महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 345, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंजा रही थी ॥ ६ ॥ भ्रूक्षेपालापमाधुर्यैः कान्त्या सौम्यतयापि च । शशिनं वक्त्रचन्द्रेण साऽऽह्वयन्तीव गच्छति ॥ ७ ॥ भौंहोंकी भंगिमा, वार्तालापकी मधुरिमा, उज्ज्वल कान्ति और सौम्यभावसे सम्पन्न अपने मनोहर मुखचन्द्र-द्वारा वह चन्द्रमाको चुनौती-सी देती हुई इन्द्रभवनके पथपर चल रही थी ॥ ७ ॥ दिव्याङ्गरागौ सुमुखौ दिव्यचन्दनरूषितौ । गच्छन्त्या हाररुचिरौ स्तनौ तस्या ववल्गतुः ॥ ८ ॥ चलते समय सुन्दर हारोंसे विभूषित उर्वशीके उठे हुए स्तन जोर-जोरसे हिल रहे थे। उनपर दिव्य अंगराग लगाये गये थे। उनके अग्रभाग अत्यन्त मनोहर थे। वे दिव्य चन्दनसे चर्चित हो रहे थे ॥ ८ ॥ स्तनोद्वहनसंक्षोभान्नस्यमाना पदे पदे । त्रिवलीदामचित्रेण मध्येनातीवशोभिना ॥ ९ ॥ स्तनोंके भारी भारको वहन करनेके कारण थककर वह पग-पगपर झुकी जाती थी। उसका अत्यन्त सुन्दर मध्यभाग (उदर) त्रिवली रेखासे विचित्र शोभा धारण करता था ॥ ९ ॥ अधो भूधरविस्तीर्णं नितम्बोन्नतपीवरम् । मन्मथायतनं शुभ्रं रसनादामभूषितम् ॥ १० ॥ ऋषीणामपि दिव्यानां मनोव्याघातकारणम् । सूक्ष्मवस्त्रधरं रेजे जघनं निरवद्यवत् ॥ ११ ॥ सुन्दर महीन वस्त्रोंसे आच्छादित उसका जघनप्रदेश अनिन्द्य सौन्दर्यसे सुशोभित हो रहा था। वह कामदेवका उज्ज्वल मन्दिर जान पड़ता था। नाभिके नीचेके भागमें पर्वतके समान विशाल नितम्ब ऊँचा और स्थूल प्रतीत होता था। कटिमें बँधी हुई करधनीकी लड़ियाँ उस जघनप्रदेशको सुशोभित कर रही थीं। वह मनोहर अंग (जघन) देवलोकवासी महर्षियोंके भी चित्तको क्षुब्ध कर देनेवाला था ॥ १०-११ ॥ गूढगुल्फधरौ पादौ ताम्रायततलाङ्गुली । कूर्मपृष्ठोन्नतौ चापि शोभेते किङ्किणीकिणौ ॥ १२ ॥ उसके दोनों चरणोंके गुल्फ (टखने) मांससे छिपे हुए थे। उसके विस्तृत तलवे और अँगुलियाँ लाल रंगकी थीं। वे दोनों पैर कछुएकी पीठके समान ऊँचे होनेके साथ ही घुँघुरुओंके चिह्नसे सुशोभित थे ॥ १२ ॥ सीधुपानेन चाल्पेन तुष्ट्याथ मदनेन च । विलासनैश्च विविधैः प्रेक्षणीयतराभवत् ॥ १३ ॥