महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 365, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिं कृतं सूत कर्णेन वदता परुषं वचः ।
पर्याप्तं वैरमेतावद् यत् कृष्णा सा सभां गता ॥ १४ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—सूत! कर्णने कठोर बातें कहकर क्या किया, पूरा वैर तो इतनेसे ही बढ़ गया कि द्रौपदीको सभामें (केश पकड़कर) लाया गया ॥ १४ ॥
अपीदानीं मम सुतास्तिष्ठेरन् मन्दचेतसः ।
येषां भ्राता गुरुर्ज्येष्ठो विनये नावतिष्ठते ॥ १५ ॥
अब भी मेरे मूर्ख पुत्र चुपचाप बैठे हैं। उनका बड़ा भाई दुर्योधन विनय एवं नीतिके मार्गपर नहीं चलता ॥ १५ ॥
ममापि वचनं सूत न शुश्रूषति मन्दभाक् ।
दृष्ट्वा मां चक्षुषा हीनं निर्विचेष्टमचेतसम् ॥ १६ ॥
सूत! वह मन्दभागी दुर्योधन मुझे अन्धा, अकर्मण्य और अविवेकी समझकर मेरी बात भी नहीं सुनना चाहता ॥ १६ ॥
ये चास्य सचिवा मन्दाः कर्णसौबलकादयः ।
ते तस्य भूयसो दोषान् वर्धयन्ति विचेतसः ॥ १७ ॥
कर्ण और शकुनि आदि जो उसके मूर्ख मन्त्री हैं, वे भी विचारशून्य होकर उसके अधिक-से-अधिक दोष बढ़ानेकी ही चेष्टा करते हैं ॥ १७ ॥
स्वैरमुक्ता ह्यपि शराः पार्थेनामिततेजसा ।
निर्दहेयुर्मम सुतान् किं पुनर्मन्युनेरिताः ॥ १८ ॥
अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा स्वेच्छापूर्वक छोड़े हुए बाण भी मेरे पुत्रोंको जलाकर भस्म कर सकते हैं, फिर क्रोधपूर्वक छोड़े हुए बाणोंके लिये तो कहना ही क्या है? ॥ १८ ॥
पार्थबाहुबलोत्सृष्टा महाचापविनिःसृताः ।
दिव्यास्त्रमन्त्रमुदिताः सादयेयुः सुरानपि ॥ १९ ॥
अर्जुनके बाहु-बलद्वारा चलाये और उनके महान् धनुषसे छूटे हुए दिव्यास्त्रमन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित बाण देवताओंका भी संहार कर सकते हैं ॥ १९ ॥
यस्य मन्त्री च गोप्ता च सुहृच्चैव जनार्दनः ।
हरिस्त्रैलोक्यनाथः स किं नु तस्य न निर्जितम् ॥ २० ॥
जिनके मन्त्री, संरक्षक और सुहृद् त्रिभुवननाथ, जनार्दन श्रीहरि हैं, वे किसे नहीं जीत सकते? ॥ २० ॥
इदं हि सुमहच्चित्रमर्जुनस्येह संजय ।
महादेवेन बाहुभ्यां यत् समेत इति श्रुतिः ॥ २१ ॥