भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 360

यस्य नित्यमृता वाचः स्वैरेष्वपि महात्मनः । त्रैलोक्यमपि तस्य स्याद् योद्धा यस्य धनंजयः ।। ५ ।। जिन महात्माके मुखसे हँसीमें भी सदा सत्य ही बातें निकलती हैं और जिनकी ओरसे लड़नेवाले धनंजय-जैसे योद्धा हैं, उन धर्मराज युधिष्ठिरके लिये इस कौरव-राज्यको जीतनेकी तो बात ही क्या है, वे तीनों लोकोंपर अधिकार प्राप्त कर सकते हैं ।। ५ ।। अस्यतः कर्णिनाराचांस्तीक्ष्णाग्रांश्च शिलाशितान् । कोऽर्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेदपि मृत्युर्जरातिगः ।। ६ ।। जो पत्थरपर रगड़कर तेज किये गये हैं, जिनके अग्रभाग बड़े तीखे हैं, उन कर्णि नामक नाराचोंका प्रहार करनेवाले अर्जुनके आगे कौन योद्धा ठहर सकता है? जराविजयी मृत्यु भी उनका सामना नहीं कर सकती ।। ६ ।। मम पुत्रा दुरात्मानः सर्वे मृत्युवशानुगाः । येषां युद्धं दुराधर्षैः पाण्डवैः प्रत्युपस्थितम् ।। ७ ।। मेरे सभी दुरात्मा पुत्र मृत्युके वशमें हो गये हैं; क्योंकि उनके सामने दुर्धर्ष वीर पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेका अवसर उपस्थित हुआ है ।। ७ ।। तथैव च न पश्यामि युधि गाण्डीवधन्वनः । अनिशं चिन्तयानोऽपि य एनमुदियाद् रथी ।। ८ ।।