भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 361

मैं दिन-रात विचार करनेपर भी यह नहीं समझ पाता कि युद्धमें 'गाण्डीवधन्वा' अर्जुनका सामना कौन रथी कर सकता है? ।। ८ ।। द्रोणकर्णौ प्रतीयातां यदि भीष्मोऽपि वा रणे । महान् स्यात् संशयो लोके तत्र पश्यामि नो जयम् ।। ९ ।। द्रोण और कर्ण उस अर्जुनका सामना कर सकते हैं। भीष्म भी युद्धमें उनसे लोहा ले सकते हैं; परंतु तो भी मेरे मनमें महान् संशय ही बना हुआ है। मुझे इस लोकमें अपने पक्षकी जीत नहीं दिखायी देती ।। ९ ।। घृणी कर्णः प्रमादी च आचार्यः स्थविरो गुरुः । अमर्षी बलवान् पार्थः संरम्भी दृढविक्रमः ।। १० ।। सम्भवेत् तुमुलं युद्धं सर्वशोऽप्यपराजितम् । सर्वे ह्यस्त्रविदः शूराः सर्वे प्राप्ता महत् यशः ।। ११ ।। कर्ण दयालु और प्रमादी है। आचार्य द्रोण वृद्ध एवं गुरु हैं। उधर कुन्तीकुमार अर्जुन अत्यन्त अमर्षमें भरे हुए और बलवान् हैं। उद्योगी और दृढ़ पराक्रमी हैं। सब ओरसे घमासान युद्ध छिड़नेकी सम्भावना हो गयी है। युद्धमें पाण्डवोंकी पराजय नहीं हो सकती; क्योंकि उनकी ओर सभी अस्त्रविद्याके विद्वान् शूरवीर और महान् यशस्वी हैं ।। १०-११ ।। अपि सर्वेश्वरत्वं हि ते वाञ्छन्त्यपराजिताः । वधे नूनं भवेच्छान्तिरेतेषां फाल्गुनस्य वा ।। १२ ।। और वे पराजित न होकर सर्वेश्वर सम्राट् बननेकी इच्छा रखते हैं। इन कर्ण आदि योद्धाओंका वध हो जाय अथवा अर्जुन ही मारे जायँ तो इस विवादकी शान्ति हो सकती है ।। १२ ।। न तु हन्तार्जुनस्यास्ति जेता वास्य न विद्यते। मन्युस्तस्य कथं शाम्येन्मन्दान् प्रति समुत्थितः ।। १३ ।। परंतु अर्जुनको मारनेवाला या जीतनेवाला कोई नहीं है। मेरे मन्दबुद्धि पुत्रोंके प्रति उनका बढ़ा हुआ क्रोध कैसे शान्त हो सकता है? ।। १३ ।। त्रिदशेशसमो वीरः खाण्डवेऽग्निमतर्पयत् । जिगाय पार्थिवान् सर्वान् राजसूये महाक्रतौ ।। १४ ।। अर्जुन इन्द्रके समान वीर हैं। उन्होंने खाण्डववनमें अग्निको तृप्त किया तथा राजसूय महायज्ञमें समस्त राजाओंपर विजय पायी ।। १४ ।। शेषं कुर्याद् गिरेर्वज्रो निपतन् मूर्ध्नि संजय । न तु कुर्युः शराः शेषं क्षिप्तास्तात किरीटिना ।। १५ ।। संजय! पर्वतके शिखरपर गिरनेवाला वज्र भले ही कुछ बाकी छोड़ दे; किंतु तात! किरीटधारी अर्जुनके चलाये हुए बाण कुछ भी शेष नहीं छोड़ेंगे ।। १५ ।। यथा हि किरणा भानोस्तपन्तीह चराचरम् ।