भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 366

संजय! अर्जुनका यह पराक्रम तो बड़े ही आश्चर्यका विषय है कि उन्होंने महादेवजीके साथ बाहुयुद्ध किया, यह मेरे सुननेमें आया है ।। २१ ।।
प्रत्यक्षं सर्वलोकस्य खाण्डवे यत् कृतं पुरा ।
फाल्गुनेन सहायार्थे वह्नेर्दामोदरेण च ।। २२ ।।
आजसे पहले खाण्डववनमें अग्निदेवकी सहायताके लिये श्रीकृष्ण और अर्जुनने जो कुछ किया है, वह तो सम्पूर्ण जगत्‌की आँखोंके सामने है ।। २२ ।।
सर्वथा न हि मे पुत्राः सहामात्याः ससौबलाः ।
क्रुद्धे पार्थे च भीमे च वासुदेवे च सात्वते ।। २३ ।।
जब कुन्तीपुत्र अर्जुन, भीमसेन और यदुकुलतिलक वासुदेव श्रीकृष्ण क्रोधमें भरे हुए हैं, तब मुझे यह विश्वास कर लेना चाहिये कि शकुनि तथा अन्य मन्त्रियोंसहित मेरे सभी पुत्र सर्वथा जीवित नहीं रह सकते ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि धृतराष्ट्रखेदे
एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ४९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें
धृतराष्ट्रखेदविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४९ ।।


* सूर्य, जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश, दीक्षित ब्राह्मण तथा चन्द्रमा—ये शिवजीकी आठ मूर्तियाँ हैं।
(विष्णुपुराण १।८।८)