महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 346, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह अल्प सुरापानसे, संतोषसे, कामसे और नाना प्रकारकी विलासिताओंसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त दर्शनीय हो रही थी ॥ १३ ॥ सिद्धचारणगन्धर्वैः सा प्रयाता विलासिनी । बह्वाश्चर्येऽपि वै स्वर्गे दर्शनीयतमाकृतिः ॥ १४ ॥ सुसूक्ष्मेणोत्तरीयेण मेघवर्णेन राजता । तनुरभ्रावृता व्योम्नि चन्द्रलेखेव गच्छति ॥ १५ ॥ जाती हुई उस विलासिनी अप्सराकी आकृति अनेक आश्चर्योंसे भरे हुए स्वर्गलोकमें भी सिद्ध, चारण और गन्धर्वोंके लिये देखनेके ही योग्य हो रही थी। अत्यन्त महीन मेघके समान श्याम रंगकी सुन्दर ओढ़नी ओढ़े तन्वंगी उर्वशी आकाशमें बादलोंसे ढकी हुई चन्द्रलेखा-सी चली जा रही थी ॥ १४-१५ ॥ ततः प्राप्ता क्षणेनैव मनःपवनगामिनी । भवनं पाण्डुपुत्रस्य फाल्गुनस्य शुचिस्मिता ॥ १६ ॥ मन और वायुके समान तीव्र वेगसे चलनेवाली वह पवित्र मुसकानसे सुशोभित अप्सरा क्षणभरमें पाण्डुकुमार अर्जुनके महलमें जा पहुँची ॥ १६ ॥ तत्र द्वारमनुप्राप्ता द्वारस्थैश्च निवेदिता । अर्जुनस्य नरश्रेष्ठ उर्वशी शुभलोचना ॥ १७ ॥ उपातिष्ठत तद् वेश्म निर्मलं सुमनोहरम् । सशङ्कितमना राजन् प्रत्युद्गच्छत तां निशि ॥ १८ ॥ नरश्रेष्ठ जनमेजय! महलके द्वारपर पहुँचकर वह ठहर गयी। उस समय द्वारपालोंने अर्जुनको उसके आगमनकी सूचना दी। तब सुन्दर नेत्रोंवाली उर्वशी रात्रिमें अर्जुनके अत्यन्त मनोहर तथा उज्ज्वल भवनमें उपस्थित हुई। राजन्! अर्जुन सशंक हृदयसे उसके सामने गये ॥ १७-१८ ॥ दृष्ट्वैव चोर्वशीं पार्थो लज्जासंवृतलोचनः । तदाभिवादनं कृत्वा गुरुपूजां प्रयुक्तवान् ॥ १९ ॥ उर्वशीको आयी देख अर्जुनके नेत्र लज्जासे मुँद गये। उस समय उन्होंने उसके चरणोंमें प्रणाम करके उसका गुरुजनोचित सत्कार किया ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच अभिवादये त्वां शिरसा प्रवराप्सरसां वरे । किमाज्ञापयसे देवि प्रेष्यस्तेऽहमुपस्थितः ॥ २० ॥ **अर्जुन बोले—**देवि! श्रेष्ठ अप्सराओंमें भी तुम्हारा सबसे ऊँचा स्थान है। मैं तुम्हारे चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करता हूँ। बताओ, मेरे लिये क्या आज्ञा है? मैं तुम्हारा सेवक हूँ और तुम्हारी आज्ञाका पालन करनेके लिये उपस्थित हूँ ॥ २० ॥