महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
वह अल्प सुरापानसे, संतोषसे, कामसे और नाना प्रकारकी विलासिताओंसे युक्त होनेके कारण अत्यन्त दर्शनीय हो रही थी ॥ १३ ॥ सिद्धचारणगन्धर्वैः सा प्रयाता विलासिनी । बह्वाश्चर्येऽपि वै स्वर्गे दर्शनीयतमाकृतिः ॥ १४ ॥ सुसूक्ष्मेणोत्तरीयेण मेघवर्णेन राजता । तनुरभ्रावृता व्योम्नि चन्द्रलेखेव गच्छति ॥ १५ ॥ जाती हुई उस विलासिनी अप्सराकी आकृति अनेक आश्चर्योंसे भरे हुए स्वर्गलोकमें भी सिद्ध, चारण और गन्धर्वोंके लिये देखनेके ही योग्य हो रही थी। अत्यन्त महीन मेघके समान श्याम रंगकी सुन्दर ओढ़नी ओढ़े तन्वंगी उर्वशी आकाशमें बादलोंसे ढकी हुई चन्द्रलेखा-सी चली जा रही थी ॥ १४-१५ ॥ ततः प्राप्ता क्षणेनैव मनःपवनगामिनी । भवनं पाण्डुपुत्रस्य फाल्गुनस्य शुचिस्मिता ॥ १६ ॥ मन और वायुके समान तीव्र वेगसे चलनेवाली वह पवित्र मुसकानसे सुशोभित अप्सरा क्षणभरमें पाण्डुकुमार अर्जुनके महलमें जा पहुँची ॥ १६ ॥ तत्र द्वारमनुप्राप्ता द्वारस्थैश्च निवेदिता । अर्जुनस्य नरश्रेष्ठ उर्वशी शुभलोचना ॥ १७ ॥ उपातिष्ठत तद् वेश्म निर्मलं सुमनोहरम् । सशङ्कितमना राजन् प्रत्युद्गच्छत तां निशि ॥ १८ ॥ नरश्रेष्ठ जनमेजय! महलके द्वारपर पहुँचकर वह ठहर गयी। उस समय द्वारपालोंने अर्जुनको उसके आगमनकी सूचना दी। तब सुन्दर नेत्रोंवाली उर्वशी रात्रिमें अर्जुनके अत्यन्त मनोहर तथा उज्ज्वल भवनमें उपस्थित हुई। राजन्! अर्जुन सशंक हृदयसे उसके सामने गये ॥ १७-१८ ॥ दृष्ट्वैव चोर्वशीं पार्थो लज्जासंवृतलोचनः । तदाभिवादनं कृत्वा गुरुपूजां प्रयुक्तवान् ॥ १९ ॥ उर्वशीको आयी देख अर्जुनके नेत्र लज्जासे मुँद गये। उस समय उन्होंने उसके चरणोंमें प्रणाम करके उसका गुरुजनोचित सत्कार किया ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच अभिवादये त्वां शिरसा प्रवराप्सरसां वरे । किमाज्ञापयसे देवि प्रेष्यस्तेऽहमुपस्थितः ॥ २० ॥ **अर्जुन बोले—**देवि! श्रेष्ठ अप्सराओंमें भी तुम्हारा सबसे ऊँचा स्थान है। मैं तुम्हारे चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करता हूँ। बताओ, मेरे लिये क्या आज्ञा है? मैं तुम्हारा सेवक हूँ और तुम्हारी आज्ञाका पालन करनेके लिये उपस्थित हूँ ॥ २० ॥
फाल्गुनस्य वचः श्रुत्वा गतसंज्ञा तदोर्वशी ।
गन्धर्ववचनं सर्वं श्रावयामास तं तदा ॥ २१ ॥
अर्जुनकी यह बात सुनकर उर्वशीके होश-हवास गुम हो गये, उस समय उसने गन्धर्वराज चित्रसेनकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं ॥ २१ ॥
उर्वश्युवाच
यथा मे चित्रसेनेन कथितं मनुजोत्तम ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथा चाहमिहागता ॥ २२ ॥
**उर्वशीने कहा—**पुरुषोत्तम! चित्रसेनने मुझे जैसा संदेश दिया है और उसके अनुसार जिस उद्देश्यको लेकर मैं यहाँ आयी हूँ, वह सब मैं तुम्हें बता रही हूँ ॥ २२ ॥
उपस्थाने महेन्द्रस्य वर्तमाने मनोरमे ।
त्वागमनतो वृत्ते स्वर्गस्य परमोत्सवे ॥ २३ ॥
रुद्राणां चैव सांनिध्यमादित्यानां च सर्वशः ।
समागमेऽश्विनोश्चैव वसूनां च नरोत्तम ॥ २४ ॥
महर्षीणां च संघेषु राजर्षिप्रवरेषु च ।
सिद्धचारणयक्षेषु महोरगगणेषु च ॥ २५ ॥
उपविष्टेषु सर्वेषु स्थानमानप्रभावतः ।
ऋद्ध्या प्रज्वलमानेषु अग्निसोमार्कवर्चस्सु ॥ २६ ॥
वीणासु वाद्यमानासु गन्धर्वैः शक्रनन्दन ।
दिव्ये मनोरमे गेये प्रवृत्ते पृथुलोचन ॥ २७ ॥
सर्वाप्सरःसु मुख्यासु प्रनृत्तासु कुरूद्वह ।
त्वं किलानिमिषः पार्थ मामेकां तत्र दृष्टवान् ॥ २८ ॥
देवराज इन्द्रके इस मनोरम निवासस्थानमें तुम्हारे शुभागमनके उपलक्ष्यमें एक महान् उत्सव मनाया गया। यह उत्सव स्वर्गलोकका सबसे बड़ा उत्सव था। उसमें रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार और वसुगण—इन सबका सब ओरसे समागम हुआ था। नरश्रेष्ठ! महर्षिसमुदाय, राजर्षिप्रवर, सिद्ध, चारण, यक्ष तथा बड़े-बड़े नाग—ये सभी अपने पद, सम्मान और प्रभावके अनुसार योग्य आसनोंपर बैठे थे। इन सबके शरीर अग्नि, चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी थे और ये समस्त देवता अपनी अद्भुत समृद्धिसे प्रकाशित हो रहे थे। विशाल नेत्रोंवाले इन्द्रकुमार! उस समय गन्धर्वोंद्वारा अनेक वीणाएँ बजायी जा रही थीं। दिव्य मनोरम संगीत छिड़ा हुआ था और सभी प्रमुख अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं। कुरुकुलनन्दन पार्थ! उस समय तुम मेरी ओर निर्निमेष नयनोंसे निहार रहे थे ॥ २३—२८ ॥
तत्र चावभृथे तस्मिन्नुपस्थाने दिवौकसाम् ।
तव पित्राभ्यनुज्ञाता गताः स्वं स्वं गृहं सुराः ॥ २९ ॥
तथैवाप्सरसः सर्वा विशिष्टाः स्वगृहं गताः ।
अपि चान्याश्च शत्रुघ्न तव पित्रा विसर्जिताः ॥ ३० ॥
देवसभामें जब उस महोत्सवकी समाप्ति हुई, तब तुम्हारे पिताकी आज्ञा लेकर सब देवता अपने-अपने भवनको चले गये। शत्रुदमन! इसी प्रकार आपके पितासे विदा लेकर सभी प्रमुख अप्सराएँ तथा दूसरी साधारण अप्सराएँ भी अपने-अपने घरको चली गयीं ॥
ततः शक्रेण संदिष्टश्चित्रसेनो ममान्तिकम् ।
प्राप्तः कमलपत्राक्ष स च मामब्रवीदथ ॥ ३१ ॥
कमलनयन! तदनन्तर देवराज इन्द्रका संदेश लेकर गन्धर्वप्रवर चित्रसेन मेरे पास आये और इस प्रकार बोले— ॥ ३१ ॥
त्वत्कृतेऽहं सुरेशेन प्रेषितो वरवर्णिनि ।
प्रियं कुरु महेन्द्रस्य मम चैवात्मनश्च ह ॥ ३२ ॥
‘वरवर्णिनि! देवेश्वर इन्द्रने तुम्हारे लिये एक संदेश देकर मुझे भेजा है। तुम उसे सुनकर महेन्द्रका, मेरा तथा मुझसे अपना भी प्रिय कार्य करो’ ॥ ३२ ॥
शक्रतुल्यं रणे शूरं सदौदार्यगुणान्वितम् ।
पार्थं प्रार्थय सुश्रोणि त्वमित्येवं तदाब्रवीत् ॥ ३३ ॥
‘सुश्रोणि! जो संग्राममें इन्द्रके समान पराक्रमी और उदारता आदि गुणोंसे सदा सम्पन्न हैं, उन कुन्तीनन्दन अर्जुनकी सेवा तुम स्वीकार करो।’ इस प्रकार चित्रसेनने मुझसे कहा था ॥ ३३ ॥
ततोऽहं समनुज्ञाता तेन पित्रा च तेऽनघ ।
तवान्तिकमनुप्राप्ता शुश्रूषितुमरिंदम ॥ ३४ ॥
अनघ! शत्रुदमन! तदनन्तर चित्रसेन और तुम्हारे पिताकी आज्ञा शिरोधार्य करके मैं तुम्हारी सेवाके लिये तुम्हारे पास आयी हूँ ॥ ३४ ॥
त्वद्गुणाकृष्टचित्ताहमनङ्गवशमागता ।
चिराभिलषितो वीर ममाप्येष मनोरथः ॥ ३५ ॥
तुम्हारे गुणोंने मेरे चित्तको अपनी ओर खींच लिया है। मैं कामदेवके वशमें हो गयी हूँ। वीर! मेरे हृदयमें भी चिरकालसे यह मनोरथ चला आ रहा था ॥ ३५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तां तथा ब्रुवतीं श्रुत्वा भृशं लज्जाऽऽवृतोऽर्जुनः ।
उवाच कर्णौ हस्ताभ्यां पिधाय त्रिदशालये ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! स्वर्गलोकमें उर्वशीकी यह बात सुनकर अर्जुन अत्यन्त लज्जासे गड़ गये और हाथोंसे दोनों कान मूँदकर बोले— ॥ ३६ ॥
दुःश्रुतं मेऽस्तु सुभगे यन्मां वदसि भाविनि । गुरुदारैः समाना मे निश्चयेन वरानने ॥ ३७ ॥ ‘सौभाग्यशालिनि! भाविनि! तुम जैसी बात कह रही हो, उसे सुनना भी मेरे लिये बड़े दुःखकी बात है। वरानने! निश्चय ही तुम मेरी दृष्टिमें गुरुपत्नियोंके समान पूजनीया हो ॥ ३७ ॥
यथा कुन्ती महाभागा यथेन्द्राणी शची मम । तथा त्वमपि कल्याणि नात्र कार्या विचारणा ॥ ३८ ॥ ‘कल्याणि! मेरे लिये जैसी महाभागा कुन्ती और इन्द्राणी शची हैं, वैसी ही तुम भी हो। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ३८ ॥
यच्चेक्षितासि विस्पष्टं विशेषेण मया शुभे । तच्च कारणपूर्वं हि शृणु सत्यं शुचिस्मिते ॥ ३९ ॥ ‘शुभे! पवित्र मुसकानवाली उर्वशी! मैंने जो उस समय सभामें तुम्हारी ओर एकटक दृष्टिसे देखा था, उसका एक विशेष कारण था, उसे सत्य बताता हूँ सुनो— ॥ ३९ ॥
इयं पौरववंशस्य जननी मुदितेति ह । त्वामहं दृष्टवांस्तत्र विज्ञायोत्फुल्ललोचनः ॥ ४० ॥ न मामर्हसि कल्याणि अन्यथा ध्यातुमप्सरः । गुरोर्गुरुतरा मे त्वं मम त्वं वंशवर्धिनी ॥ ४१ ॥ ‘यह आनन्दमयी उर्वशी ही पूरुवंशकी जननी है, ऐसा समझकर मेरे नेत्र खिल उठे और इस पूज्य भावको लेकर ही मैंने तुम्हें वहाँ देखा था। कल्याणमयी अप्सरा! तुम मेरे विषयमें कोई अन्यथा भाव मनमें न लाओ। तुम मेरे वंशकी वृद्धि करनेवाली हो, अतः गुरुसे भी अधिक गौरवशालिनी हो’ ॥ ४०-४१ ॥
उर्वश्युवाच
अनावृताश्च सर्वाः स्म देवराजाभिनन्दन । गुरुस्थाने न मां वीर नियोक्तुं त्वमिहार्हसि ॥ ४२ ॥ उर्वशीने कहा—वीर देवराजनन्दन! हम सब अप्सराएँ स्वर्गवासियोंके लिये अनावृत हैं—हमारा किसीके साथ कोई पर्दा नहीं है। अतः तुम मुझे गुरुजनके स्थानपर नियुक्त न करो ॥ ४२ ॥
पूरोर्वंशे हि ये पुत्रा नप्तारो वा त्विहागताः । तपसा रमयन्त्यस्मान् न च तेषां व्यतिक्रमः ॥ ४३ ॥ तद् प्रसीद न मामार्तां विसर्जयितुमर्हसि । हृच्छयेन च संतप्तं भक्तां च भज मानद ॥ ४४ ॥
पुरूवंशके कितने ही पोते-नाती तपस्या करके यहाँ आते हैं और वे हम सब अप्सराओंके साथ रमण करते हैं। इसमें उनका कोई अपराध नहीं समझा जाता। मानद! मुझपर प्रसन्न होओ। मैं कामवेदनासे पीड़ित हूँ, मेरा त्याग न करो। मैं तुम्हारी भक्त हूँ और मदनाग्निसे दग्ध हो रही हूँ; अतः मुझे अंगीकार करो ।। ४३-४४ ।।
अर्जुन उवाच
शृणु सत्यं वरारोहे यत् त्वां वक्ष्याम्यनिन्दिते ।
शृण्वन्तु मे दिशश्चैव विदिशश्च सदेवताः ।। ४५ ।।
**अर्जुनने कहा—**वरारोहे! अनिन्दिते! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, मेरे उस सत्य वचनको सुनो। ये दिशा, विदिशा तथा उनकी अधिष्ठात्री देवियाँ भी सुन लें ।। ४५ ।।
यथा कुन्ती च माद्री च शची चैव ममानघे ।
तथा च वंशजननी त्वं हि मेऽद्य गरीयसी ।। ४६ ।।
अनघे! मेरी दृष्टिमें कुन्ती, माद्री और शचीका जो स्थान है, वही तुम्हारा भी है। तुम पुरुवंशकी जननी होनेके कारण आज मेरे लिये परम गुरुस्वरूप हो ।। ४६ ।।
गच्छ मूर्ध्ना प्रपन्नोऽस्मि पादौ ते वरवर्णिनि ।
त्वं हि मे मातृवत् पूज्या रक्ष्योऽहं पुत्रवत् त्वया ।। ४७ ।।
वरवर्णिनि! मैं तुम्हारे चरणोंमें मस्तक रखकर तुम्हारी शरणमें आया हूँ। तुम लौट जाओ। मेरी दृष्टिमें तुम माताके समान पूजनीया हो और तुम्हें पुत्रके समान मानकर मेरी रक्षा करनी चाहिये ।। ४७ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता तु पार्थेन उर्वशी क्रोधमूर्च्छिता ।
वेपन्ती भ्रुकुटीवक्रा शशापाथ धनंजयम् ।। ४८ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कुन्तीकुमार अर्जुनके ऐसा कहनेपर उर्वशी क्रोधसे व्याकुल हो उठी। उसका शरीर काँपने लगा और भौंहें टेढ़ी हो गयीं। उसने अर्जुनको शाप देते हुए कहा ।। ४८ ।।
उर्वश्युवाच
तव पित्राभ्यनुज्ञातां स्वयं च गृहमागताम् । यस्मान्मां नाभिनन्देथाः कामबाणवशंगताम् ॥ ४९ ॥ तस्मात् त्वं नर्तनः पार्थ स्त्रीमध्ये मानवर्जितः । अपुमानिति विख्यातः षण्ढवद् विचरिष्यसि ॥ ५० ॥ उर्वशी बोली— अर्जुन! तुम्हारे पिता इन्द्रके कहनेसे मैं स्वयं तुम्हारे घरपर आयी और कामबाणसे घायल हो रही हूँ, फिर भी तुम मेरा आदर नहीं करते। अतः तुम्हें स्त्रियोंके बीचमें सम्मानरहित होकर नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। तुम नपुंसक कहलाओगे और तुम्हारा सारा आचार-व्यवहार हिजड़ोंके ही समान होगा ॥ ४९-५० ॥
एवं दत्त्वार्जुने शापं स्फुरदोष्ठी श्वसन्त्यथ । पुनः प्रत्यागता क्षिप्रमुर्वशी गृहमात्मनः ॥ ५१ ॥ फड़कते हुए ओठोंसे इस प्रकार शाप देकर उर्वशी लंबी साँसें खींचती हुई पुनः शीघ्र ही अपने घरको लौट गयी ॥ ५१ ॥
ततोऽर्जुनस्त्वरमाणश्चित्रसेनमरिंदमः । सम्प्राप्य रजनीवृत्तं तदुर्वश्या यथातथम् ॥ ५२ ॥ निवेदयामास तदा चित्रसेनाय पाण्डवः । तत्र चैवं यथावृत्तं शापं चैव पुनः पुनः ॥ ५३ ॥
तदनन्तर शत्रुदमन पाण्डुकुमार अर्जुन बड़ी उतावलीके साथ चित्रसेनके समीप गये तथा रातमें उर्वशीके साथ जो घटना जिस प्रकार घटित हुई, वह सब उन्होंने उस समय चित्रसेनको ज्यों-की-त्यों कह सुनायी। साथ ही उसके शाप देनेकी बात भी उन्होंने बार-बार दुहरायी ॥ ५२-५३ ॥
अवेदयच्च शक्रस्य चित्रसेनोऽपि सर्वशः ।
तत आनाय्य तनयं विविक्ते हरिवाहनः ॥ ५४ ॥
सान्त्वयित्वा शुभैर्वाक्यैः स्मयमानोऽभ्यभाषत ।
सुपुत्राद्य पृथा तात त्वया पुत्रेण सत्तम ॥ ५५ ॥
चित्रसेनने भी सारी घटना देवराज इन्द्रसे निवेदन की। तब इन्द्रने अपने पुत्र अर्जुनको बुलाकर एकान्तमें कल्याणमय वचनोंद्वारा सान्त्वना देते हुए मुसकराकर उनसे कहा—'तात! तुम सत्पुरुषोंके शिरोमणि हो, तुम-जैसे पुत्रको पाकर कुन्ती वास्तवमें श्रेष्ठ पुत्रवाली है' ॥
ऋषयोऽपि हि धैर्येण जिता वै ते महाभुज ।
यत् तु दत्तवती शापमुर्वशी तव मानद ॥ ५६ ॥
स चापि तेऽर्थकृत् तात साधकश्च भविष्यति ॥ ५७ ॥
अज्ञातवासो वस्तव्यो भवद्भिर्भूतलेऽनघ ।
वर्षे त्रयोदशे वीर तत्र त्वं क्षपयिष्यसि ॥ ५८ ॥
'महाबाहो! तुमने अपने धैर्य (इन्द्रियसंयम)-के द्वारा ऋषियोंको भी पराजित कर दिया है। मानद! उर्वशीने जो तुम्हें शाप दिया है, वह तुम्हारे अभीष्ट अर्थका साधक होगा। अनघ! तुम्हें भूतलपर तेरहवें वर्षमें अज्ञातवास करना है। वीर! उर्वशीके दिये हुए शापको तुम उसी वर्षमें पूर्ण कर दोगे' ॥ ५६—५८ ॥
तेन नर्तनवेषेण अपुंस्त्वेन तथैव च ।
वर्षमेकं विहृत्यैव ततः पुंस्त्वमवाप्स्यसि ॥ ५९ ॥
'नर्तक वेष और नपुंसक भावसे एक वर्षतक इच्छानुसार विचरण करके तुम फिर अपना पुरुषत्व प्राप्त कर लोगे' ॥ ५९ ॥
एवमुक्तस्तु शक्रेण फाल्गुनः परवीरहा ।
मुदं परमिकां लेभे न च शापं व्यचिन्तयत् ॥ ६० ॥
इन्द्रके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर तो उन्हें शापकी चिन्ता छूट गयी ॥ ६० ॥
चित्रसेनेन सहितो गन्धर्वेण यशस्विना ।
रेमे स स्वर्गभवने पाण्डुपुत्रो धनंजयः ॥ ६१ ॥
पाण्डुपुत्र धनंजय महायशस्वी गन्धर्व चित्रसेनके साथ स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ६१ ॥
इदं यः शृणुयाद् वृत्तं नित्यं पाण्डुसुतस्य वै । न तस्य कामः कामेषु पापकेषु प्रवर्तते ॥ ६२ ॥ जो मनुष्य पाण्डुनन्दन अर्जुनके इस चरित्रको प्रतिदिन सुनता है, उसके मनमें पापपूर्ण विषयभोगोंकी इच्छा नहीं होती ॥ ६२ ॥ इदममरवरात्मजस्य घोरं शुचि चरितं विनिशम्य फाल्गुनस्य । व्यपगतमददम्भरागदोषा- स्त्रिदिवगता विरमन्ति मानवेन्द्राः ॥ ६३ ॥ देवराज इन्द्रके पुत्र अर्जुनके इस अत्यन्त दुष्कर पवित्र चरित्रको सुनकर मद, दम्भ तथा विषयासक्ति आदि दोषोंसे रहित श्रेष्ठ मानव स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ सुखपूर्वक निवास करते हैं ॥ ६३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि उर्वशीशापो नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें उर्वशीशाप नामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 354)
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
लोमश मुनिका स्वर्गमें इन्द्र और अर्जुनसे मिलकर उनका संदेश ले काम्यकवनमें आना
वैशम्पायन उवाच
कदाचिदटमानस्तु महर्षिरुत लोमशः ।
जगाम शक्रभवनं पुरन्दरदिदृक्षया ॥ १ ॥
स समेत्य नमस्कृत्य देवराजं महामुनिः ।
ददर्शाार्धासनगतं पाण्डवं वासवस्य हि ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! एक समयकी बात है, महर्षि लोमश इधर-उधर घूमते हुए इन्द्रसे मिलनेकी इच्छा लेकर स्वर्गलोकमें गये। उन महामुनिने देवराज इन्द्रसे मिलकर उन्हें नमस्कार किया और देखा, पाण्डुनन्दन अर्जुन इन्द्रके आधे सिंहासनपर बैठे हैं ॥
ततः शक्राभ्यनुज्ञात आसने विष्टरोत्तरे ।
निषसाद द्विजश्रेष्ठः पूज्यमानो महर्षिभिः ॥ ३ ॥
तदनन्तर इन्द्रकी आज्ञासे एक उत्तम सिंहासनपर, जहाँ ऊपर कुशका आसन बिछा हुआ था, महर्षियोंसे पूजित द्विजवर लोमशजी बैठे ॥ ३ ॥
तस्य दृष्ट्वाभवद् बुद्धिः पार्थमिन्द्रासने स्थितम् ।
कथं नु क्षत्रियः पार्थः शक्रासनमवाप्तवान् ॥ ४ ॥
इन्द्रके सिंहासनपर बैठे हुए कुन्तीकुमार अर्जुनको देखकर लोमशजीके मनमें यह विचार हुआ कि 'क्षत्रिय होकर भी कुन्तीकुमारने इन्द्रका आसन कैसे प्राप्त कर लिया? ॥ ४ ॥
किं त्वस्य सुकृतं कर्म के लोका वै विनिर्जिताः ।
स एवमनुसम्प्राप्तः स्थानं देवनमस्कृतम् ॥ ५ ॥
'इनका पुण्य-कर्म क्या है? इन्होंने किन-किन लोकोंपर विजय पायी है? किस पुण्यके प्रभावसे इन्होंने यह देववन्दित स्थान प्राप्त किया है?' ॥ ५ ॥
तस्य विज्ञाय संकल्पं शक्रो वृत्रनिषूदनः ।
लोमशं प्रहसन् वाक्यमिदमाह शचीपतिः ॥ ६ ॥
लोमश मुनिके संकल्पको जानकर वृत्रहन्ता शचीपति इन्द्रने हँसते हुए उनसे कहा— ॥ ६ ॥
ब्रह्मर्षे श्रूयतां यत् ते मनसैतद् विवक्षितम् ।
नायं केवलमर्त्यो वै मानुषत्वमुपागतः ॥ ७ ॥ ‘ब्रह्मर्षे! आपके मनमें जो प्रश्न उठा है' उसका समाधान कर रहा हूँ, सुनिये। ये अर्जुन मानवयोनिमें उत्पन्न हुए केवल मरणधर्मा मनुष्य नहीं हैं॥ ७ ॥ महर्षे मम पुत्रोऽयं कुन्त्यां जातो महाभुजः । अस्त्रहेतोरिह प्राप्तः कस्माच्चित् कारणान्तरात् ॥ ८ ॥ अहो नैनं भवान् वेत्ति पुराणमृषिसत्तमम् । शृणु मे वदतो ब्रह्मन् योऽयं यच्चास्य कारणम् ॥ ९ ॥ ‘महर्षे! ये महाबाहु धनंजय कुन्तीके गर्भसे उत्पन्न हुए मेरे पुत्र हैं और कुछ कारणवश अस्त्रविद्या सीखनेके लिये यहाँ आये हैं। आश्चर्य है कि आप इन पुरातन ऋषिप्रवरको नहीं जानते हैं। ब्रह्मन्! इनका जो स्वरूप है और इनके अवतार-ग्रहणका जो कारण है, वह सब मैं बता रहा हूँ। आप मेरे मुँहसे यह सब सुनिये॥ ८-९॥ नरनारायणौ यौ तौ पुराणावृषिसत्तमौ । ताविमावनुजानीहि हृषीकेशधनंजयौ ॥ १० ॥ ‘नर-नारायण नामसे प्रसिद्ध जो पुरातन मुनीश्वर हैं' वे ही श्रीकृष्ण और अर्जुनके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं, यह बात आप जान लें॥ १०॥ विख्यातौ त्रिषु लोकेषु नरनारायणावृषी । कार्यार्थमवतीर्णौ तौ पृथ्वीं पुण्यप्रतिश्रयाम् ॥ ११ ॥ ‘तीनों लोकोंमें विख्यात नर-नारायण ऋषि ही देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये पुण्यके आधाररूप भूतलपर अवतीर्ण हुए हैं॥ ११॥ यन्न शक्यं सुरैर्द्रष्टुमृषिभिर्वा महात्मभिः । तदाश्रमपदं पुण्यं बदरीनाम विश्रुतम् ॥ १२ ॥ स निवासोऽभवद् विप्र विष्णोर्जिष्णोस्तथैव च । यतः प्रवृत्ते गङ्गा सिद्धचारणसेविता ॥ १३ ॥ ‘देवता अथवा महात्मा महर्षि भी जिसे देखनेमें समर्थ नहीं, वह बदरी नामसे विख्यात पुण्यतीर्थ इनका आश्रम है; वही पूर्वकालमें इन श्रीकृष्ण और अर्जुनका (नारायण और नरका) निवासस्थान था। जहाँसे सिद्ध-चारणसेवित गंगाका प्राकट्य हुआ है॥ १२-१३॥ तौ मन्नियोगाद् ब्रह्मर्षे क्षितौ जातौ महाद्युती । भूमेर्भारावतरणं महावीर्यौ करिष्यतः ॥ १४ ॥ ‘ब्रह्मर्षे! ये दोनों महातेजस्वी नर और नारायण मेरे अनुरोधसे पृथ्वीपर उत्पन्न हुए हैं। इनकी शक्ति महान् है, ये दोनों इस पृथ्वीका भार उतारेंगे॥ १४॥ उद्वृत्ता ह्यसुराः केचिन्निवतकवचा इति । विप्रियेषु स्थितास्माकं वरदानेन मोहिताः ॥ १५ ॥
'इन दिनों निवातकवच नामसे प्रसिद्ध कुछ असुरगण बड़े उद्दण्ड हो रहे हैं, वे वरदानसे मोहित होकर हमारा अनिष्ट करनेमें लगे हुए हैं ॥ १५ ॥
तर्कयन्ते सुरान् हन्तुं बलदर्पसमन्विताः ।
देवान् न गणयन्त्येते तथा दत्तवरा हि ते ॥ १६ ॥
'उनमें बल तो है ही, बली होनेका अभिमान भी है। वे देवताओंको मार डालनेका विचार करते हैं। देवताओंको तो वे लोग कुछ गिनते ही नहीं; क्योंकि उन्हें वैसा ही वरदान प्राप्त हो चुका है ॥ १६ ॥
पातालवासिनो रौद्रा दनोः पुत्रा महाबलाः ।
सर्वदेवनिकाया हि नालं योधयितुं हि तान् ॥ १७ ॥
योऽसौ भूमिगतः श्रीमान् विष्णुर्मधुनिषूदनः ।
कपिलो नाम देवोऽसौ भगवानजितो हरिः ॥ १८ ॥
'वे महाबली भयंकर दानव पातालमें निवास करते हैं। सम्पूर्ण देवता मिलकर भी उनके साथ युद्ध नहीं कर सकते। इस समय भूतलपर जिनका अवतार हुआ है वे श्रीमान् मधुसूदन विष्णु ही कपिल नामसे प्रसिद्ध देवता हुए हैं। वे ही भगवान् अपराजित हरि हैं ॥ १७-१८ ॥
येन पूर्वं महात्मानः खनमाना रसातलम् ।
दर्शनादेव निहताः सगरस्यात्मजा विभो ॥ १९ ॥
'महर्षे! पूर्वकालमें रसातलको खोदनेवाले सगरके महामना पुत्र उन्हीं कपिलकी दृष्टिमात्र पड़नेसे भस्म हो गये थे ॥ १९ ॥
तेन कार्यं महत् कार्यमस्माकं द्विजसत्तम ।
पार्थेन च महायुद्धे समेताभ्यां न संशयः ॥ २० ॥
'द्विजश्रेष्ठ! वे भगवान् श्रीहरि हमारा महान् कार्य सिद्ध कर सकते हैं। कुन्तीकुमार अर्जुनसे भी हमारा कार्य सिद्ध हो सकता है। यदि श्रीकृष्ण और अर्जुन किसी महायुद्धमें एक-दूसरेसे मिल जायँ तो वे दोनों एक साथ होकर महान्-से-महान् कार्य सिद्ध कर सकते हैं' इसमें संशय नहीं है ॥ २० ॥
सोऽसुरान् दर्शनादेव शक्तो हन्तुं सहानुगान् ।
निवातकवचान् सर्वान् नागानिव महाह्रदे ॥ २१ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण तो दृष्टिनिक्षेपमात्रसे ही महान् कुण्डमें निवास करनेवाले नागोंकी भाँति समस्त 'निवातकवच' नामक दानवोंको उनके अनुयायियोंसहित मार डालनेमें समर्थ हैं ॥ २१ ॥
किं तु नाल्पेन कार्येण प्रबोध्यो मधुसूदनः ।
तेजसः सुमहराशिः प्रबुद्धः प्रदहेज्जगत् ॥ २२ ॥
'परंतु किसी छोटे कार्यके लिये भगवान् मधुसूदनको सूचना देनी उचित नहीं जान पड़ती। वे तेजके महान् राशि हैं; यदि प्रज्वलित हों तो सम्पूर्ण जगत्को भस्म कर सकते हैं ॥ २२ ॥
अयं तेषां समस्तानां शक्तः प्रतिसमासने ।
तान् निहत्य रणे शूरः पुनर्यास्यति मानुषान् ॥ २३ ॥
'ये शूरवीर अर्जुन अकेले ही उन समस्त निवात-कवचोंका संहार करनेमें समर्थ हैं। उन सबको युद्धमें मारकर ये फिर मनुष्यलोकको लौट जायँगे ॥ २३ ॥
भवानस्मन्नियोगेन यातु तावन्महीतलम् ।
काम्यके द्रक्ष्यसे वीरं निवसन्तं युधिष्ठिरम् ॥ २४ ॥
'मुने! आप मेरे अनुरोधसे कृपया भूलोकमें जाइये और काम्यकवनमें निवास करनेवाले युधिष्ठिरसे मिलिये ॥ २४ ॥
स वाच्यो मम संदेशाद् धर्मात्मा सत्यसंगरः ।
नोत्कण्ठा फाल्गुने कार्या कृतास्त्रः शीघ्रमेष्यति ॥ २५ ॥
'वे बड़े धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ हैं। उनसे मेरा यह संदेश कहियेगा—'राजन्! आप अर्जुनके वापस लौटनेके विषयमें उत्कण्ठित न हों। वे अस्त्रविद्या सीखकर शीघ्र ही लौट आयेंगे ॥ २५ ॥
नाशुद्धबाहुवीर्येण नाकृतास्त्रेण वा रणे ।
भीष्मद्रोणादयो युद्धे शक्याः प्रतिसमासितुम् ॥ २६ ॥
'जिसका बाहुबल पूर्ण अस्त्रशिक्षाके अभावसे त्रुटिपूर्ण हो तथा जिसने अस्त्रविद्याका पूर्ण ज्ञान न प्राप्त किया हो, वह युद्धमें भीष्म-द्रोण आदिका सामना नहीं कर सकता ॥ २६ ॥
गृहीतास्त्रो गुडाकेशो महाबाहुर्महामनाः ।
नृत्यवादित्रगीतानां दिव्यानां पारमीयिवान् ॥ २७ ॥
'महाबाहु महामना अर्जुन अस्त्रविद्याकी पूरी शिक्षा पा चुके हैं। वे दिव्य नृत्य, वाद्य एवं गीतकी कलामें भी पारंगत हो गये हैं ॥ २७ ॥
भवानपि विविक्तानि तीर्थानि मनुजेश्वर ।
भ्रातृभिः सहितः सर्वैर्द्रष्टुमर्हत्यरंदम ॥ २८ ॥
तीर्थेष्वाप्लुत्य पुण्येषु विपाप्मा विगतज्वरः ।
राज्यं भोक्ष्यसि राजेन्द्र सुखी विगतकल्मषः ॥ २९ ॥
'मनुजेश्वर! शत्रुदमन! आप भी अपने सभी भाइयोंके साथ पवित्र तीर्थोंका दर्शन कीजिये। राजेन्द्र! पुण्यतीर्थोंमें स्नान करके पाप-तापसे रहित हो सुखी एवं निष्कलंक जीवन बिताते हुए आप राज्यभोग करेंगे' ॥
भवांश्चैनं द्विजश्रेष्ठ पर्यटन्तं महीतलम् ।
त्रातुमर्हसि विप्राग्र्य तपोबलसमन्वितः ॥ ३० ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! आप भी भूतलपर विचरनेवाले राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करते रहें; क्योंकि आप तपोबलसे सम्पन्न हैं ॥ ३० ॥
गिरिदुर्गेषु च सदा देशेषु विषमेषु च।
वसन्ति राक्षसा रौद्रास्तेभ्यो रक्षां विधास्यति ॥ ३१ ॥
‘पर्वतोंके दुर्गम स्थानोंमें तथा ऊँची-नीची भूमियोंमें भयंकर राक्षस निवास करते हैं; उनसे आप भाइयोंसहित युधिष्ठिरकी रक्षा कीजियेगा’ ॥ ३१ ॥
एवमुक्तो महेन्द्रेण बीभत्सुरपि लोमशम्।
उवाच प्रयतो वाक्यं रक्षेथाः पाण्डुनन्दनम् ॥ ३२ ॥
महेन्द्रके ऐसा कहनेपर अर्जुनने भी विनीत होकर लोमश मुनिसे कहा—‘मुने! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी भाइयोंसहित रक्षा कीजिये ॥ ३२ ॥
यथा गुप्तस्त्वया राजा चरेत् तीर्थानि सत्तम।
दानं दद्याद् यथा चैव तथा कुरु महामुने ॥ ३३ ॥
‘साधुशिरोमणे! महामुने! आपसे सुरक्षित रहकर राजा युधिष्ठिर तीर्थोंमें भ्रमण करें और दान दें—ऐसी कृपा कीजिये’ ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
तथेति सम्प्रतिज्ञाय लोमशः सुमहातपाः।
काम्यकं वनमुद्दिश्य समुपायान्महीत लम् ॥ ३४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ‘बहुत अच्छा’ कहकर महातपस्वी लोमशजीने उनका अनुरोध मान लिया और काम्यकवनमें जानेके लिये भूलोककी ओर प्रस्थान किया ॥ ३४ ॥
ददर्श तत्र कौन्तेयं धर्मराजमरिंदमम्।
तापसैर्भ्रातृभिश्चैव सर्वतः परिवारितम् ॥ ३५ ॥
वहाँ पहुँचकर उन्होंने शत्रुदमन कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरको भाइयों तथा तपस्वी मुनियोंसे घिरा हुआ देखा ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि लोमशगमने
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें लोमशगमनविषयक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥
अध्याय (पृष्ठ 359)
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
दुःखित धृतराष्ट्रका संजयके सम्मुख अपने पुत्रोंके लिये चिन्ता करना
जनमेजय उवाच
अत्यद्भुतमिदं कर्म पार्थस्यामिततेजसः ।
धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः श्रुत्वा विप्र किमब्रवीत् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! अमित तेजस्वी कुन्तीकुमार अर्जुनका यह कर्म तो अत्यन्त अद्भुत है। परम बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने भी यह सब अवश्य सुना होगा। उसे सुनकर उन्होंने क्या कहा था? यह बतलाइये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
शक्रलोकगतं पार्थं श्रुत्वा राजाम्बिकासुतः ।
द्वैपायनादृषिश्रेष्ठात् संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— जनमेजय! अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने ऋषि द्वैपायन व्यासके मुखसे अर्जुनके इन्द्रलोकगमनका समाचार सुनकर संजयसे यह बात कही ॥ २ ॥
धृतराष्ट्र उवाच
श्रुतं मे सूत कार्त्स्न्येन कर्म पार्थस्य धीमतः ।
कच्चित् तवापि विदितं याथातथ्येन सारथे ॥ ३ ॥
धृतराष्ट्र बोले— सूत! मैंने परम बुद्धिमान् कुन्तीकुमार अर्जुनका सारा वृत्तान्त सुना है। सारथे! क्या तुम्हें भी इस विषयमें यथार्थ बातें ज्ञात हुई हैं? ॥ ३ ॥
प्रमत्तो ग्राम्यधर्मेषु मन्दात्मा पापनिश्चयः ।
मम पुत्रः सुदुर्बुद्धिः पृथिवीं घातयिष्यति ॥ ४ ॥
मेरा मूढ़बुद्धि पुत्र तो विषयभोगोंमें फँसा हुआ है। उसका विचार सदा पापपूर्ण ही बना रहता है। प्रमादमें पड़ा हुआ वह अत्यन्त दुर्बुद्धि दुर्योधन एक दिन सारे भूमण्डलका नाश करा देगा ॥ ४ ॥
यस्य नित्यमृता वाचः स्वैरेष्वपि महात्मनः । त्रैलोक्यमपि तस्य स्याद् योद्धा यस्य धनंजयः ।। ५ ।। जिन महात्माके मुखसे हँसीमें भी सदा सत्य ही बातें निकलती हैं और जिनकी ओरसे लड़नेवाले धनंजय-जैसे योद्धा हैं, उन धर्मराज युधिष्ठिरके लिये इस कौरव-राज्यको जीतनेकी तो बात ही क्या है, वे तीनों लोकोंपर अधिकार प्राप्त कर सकते हैं ।। ५ ।। अस्यतः कर्णिनाराचांस्तीक्ष्णाग्रांश्च शिलाशितान् । कोऽर्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेदपि मृत्युर्जरातिगः ।। ६ ।। जो पत्थरपर रगड़कर तेज किये गये हैं, जिनके अग्रभाग बड़े तीखे हैं, उन कर्णि नामक नाराचोंका प्रहार करनेवाले अर्जुनके आगे कौन योद्धा ठहर सकता है? जराविजयी मृत्यु भी उनका सामना नहीं कर सकती ।। ६ ।। मम पुत्रा दुरात्मानः सर्वे मृत्युवशानुगाः । येषां युद्धं दुराधर्षैः पाण्डवैः प्रत्युपस्थितम् ।। ७ ।। मेरे सभी दुरात्मा पुत्र मृत्युके वशमें हो गये हैं; क्योंकि उनके सामने दुर्धर्ष वीर पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेका अवसर उपस्थित हुआ है ।। ७ ।। तथैव च न पश्यामि युधि गाण्डीवधन्वनः । अनिशं चिन्तयानोऽपि य एनमुदियाद् रथी ।। ८ ।।
मैं दिन-रात विचार करनेपर भी यह नहीं समझ पाता कि युद्धमें 'गाण्डीवधन्वा' अर्जुनका सामना कौन रथी कर सकता है? ।। ८ ।। द्रोणकर्णौ प्रतीयातां यदि भीष्मोऽपि वा रणे । महान् स्यात् संशयो लोके तत्र पश्यामि नो जयम् ।। ९ ।। द्रोण और कर्ण उस अर्जुनका सामना कर सकते हैं। भीष्म भी युद्धमें उनसे लोहा ले सकते हैं; परंतु तो भी मेरे मनमें महान् संशय ही बना हुआ है। मुझे इस लोकमें अपने पक्षकी जीत नहीं दिखायी देती ।। ९ ।। घृणी कर्णः प्रमादी च आचार्यः स्थविरो गुरुः । अमर्षी बलवान् पार्थः संरम्भी दृढविक्रमः ।। १० ।। सम्भवेत् तुमुलं युद्धं सर्वशोऽप्यपराजितम् । सर्वे ह्यस्त्रविदः शूराः सर्वे प्राप्ता महत् यशः ।। ११ ।। कर्ण दयालु और प्रमादी है। आचार्य द्रोण वृद्ध एवं गुरु हैं। उधर कुन्तीकुमार अर्जुन अत्यन्त अमर्षमें भरे हुए और बलवान् हैं। उद्योगी और दृढ़ पराक्रमी हैं। सब ओरसे घमासान युद्ध छिड़नेकी सम्भावना हो गयी है। युद्धमें पाण्डवोंकी पराजय नहीं हो सकती; क्योंकि उनकी ओर सभी अस्त्रविद्याके विद्वान् शूरवीर और महान् यशस्वी हैं ।। १०-११ ।। अपि सर्वेश्वरत्वं हि ते वाञ्छन्त्यपराजिताः । वधे नूनं भवेच्छान्तिरेतेषां फाल्गुनस्य वा ।। १२ ।। और वे पराजित न होकर सर्वेश्वर सम्राट् बननेकी इच्छा रखते हैं। इन कर्ण आदि योद्धाओंका वध हो जाय अथवा अर्जुन ही मारे जायँ तो इस विवादकी शान्ति हो सकती है ।। १२ ।। न तु हन्तार्जुनस्यास्ति जेता वास्य न विद्यते। मन्युस्तस्य कथं शाम्येन्मन्दान् प्रति समुत्थितः ।। १३ ।। परंतु अर्जुनको मारनेवाला या जीतनेवाला कोई नहीं है। मेरे मन्दबुद्धि पुत्रोंके प्रति उनका बढ़ा हुआ क्रोध कैसे शान्त हो सकता है? ।। १३ ।। त्रिदशेशसमो वीरः खाण्डवेऽग्निमतर्पयत् । जिगाय पार्थिवान् सर्वान् राजसूये महाक्रतौ ।। १४ ।। अर्जुन इन्द्रके समान वीर हैं। उन्होंने खाण्डववनमें अग्निको तृप्त किया तथा राजसूय महायज्ञमें समस्त राजाओंपर विजय पायी ।। १४ ।। शेषं कुर्याद् गिरेर्वज्रो निपतन् मूर्ध्नि संजय । न तु कुर्युः शराः शेषं क्षिप्तास्तात किरीटिना ।। १५ ।। संजय! पर्वतके शिखरपर गिरनेवाला वज्र भले ही कुछ बाकी छोड़ दे; किंतु तात! किरीटधारी अर्जुनके चलाये हुए बाण कुछ भी शेष नहीं छोड़ेंगे ।। १५ ।। यथा हि किरणा भानोस्तपन्तीह चराचरम् ।
तथा पार्थभुजोत्सृष्टाः शरास्तप्स्यन्ति मत्सुतान् ॥ १६ ॥
जैसे सूर्यकी किरणें चराचर जगत्को संतप्त करती हैं, उसी प्रकार अर्जुनकी भुजाओंद्वारा चलाये गये बाण मेरे पुत्रोंको संतप्त कर देंगे ॥ १६ ॥
अपि तद्रथघोषेण भयार्ता सव्यसाचिनः ।
प्रतिभाति विदीर्णेव सर्वतो भारती चमूः ॥ १७ ॥
मुझे तो आज भी सव्यसाची अर्जुनके रथकी घरघराहटसे सारी कौरव-सेना भयातुर हो छिन्न-भिन्न-सी होती प्रतीत हो रही है ॥ १७ ॥
यदोद्वहन् प्रवपंश्चैव बाणान्
स्थाताऽऽततायी समरे किरीटी ।
सृष्टोऽन्तकः सर्वहरो विधात्रा
भवेद् यथा तद्वदपारणीयः ॥ १८ ॥
जब किरीटधारी अर्जुन हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये (तूणीरसे) बाण निकालते और चलाते हुए समरभूमिमें खड़े होंगे, उस समय उनसे पार पाना असम्भव हो जायगा। वे ऐसे जान पड़ेंगे, मानो विधाताने किसी दूसरे सर्वसंहारकारी यमराजकी सृष्टि कर दी हो ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि धृतराष्ट्रविलापेऽष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें धृतराष्ट्रविलापविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥
अध्याय (पृष्ठ 363)
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
संजयके द्वारा धृतराष्ट्रकी बातोंका अनुमोदन और धृतराष्ट्रका संताप
संजय उवाच
यदेतत् कथितं राजंस्त्वया दुर्योधनं प्रति ।
सर्वमेतद् यथातत्त्वं नैतन्मिथ्या महीपते ॥ १ ॥
संजय बोला— राजन्! आपने दुर्योधनके विषयमें जो बातें कही हैं, वे सभी यथार्थ हैं। महीपते! आपका वचन मिथ्या नहीं है ॥ १ ॥
मन्युना हि समाविष्टाः पाण्डवास्ते महौजसः ।
दृष्ट्वा कृष्णां सभां नीतां धर्मपत्नीं यशस्विनीम् ॥ २ ॥
दुःशासनस्य ता वाचः श्रुत्वा ते दारुणोदयाः ।
कर्णस्य च महाराज जुगुप्सन्तीति मे मतिः ॥ ३ ॥
महातेजस्वी वे पाण्डव अपनी धर्मपत्नी यशस्विनी कृष्णाको सभामें लायी गयी देखकर क्रोधसे भरे हुए हैं और महाराज! दुःशासन तथा कर्णकी वे कठोर बातें सुनकर पाण्डव आपलोगोंकी निन्दा करते हैं, ऐसा मुझे विश्वास है ॥ २-३ ॥
श्रुतं हि मे महाराज यथा पार्थेन संयुगे ।
एकादशतनुः स्थाणुर्धनुषा परितोषितः ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! मैंने यह भी सुना है कि कुन्तीकुमार अर्जुनने एकादश मूर्तिधारी भगवान् शंकरको भी अपने धनुष-बाणकी कलाद्वारा संतुष्ट किया है ॥ ४ ॥
कैरातं वेषमास्थाय योधयामास फाल्गुनम् ।
जिज्ञासुः सर्वदेवेशः कपर्दी भगवान् स्वयम् ॥ ५ ॥
जटाजूटधारी सर्वदेवेश्वर भगवान् शंकरने स्वयं ही अर्जुनके बलकी परीक्षा लेनेके लिये किरातवेष धारण करके उनके साथ युद्ध किया था ॥ ५ ॥
तत्रैनं लोकपालास्ते दर्शयामासुरर्जुनम् ।
अस्त्रहेतोः पराक्रान्तं तपसा कौरवर्षभम् ॥ ६ ॥
वहाँ अस्त्रप्राप्तिके लिये विशेष उद्योगशील कुरु-कुलरत्न अर्जुनको उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर उन लोकपालोंने भी दर्शन दिया था ॥ ६ ॥
नैतदुत्सहते चान्यो लब्धुमन्यत्र फाल्गुनात् ।
साक्षाद् दर्शनमेतेषामीश्वराणां नरो भुवि ॥ ७ ॥
इस संसारमें अर्जुनको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य ऐसा नहीं है, जो इन लोकेश्वरोंका साक्षात् दर्शन प्राप्त कर सके ।। ७ ।। महेश्वरेण यो राजन् न जीर्णो ह्यष्टमूर्तिना । कस्तमुत्सहते वीरो युद्धे जरयितुं पुमान् ।। ८ ।। राजन्! अष्टमूर्ति* भगवान् महेश्वर भी जिसे युद्धमें पराजित न कर सके, उन्हीं वीरवर अर्जुनको दूसरा कौन वीर पुरुष जीतनेका साहस कर सकता है ।। ८ ।। आसादितमिदं घोरं तुमुलं लोमहर्षणम् । द्रौपदीं परिकर्षद्भिः कोपयद्भिश्च पाण्डवान् ।। ९ ।। भरी सभामें द्रौपदीका वस्त्र खींचकर पाण्डवोंको कुपित करनेवाले आपके पुत्रोंने स्वयं ही इस रोमांचकारी, अत्यन्त भयंकर एवं घमासान युद्धको निमन्त्रित किया है ।। ९ ।। यत् तु प्रस्फुरमाणौष्ठो भीमः प्राह वचोऽर्थवत् । दृष्ट्वा दुर्योधनेनोरू द्रौपद्या दर्शितावुभौ ।। १० ।। जब दुर्योधनने द्रौपदीको अपनी दोनों जाँघें दिखायी थीं, उस समय यह देखकर भीमसेनने फड़कते हुए ओठोंसे जो बात कही थी, वह व्यर्थ नहीं हो सकती ।। ऊरू भेत्स्यामि ते पाप गदया भीमवेगया । त्रयोदशानां वर्षाणामन्ते दुर्धूतदेविनः ।। ११ ।। उन्होंने कहा था—'पापी दुर्योधन! मैं तेरहवें वर्षके अन्तमें अपनी भयानक वेगवाली गदासे तुझ कपटी जुआरीकी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा' ।। ११ ।। सर्वे प्रहरतां श्रेष्ठाः सर्वे चामिततेजसः । सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसो देवैरपि सुदुर्जयाः ।। १२ ।। सभी पाण्डव प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ हैं। सभी अपरिमित तेजसे सम्पन्न हैं तथा सबको सभी अस्त्रोंका परिज्ञान है, अतः वे देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय हैं ।। १२ ।। मन्ये मन्युसमुद्भूताः पुत्राणां तव संयुगे । अन्तं पार्थाः करिष्यन्ति भार्यामर्षसमन्विताः ।। १३ ।। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि अपनी पत्नीके अपमानजनित अमर्षसे युक्त और रोषसे उत्तेजित हो समस्त कुन्तीपुत्र संग्राममें आपके पुत्रोंका संहार कर डालेंगे ।। १३ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
किं कृतं सूत कर्णेन वदता परुषं वचः ।
पर्याप्तं वैरमेतावद् यत् कृष्णा सा सभां गता ॥ १४ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—सूत! कर्णने कठोर बातें कहकर क्या किया, पूरा वैर तो इतनेसे ही बढ़ गया कि द्रौपदीको सभामें (केश पकड़कर) लाया गया ॥ १४ ॥
अपीदानीं मम सुतास्तिष्ठेरन् मन्दचेतसः ।
येषां भ्राता गुरुर्ज्येष्ठो विनये नावतिष्ठते ॥ १५ ॥
अब भी मेरे मूर्ख पुत्र चुपचाप बैठे हैं। उनका बड़ा भाई दुर्योधन विनय एवं नीतिके मार्गपर नहीं चलता ॥ १५ ॥
ममापि वचनं सूत न शुश्रूषति मन्दभाक् ।
दृष्ट्वा मां चक्षुषा हीनं निर्विचेष्टमचेतसम् ॥ १६ ॥
सूत! वह मन्दभागी दुर्योधन मुझे अन्धा, अकर्मण्य और अविवेकी समझकर मेरी बात भी नहीं सुनना चाहता ॥ १६ ॥
ये चास्य सचिवा मन्दाः कर्णसौबलकादयः ।
ते तस्य भूयसो दोषान् वर्धयन्ति विचेतसः ॥ १७ ॥
कर्ण और शकुनि आदि जो उसके मूर्ख मन्त्री हैं, वे भी विचारशून्य होकर उसके अधिक-से-अधिक दोष बढ़ानेकी ही चेष्टा करते हैं ॥ १७ ॥
स्वैरमुक्ता ह्यपि शराः पार्थेनामिततेजसा ।
निर्दहेयुर्मम सुतान् किं पुनर्मन्युनेरिताः ॥ १८ ॥
अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा स्वेच्छापूर्वक छोड़े हुए बाण भी मेरे पुत्रोंको जलाकर भस्म कर सकते हैं, फिर क्रोधपूर्वक छोड़े हुए बाणोंके लिये तो कहना ही क्या है? ॥ १८ ॥
पार्थबाहुबलोत्सृष्टा महाचापविनिःसृताः ।
दिव्यास्त्रमन्त्रमुदिताः सादयेयुः सुरानपि ॥ १९ ॥
अर्जुनके बाहु-बलद्वारा चलाये और उनके महान् धनुषसे छूटे हुए दिव्यास्त्रमन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित बाण देवताओंका भी संहार कर सकते हैं ॥ १९ ॥
यस्य मन्त्री च गोप्ता च सुहृच्चैव जनार्दनः ।
हरिस्त्रैलोक्यनाथः स किं नु तस्य न निर्जितम् ॥ २० ॥
जिनके मन्त्री, संरक्षक और सुहृद् त्रिभुवननाथ, जनार्दन श्रीहरि हैं, वे किसे नहीं जीत सकते? ॥ २० ॥
इदं हि सुमहच्चित्रमर्जुनस्येह संजय ।
महादेवेन बाहुभ्यां यत् समेत इति श्रुतिः ॥ २१ ॥