रत्युवाचोर्वशी प्रीता चित्रसेनमनिन्दिता ।। १४ ।।
चित्रसेनके ऐसा कहनेपर उर्वशीके अधरोंपर मुसकान दौड़ गयी। उसने इस आदेशको अपने लिये बड़ा सम्मान समझा। अनिन्द्या सुन्दरी उर्वशी उस समय अत्यन्त प्रसन्न होकर चित्रसेनसे इस प्रकार बोली— ।। १४ ।।
यस्त्वस्य कथितः सत्यो गुणोद्देशस्त्वया मम ।
तं श्रुत्वाव्यथयं पुंसो वृणुयां किमतोऽर्जुनम् ।। १५ ।।
'गन्धर्वराज! तुमने जो अर्जुनके लेशमात्र गुणोंका मेरे सामने वर्णन किया है, वह सब सत्य है। मैं दूसरे लोगोंके मुखसे भी उनकी प्रशंसा सुनकर उनके लिये व्यथित हो उठी हूँ। अतः इससे अधिक मैं अर्जुनका क्या वरण करूँ?' ।। १५ ।।
महेन्द्रस्य नियोगेन त्वत्तः सम्प्रणयेन च ।
तस्य चाहं गुणौघेन फाल्गुने जातमन्मथा ।
गच्छ त्वं हि यथाकाममागमिष्याम्यहं सुखम् ।। १६ ।।
'महेन्द्रकी आज्ञासे, तुम्हारे प्रेमपूर्ण बर्तावसे तथा अर्जुनके सद्गुणसमुदायसे मेरा उनके प्रति कामभाव हो गया है। अतः अब तुम जाओ। मैं इच्छानुसार सुखपूर्वक उनके स्थानपर यथासमय आऊँगी' ।। १६ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि चित्रसेनोर्वशीसंवादे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें चित्रसेन-उर्वशीसंवादविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४५ ।।
* शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारण, ऊह, अपोह, अर्थविज्ञान तथा तत्त्वविज्ञान—ये बुद्धिके आठ गुण हैं।
अध्याय (पृष्ठ 344)
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
उर्वशीका कामपीडित होकर अर्जुनके पास जाना और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देकर लौट आना
वैशम्पायन उवाच
ततो विसृज्य गन्धर्वं कृतकृत्यं शुचिस्मिता ।
उर्वशी चाकरोत् स्नानं पार्थदर्शनलालसा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर कृतकृत्य हुए गन्धर्वराज चित्रसेनको विदा करके पवित्र मुसकानवाली उर्वशीने अर्जुनसे मिलनेके लिये उत्सुक हो स्नान किया ॥ १ ॥
स्नानालंकरणैर्हृद्यैर्गन्धमाल्यैश्च सुप्रभैः ।
धनंजयस्य रूपेण शरैर्मन्मथचोदितैः ॥ २ ॥
अतिविद्धेन मनसा मन्मथेन प्रदीपिता ।
दिव्यास्तरणसंस्तीर्णे विस्तीर्णे शयनोत्तमे ॥ ३ ॥
चित्तसंकल्पभावेन सुचित्तानन्यमानसा ।
मनोरथेन सम्प्राप्तं रमन्त्येनं हि फाल्गुनम् ॥ ४ ॥
धनंजयके रूप-सौन्दर्यसे प्रभावित उसका हृदय कामदेवके बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल हो चुका था। वह मदनाग्निसे दग्ध हो रही थी। स्नानके पश्चात् उसने चमकीले और मनोभिराम आभूषण धारण किये। सुगन्धित दिव्य पुष्पोंके हारोंसे अपनेको अलंकृत किया। फिर उसने मन-ही-मन संकल्प किया—दिव्य बिछौनोंसे सजी हुई एक सुन्दर विशाल शय्या बिछी हुई है। उसका हृदय सुन्दर तथा प्रियतमके चिन्तनमें एकाग्र था। उसने मनकी भावनाद्वारा ही यह देखा कि कुन्तीकुमार अर्जुन उसके पास आ गये हैं और वह उनके साथ रमण कर रही है ॥ २—४ ॥
निर्गम्य चन्द्रोदयेने विगाढे रजनीमुखे ।
प्रस्थिता सा पृथुश्रोणी पार्थस्य भवनं प्रति ॥ ५ ॥
संध्याको चन्द्रोदय होनेपर जब चारों ओर चाँदनी छिटक गयी, उस समय वह विशाल नितम्बोंवाली अप्सरा अपने भवनसे निकलकर अर्जुनके निवासस्थानकी ओर चली ॥ ५ ॥
मृदुकुञ्चितदीर्घेण कुमुदोत्तरधारिणा ।
केशहस्तेन ललना जगामाथ विराजती ॥ ६ ॥
उसके कोमल, घुँघराले और लम्बे केशोंका समूह वेणीके रूपमें आबद्ध था। उनमें कुमुद-पुष्पोंके गुच्छे लगे हुए थे। इस प्रकार सुशोभित वह ललना अर्जुनके गृहकी ओर बढ़ी
जा रही थी ॥ ६ ॥ भ्रूक्षेपालापमाधुर्यैः कान्त्या सौम्यतयापि च । शशिनं वक्त्रचन्द्रेण साऽऽह्वयन्तीव गच्छति ॥ ७ ॥ भौंहोंकी भंगिमा, वार्तालापकी मधुरिमा, उज्ज्वल कान्ति और सौम्यभावसे सम्पन्न अपने मनोहर मुखचन्द्र-द्वारा वह चन्द्रमाको चुनौती-सी देती हुई इन्द्रभवनके पथपर चल रही थी ॥ ७ ॥ दिव्याङ्गरागौ सुमुखौ दिव्यचन्दनरूषितौ । गच्छन्त्या हाररुचिरौ स्तनौ तस्या ववल्गतुः ॥ ८ ॥ चलते समय सुन्दर हारोंसे विभूषित उर्वशीके उठे हुए स्तन जोर-जोरसे हिल रहे थे। उनपर दिव्य अंगराग लगाये गये थे। उनके अग्रभाग अत्यन्त मनोहर थे। वे दिव्य चन्दनसे चर्चित हो रहे थे ॥ ८ ॥ स्तनोद्वहनसंक्षोभान्नस्यमाना पदे पदे । त्रिवलीदामचित्रेण मध्येनातीवशोभिना ॥ ९ ॥ स्तनोंके भारी भारको वहन करनेके कारण थककर वह पग-पगपर झुकी जाती थी। उसका अत्यन्त सुन्दर मध्यभाग (उदर) त्रिवली रेखासे विचित्र शोभा धारण करता था ॥ ९ ॥ अधो भूधरविस्तीर्णं नितम्बोन्नतपीवरम् । मन्मथायतनं शुभ्रं रसनादामभूषितम् ॥ १० ॥ ऋषीणामपि दिव्यानां मनोव्याघातकारणम् । सूक्ष्मवस्त्रधरं रेजे जघनं निरवद्यवत् ॥ ११ ॥ सुन्दर महीन वस्त्रोंसे आच्छादित उसका जघनप्रदेश अनिन्द्य सौन्दर्यसे सुशोभित हो रहा था। वह कामदेवका उज्ज्वल मन्दिर जान पड़ता था। नाभिके नीचेके भागमें पर्वतके समान विशाल नितम्ब ऊँचा और स्थूल प्रतीत होता था। कटिमें बँधी हुई करधनीकी लड़ियाँ उस जघनप्रदेशको सुशोभित कर रही थीं। वह मनोहर अंग (जघन) देवलोकवासी महर्षियोंके भी चित्तको क्षुब्ध कर देनेवाला था ॥ १०-११ ॥ गूढगुल्फधरौ पादौ ताम्रायततलाङ्गुली । कूर्मपृष्ठोन्नतौ चापि शोभेते किङ्किणीकिणौ ॥ १२ ॥ उसके दोनों चरणोंके गुल्फ (टखने) मांससे छिपे हुए थे। उसके विस्तृत तलवे और अँगुलियाँ लाल रंगकी थीं। वे दोनों पैर कछुएकी पीठके समान ऊँचे होनेके साथ ही घुँघुरुओंके चिह्नसे सुशोभित थे ॥ १२ ॥ सीधुपानेन चाल्पेन तुष्ट्याथ मदनेन च । विलासनैश्च विविधैः प्रेक्षणीयतराभवत् ॥ १३ ॥
वह अल्प सुरापानसे, संतोषसे, कामसे और नाना प्रकारकी विलासिताओंसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त दर्शनीय हो रही थी ॥ १३ ॥ सिद्धचारणगन्धर्वैः सा प्रयाता विलासिनी । बह्वाश्चर्येऽपि वै स्वर्गे दर्शनीयतमाकृतिः ॥ १४ ॥ सुसूक्ष्मेणोत्तरीयेण मेघवर्णेन राजता । तनुरभ्रावृता व्योम्नि चन्द्रलेखेव गच्छति ॥ १५ ॥ जाती हुई उस विलासिनी अप्सराकी आकृति अनेक आश्चर्योंसे भरे हुए स्वर्गलोकमें भी सिद्ध, चारण और गन्धर्वोंके लिये देखनेके ही योग्य हो रही थी। अत्यन्त महीन मेघके समान श्याम रंगकी सुन्दर ओढ़नी ओढ़े तन्वंगी उर्वशी आकाशमें बादलोंसे ढकी हुई चन्द्रलेखा-सी चली जा रही थी ॥ १४-१५ ॥ ततः प्राप्ता क्षणेनैव मनःपवनगामिनी । भवनं पाण्डुपुत्रस्य फाल्गुनस्य शुचिस्मिता ॥ १६ ॥ मन और वायुके समान तीव्र वेगसे चलनेवाली वह पवित्र मुसकानसे सुशोभित अप्सरा क्षणभरमें पाण्डुकुमार अर्जुनके महलमें जा पहुँची ॥ १६ ॥ तत्र द्वारमनुप्राप्ता द्वारस्थैश्च निवेदिता । अर्जुनस्य नरश्रेष्ठ उर्वशी शुभलोचना ॥ १७ ॥ उपातिष्ठत तद् वेश्म निर्मलं सुमनोहरम् । सशङ्कितमना राजन् प्रत्युद्गच्छत तां निशि ॥ १८ ॥ नरश्रेष्ठ जनमेजय! महलके द्वारपर पहुँचकर वह ठहर गयी। उस समय द्वारपालोंने अर्जुनको उसके आगमनकी सूचना दी। तब सुन्दर नेत्रोंवाली उर्वशी रात्रिमें अर्जुनके अत्यन्त मनोहर तथा उज्ज्वल भवनमें उपस्थित हुई। राजन्! अर्जुन सशंक हृदयसे उसके सामने गये ॥ १७-१८ ॥ दृष्ट्वैव चोर्वशीं पार्थो लज्जासंवृतलोचनः । तदाभिवादनं कृत्वा गुरुपूजां प्रयुक्तवान् ॥ १९ ॥ उर्वशीको आयी देख अर्जुनके नेत्र लज्जासे मुँद गये। उस समय उन्होंने उसके चरणोंमें प्रणाम करके उसका गुरुजनोचित सत्कार किया ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच अभिवादये त्वां शिरसा प्रवराप्सरसां वरे । किमाज्ञापयसे देवि प्रेष्यस्तेऽहमुपस्थितः ॥ २० ॥ **अर्जुन बोले—**देवि! श्रेष्ठ अप्सराओंमें भी तुम्हारा सबसे ऊँचा स्थान है। मैं तुम्हारे चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करता हूँ। बताओ, मेरे लिये क्या आज्ञा है? मैं तुम्हारा सेवक हूँ और तुम्हारी आज्ञाका पालन करनेके लिये उपस्थित हूँ ॥ २० ॥
फाल्गुनस्य वचः श्रुत्वा गतसंज्ञा तदोर्वशी ।
गन्धर्ववचनं सर्वं श्रावयामास तं तदा ॥ २१ ॥
अर्जुनकी यह बात सुनकर उर्वशीके होश-हवास गुम हो गये, उस समय उसने गन्धर्वराज चित्रसेनकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं ॥ २१ ॥
उर्वश्युवाच
यथा मे चित्रसेनेन कथितं मनुजोत्तम ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथा चाहमिहागता ॥ २२ ॥
**उर्वशीने कहा—**पुरुषोत्तम! चित्रसेनने मुझे जैसा संदेश दिया है और उसके अनुसार जिस उद्देश्यको लेकर मैं यहाँ आयी हूँ, वह सब मैं तुम्हें बता रही हूँ ॥ २२ ॥
उपस्थाने महेन्द्रस्य वर्तमाने मनोरमे ।
त्वागमनतो वृत्ते स्वर्गस्य परमोत्सवे ॥ २३ ॥
रुद्राणां चैव सांनिध्यमादित्यानां च सर्वशः ।
समागमेऽश्विनोश्चैव वसूनां च नरोत्तम ॥ २४ ॥
महर्षीणां च संघेषु राजर्षिप्रवरेषु च ।
सिद्धचारणयक्षेषु महोरगगणेषु च ॥ २५ ॥
उपविष्टेषु सर्वेषु स्थानमानप्रभावतः ।
ऋद्ध्या प्रज्वलमानेषु अग्निसोमार्कवर्चस्सु ॥ २६ ॥
वीणासु वाद्यमानासु गन्धर्वैः शक्रनन्दन ।
दिव्ये मनोरमे गेये प्रवृत्ते पृथुलोचन ॥ २७ ॥
सर्वाप्सरःसु मुख्यासु प्रनृत्तासु कुरूद्वह ।
त्वं किलानिमिषः पार्थ मामेकां तत्र दृष्टवान् ॥ २८ ॥
देवराज इन्द्रके इस मनोरम निवासस्थानमें तुम्हारे शुभागमनके उपलक्ष्यमें एक महान् उत्सव मनाया गया। यह उत्सव स्वर्गलोकका सबसे बड़ा उत्सव था। उसमें रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार और वसुगण—इन सबका सब ओरसे समागम हुआ था। नरश्रेष्ठ! महर्षिसमुदाय, राजर्षिप्रवर, सिद्ध, चारण, यक्ष तथा बड़े-बड़े नाग—ये सभी अपने पद, सम्मान और प्रभावके अनुसार योग्य आसनोंपर बैठे थे। इन सबके शरीर अग्नि, चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी थे और ये समस्त देवता अपनी अद्भुत समृद्धिसे प्रकाशित हो रहे थे। विशाल नेत्रोंवाले इन्द्रकुमार! उस समय गन्धर्वोंद्वारा अनेक वीणाएँ बजायी जा रही थीं। दिव्य मनोरम संगीत छिड़ा हुआ था और सभी प्रमुख अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। कुरुकुलनन्दन पार्थ! उस समय तुम मेरी ओर निर्निमेष नयनोंसे निहार रहे थे ॥ २३—२८ ॥
तत्र चावभृथे तस्मिन्नुपस्थाने दिवौकसाम् ।
तव पित्राभ्यनुज्ञाता गताः स्वं स्वं गृहं सुराः ॥ २९ ॥
तथैवाप्सरसः सर्वा विशिष्टाः स्वगृहं गताः ।
अपि चान्याश्च शत्रुघ्न तव पित्रा विसर्जिताः ॥ ३० ॥
देवसभामें जब उस महोत्सवकी समाप्ति हुई, तब तुम्हारे पिताकी आज्ञा लेकर सब देवता अपने-अपने भवनको चले गये। शत्रुदमन! इसी प्रकार आपके पितासे विदा लेकर सभी प्रमुख अप्सराएँ तथा दूसरी साधारण अप्सराएँ भी अपने-अपने घरको चली गयीं ॥
ततः शक्रेण संदिष्टश्चित्रसेनो ममान्तिकम् ।
प्राप्तः कमलपत्राक्ष स च मामब्रवीदथ ॥ ३१ ॥
कमलनयन! तदनन्तर देवराज इन्द्रका संदेश लेकर गन्धर्वप्रवर चित्रसेन मेरे पास आये और इस प्रकार बोले— ॥ ३१ ॥
त्वत्कृतेऽहं सुरेशेन प्रेषितो वरवर्णिनि ।
प्रियं कुरु महेन्द्रस्य मम चैवात्मनश्च ह ॥ ३२ ॥
‘वरवर्णिनि! देवेश्वर इन्द्रने तुम्हारे लिये एक संदेश देकर मुझे भेजा है। तुम उसे सुनकर महेन्द्रका, मेरा तथा मुझसे अपना भी प्रिय कार्य करो’ ॥ ३२ ॥
शक्रतुल्यं रणे शूरं सदौदार्यगुणान्वितम् ।
पार्थं प्रार्थय सुश्रोणि त्वमित्येवं तदाब्रवीत् ॥ ३३ ॥
‘सुश्रोणि! जो संग्राममें इन्द्रके समान पराक्रमी और उदारता आदि गुणोंसे सदा सम्पन्न हैं, उन कुन्तीनन्दन अर्जुनकी सेवा तुम स्वीकार करो।’ इस प्रकार चित्रसेनने मुझसे कहा था ॥ ३३ ॥
ततोऽहं समनुज्ञाता तेन पित्रा च तेऽनघ ।
तवान्तिकमनुप्राप्ता शुश्रूषितुमरिंदम ॥ ३४ ॥
अनघ! शत्रुदमन! तदनन्तर चित्रसेन और तुम्हारे पिताकी आज्ञा शिरोधार्य करके मैं तुम्हारी सेवाके लिये तुम्हारे पास आयी हूँ ॥ ३४ ॥
त्वद्गुणाकृष्टचित्ताहमनङ्गवशमागता ।
चिराभिलषितो वीर ममाप्येष मनोरथः ॥ ३५ ॥
तुम्हारे गुणोंने मेरे चित्तको अपनी ओर खींच लिया है। मैं कामदेवके वशमें हो गयी हूँ। वीर! मेरे हृदयमें भी चिरकालसे यह मनोरथ चला आ रहा था ॥ ३५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तां तथा ब्रुवतीं श्रुत्वा भृशं लज्जाऽऽवृतोऽर्जुनः ।
उवाच कर्णौ हस्ताभ्यां पिधाय त्रिदशालये ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! स्वर्गलोकमें उर्वशीकी यह बात सुनकर अर्जुन अत्यन्त लज्जासे गड़ गये और हाथोंसे दोनों कान मूँदकर बोले— ॥ ३६ ॥
दुःश्रुतं मेऽस्तु सुभगे यन्मां वदसि भाविनि । गुरुदारैः समाना मे निश्चयेन वरानने ॥ ३७ ॥ ‘सौभाग्यशालिनि! भाविनि! तुम जैसी बात कह रही हो, उसे सुनना भी मेरे लिये बड़े दुःखकी बात है। वरानने! निश्चय ही तुम मेरी दृष्टिमें गुरुपत्नियोंके समान पूजनीया हो ॥ ३७ ॥
यथा कुन्ती महाभागा यथेन्द्राणी शची मम । तथा त्वमपि कल्याणि नात्र कार्या विचारणा ॥ ३८ ॥ ‘कल्याणि! मेरे लिये जैसी महाभागा कुन्ती और इन्द्राणी शची हैं, वैसी ही तुम भी हो। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ३८ ॥
यच्चेक्षितासि विस्पष्टं विशेषेण मया शुभे । तच्च कारणपूर्वं हि शृणु सत्यं शुचिस्मिते ॥ ३९ ॥ ‘शुभे! पवित्र मुसकानवाली उर्वशी! मैंने जो उस समय सभामें तुम्हारी ओर एकटक दृष्टिसे देखा था, उसका एक विशेष कारण था, उसे सत्य बताता हूँ सुनो— ॥ ३९ ॥
इयं पौरववंशस्य जननी मुदितेति ह । त्वामहं दृष्टवांस्तत्र विज्ञायोत्फुल्ललोचनः ॥ ४० ॥ न मामर्हसि कल्याणि अन्यथा ध्यातुमप्सरः । गुरोर्गुरुतरा मे त्वं मम त्वं वंशवर्धिनी ॥ ४१ ॥ ‘यह आनन्दमयी उर्वशी ही पूरुवंशकी जननी है, ऐसा समझकर मेरे नेत्र खिल उठे और इस पूज्य भावको लेकर ही मैंने तुम्हें वहाँ देखा था। कल्याणमयी अप्सरा! तुम मेरे विषयमें कोई अन्यथा भाव मनमें न लाओ। तुम मेरे वंशकी वृद्धि करनेवाली हो, अतः गुरुसे भी अधिक गौरवशालिनी हो’ ॥ ४०-४१ ॥
उर्वश्युवाच
अनावृताश्च सर्वाः स्म देवराजाभिनन्दन । गुरुस्थाने न मां वीर नियोक्तुं त्वमिहार्हसि ॥ ४२ ॥ उर्वशीने कहा—वीर देवराजनन्दन! हम सब अप्सराएँ स्वर्गवासियोंके लिये अनावृत हैं—हमारा किसीके साथ कोई पर्दा नहीं है। अतः तुम मुझे गुरुजनके स्थानपर नियुक्त न करो ॥ ४२ ॥
पूरोर्वंशे हि ये पुत्रा नप्तारो वा त्विहागताः । तपसा रमयन्त्यस्मान् न च तेषां व्यतिक्रमः ॥ ४३ ॥ तद् प्रसीद न मामार्तां विसर्जयितुमर्हसि । हृच्छयेन च संतप्तं भक्तां च भज मानद ॥ ४४ ॥
पुरूवंशके कितने ही पोते-नाती तपस्या करके यहाँ आते हैं और वे हम सब अप्सराओंके साथ रमण करते हैं। इसमें उनका कोई अपराध नहीं समझा जाता। मानद! मुझपर प्रसन्न होओ। मैं कामवेदनासे पीड़ित हूँ, मेरा त्याग न करो। मैं तुम्हारी भक्त हूँ और मदनाग्निसे दग्ध हो रही हूँ; अतः मुझे अंगीकार करो ।। ४३-४४ ।।
अर्जुन उवाच
शृणु सत्यं वरारोहे यत् त्वां वक्ष्याम्यनिन्दिते ।
शृण्वन्तु मे दिशश्चैव विदिशश्च सदेवताः ।। ४५ ।।
**अर्जुनने कहा—**वरारोहे! अनिन्दिते! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, मेरे उस सत्य वचनको सुनो। ये दिशा, विदिशा तथा उनकी अधिष्ठात्री देवियाँ भी सुन लें ।। ४५ ।।
यथा कुन्ती च माद्री च शची चैव ममानघे ।
तथा च वंशजननी त्वं हि मेऽद्य गरीयसी ।। ४६ ।।
अनघे! मेरी दृष्टिमें कुन्ती, माद्री और शचीका जो स्थान है, वही तुम्हारा भी है। तुम पुरुवंशकी जननी होनेके कारण आज मेरे लिये परम गुरुस्वरूप हो ।। ४६ ।।
गच्छ मूर्ध्ना प्रपन्नोऽस्मि पादौ ते वरवर्णिनि ।
त्वं हि मे मातृवत् पूज्या रक्ष्योऽहं पुत्रवत् त्वया ।। ४७ ।।
वरवर्णिनि! मैं तुम्हारे चरणोंमें मस्तक रखकर तुम्हारी शरणमें आया हूँ। तुम लौट जाओ। मेरी दृष्टिमें तुम माताके समान पूजनीया हो और तुम्हें पुत्रके समान मानकर मेरी रक्षा करनी चाहिये ।। ४७ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता तु पार्थेन उर्वशी क्रोधमूर्च्छिता ।
वेपन्ती भ्रुकुटीवक्रा शशापाथ धनंजयम् ।। ४८ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कुन्तीकुमार अर्जुनके ऐसा कहनेपर उर्वशी क्रोधसे व्याकुल हो उठी। उसका शरीर काँपने लगा और भौंहें टेढ़ी हो गयीं। उसने अर्जुनको शाप देते हुए कहा ।। ४८ ।।
उर्वश्युवाच
तव पित्राभ्यनुज्ञातां स्वयं च गृहमागताम् । यस्मान्मां नाभिनन्देथाः कामबाणवशंगताम् ॥ ४९ ॥ तस्मात् त्वं नर्तनः पार्थ स्त्रीमध्ये मानवर्जितः । अपुमानिति विख्यातः षण्ढवद् विचरिष्यसि ॥ ५० ॥ उर्वशी बोली— अर्जुन! तुम्हारे पिता इन्द्रके कहनेसे मैं स्वयं तुम्हारे घरपर आयी और कामबाणसे घायल हो रही हूँ, फिर भी तुम मेरा आदर नहीं करते। अतः तुम्हें स्त्रियोंके बीचमें सम्मानरहित होकर नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। तुम नपुंसक कहलाओगे और तुम्हारा सारा आचार-व्यवहार हिजड़ोंके ही समान होगा ॥ ४९-५० ॥
एवं दत्त्वार्जुने शापं स्फुरदोष्ठी श्वसन्त्यथ । पुनः प्रत्यागता क्षिप्रमुर्वशी गृहमात्मनः ॥ ५१ ॥ फड़कते हुए ओठोंसे इस प्रकार शाप देकर उर्वशी लंबी साँसें खींचती हुई पुनः शीघ्र ही अपने घरको लौट गयी ॥ ५१ ॥
ततोऽर्जुनस्त्वरमाणश्चित्रसेनमरिंदमः । सम्प्राप्य रजनीवृत्तं तदुर्वश्या यथातथम् ॥ ५२ ॥ निवेदयामास तदा चित्रसेनाय पाण्डवः । तत्र चैवं यथावृत्तं शापं चैव पुनः पुनः ॥ ५३ ॥
तदनन्तर शत्रुदमन पाण्डुकुमार अर्जुन बड़ी उतावलीके साथ चित्रसेनके समीप गये तथा रातमें उर्वशीके साथ जो घटना जिस प्रकार घटित हुई, वह सब उन्होंने उस समय चित्रसेनको ज्यों-की-त्यों कह सुनायी। साथ ही उसके शाप देनेकी बात भी उन्होंने बार-बार दुहरायी ॥ ५२-५३ ॥
अवेदयच्च शक्रस्य चित्रसेनोऽपि सर्वशः ।
तत आनाय्य तनयं विविक्ते हरिवाहनः ॥ ५४ ॥
सान्त्वयित्वा शुभैर्वाक्यैः स्मयमानोऽभ्यभाषत ।
सुपुत्राद्य पृथा तात त्वया पुत्रेण सत्तम ॥ ५५ ॥
चित्रसेनने भी सारी घटना देवराज इन्द्रसे निवेदन की। तब इन्द्रने अपने पुत्र अर्जुनको बुलाकर एकान्तमें कल्याणमय वचनोंद्वारा सान्त्वना देते हुए मुसकराकर उनसे कहा—'तात! तुम सत्पुरुषोंके शिरोमणि हो, तुम-जैसे पुत्रको पाकर कुन्ती वास्तवमें श्रेष्ठ पुत्रवाली है' ॥
ऋषयोऽपि हि धैर्येण जिता वै ते महाभुज ।
यत् तु दत्तवती शापमुर्वशी तव मानद ॥ ५६ ॥
स चापि तेऽर्थकृत् तात साधकश्च भविष्यति ॥ ५७ ॥
अज्ञातवासो वस्तव्यो भवद्भिर्भूतलेऽनघ ।
वर्षे त्रयोदशे वीर तत्र त्वं क्षपयिष्यसि ॥ ५८ ॥
'महाबाहो! तुमने अपने धैर्य (इन्द्रियसंयम)-के द्वारा ऋषियोंको भी पराजित कर दिया है। मानद! उर्वशीने जो तुम्हें शाप दिया है, वह तुम्हारे अभीष्ट अर्थका साधक होगा। अनघ! तुम्हें भूतलपर तेरहवें वर्षमें अज्ञातवास करना है। वीर! उर्वशीके दिये हुए शापको तुम उसी वर्षमें पूर्ण कर दोगे' ॥ ५६—५८ ॥
तेन नर्तनवेषेण अपुंस्त्वेन तथैव च ।
वर्षमेकं विहृत्यैव ततः पुंस्त्वमवाप्स्यसि ॥ ५९ ॥
'नर्तक वेष और नपुंसक भावसे एक वर्षतक इच्छानुसार विचरण करके तुम फिर अपना पुरुषत्व प्राप्त कर लोगे' ॥ ५९ ॥
एवमुक्तस्तु शक्रेण फाल्गुनः परवीरहा ।
मुदं परमिकां लेभे न च शापं व्यचिन्तयत् ॥ ६० ॥
इन्द्रके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर तो उन्हें शापकी चिन्ता छूट गयी ॥ ६० ॥
चित्रसेनेन सहितो गन्धर्वेण यशस्विना ।
रेमे स स्वर्गभवने पाण्डुपुत्रो धनंजयः ॥ ६१ ॥
पाण्डुपुत्र धनंजय महायशस्वी गन्धर्व चित्रसेनके साथ स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ६१ ॥