भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 364

इस संसारमें अर्जुनको छोड़कर दूसरा कोई मनुष्य ऐसा नहीं है, जो इन लोकेश्वरोंका साक्षात् दर्शन प्राप्त कर सके ।। ७ ।। महेश्वरेण यो राजन् न जीर्णो ह्यष्टमूर्तिना । कस्तमुत्सहते वीरो युद्धे जरयितुं पुमान् ।। ८ ।। राजन्! अष्टमूर्ति* भगवान् महेश्वर भी जिसे युद्धमें पराजित न कर सके, उन्हीं वीरवर अर्जुनको दूसरा कौन वीर पुरुष जीतनेका साहस कर सकता है ।। ८ ।। आसादितमिदं घोरं तुमुलं लोमहर्षणम् । द्रौपदीं परिकर्षद्भिः कोपयद्भिश्च पाण्डवान् ।। ९ ।। भरी सभामें द्रौपदीका वस्त्र खींचकर पाण्डवोंको कुपित करनेवाले आपके पुत्रोंने स्वयं ही इस रोमांचकारी, अत्यन्त भयंकर एवं घमासान युद्धको निमन्त्रित किया है ।। ९ ।। यत् तु प्रस्फुरमाणौष्ठो भीमः प्राह वचोऽर्थवत् । दृष्ट्वा दुर्योधनेनोरू द्रौपद्या दर्शितावुभौ ।। १० ।। जब दुर्योधनने द्रौपदीको अपनी दोनों जाँघें दिखायी थीं, उस समय यह देखकर भीमसेनने फड़कते हुए ओठोंसे जो बात कही थी, वह व्यर्थ नहीं हो सकती ।। ऊरू भेत्स्यामि ते पाप गदया भीमवेगया । त्रयोदशानां वर्षाणामन्ते दुर्धूतदेविनः ।। ११ ।। उन्होंने कहा था—'पापी दुर्योधन! मैं तेरहवें वर्षके अन्तमें अपनी भयानक वेगवाली गदासे तुझ कपटी जुआरीकी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा' ।। ११ ।। सर्वे प्रहरतां श्रेष्ठाः सर्वे चामिततेजसः । सर्वे सर्वास्त्रविद्वांसो देवैरपि सुदुर्जयाः ।। १२ ।। सभी पाण्डव प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ हैं। सभी अपरिमित तेजसे सम्पन्न हैं तथा सबको सभी अस्त्रोंका परिज्ञान है, अतः वे देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्जय हैं ।। १२ ।। मन्ये मन्युसमुद्भूताः पुत्राणां तव संयुगे । अन्तं पार्थाः करिष्यन्ति भार्यामर्षसमन्विताः ।। १३ ।। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि अपनी पत्नीके अपमानजनित अमर्षसे युक्त और रोषसे उत्तेजित हो समस्त कुन्तीपुत्र संग्राममें आपके पुत्रोंका संहार कर डालेंगे ।। १३ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

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