भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 374

युधिष्ठिर उवाच

प्रतिगृह्णामि ते वाचमिमां सत्यां जनार्दन ॥ ३२ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**जनार्दन! मैं आपकी सत्य वाणीको शिरोधार्य करता हूँ ॥ ३२ ॥

अमित्रान् मे महाबाहो सानुबन्धान् हनिष्यसि । वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं सत्यं मां कुरु केशव ॥ ३३ ॥ प्रतिज्ञातो वने वासो राजमध्ये मया ह्ययम् । महाबाहो! केशव! तेरहवें वर्षके बाद आप मेरे सम्पूर्ण शत्रुओंको उनके बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट कीजियेगा। ऐसा करके आप मेरे सत्य (वनवासके लिये की गयी प्रतिज्ञा)-की रक्षा कीजिये। मैंने राजाओंकी मण्डलीमें वनवासकी प्रतिज्ञा की है ॥ ३३ १/२ ॥

तद् धर्मराजवचनं प्रतिश्रुत्य सभासदः ॥ ३४ ॥ धृष्टद्युम्नपुरोगास्ते शमयामासुरोजसा । केशवं मधुरैर्वाक्यैः कालयुक्तैरमर्षितम् ॥ ३५ ॥ धर्मराजकी वह बात सुनकर धृष्टद्युम्न आदि सभासदोंने समयोचित मधुर वचनोंद्वारा अमर्षमें भरे हुए श्रीकृष्णको शीघ्र ही शान्त किया ॥ ३४-३५ ॥

पाञ्चालीं प्राहुरक्लिष्टां वासुदेवस्य शृण्वतः । दुर्योधनस्तव क्रोधाद् देवि त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ ३६ ॥ तत्पश्चात् उन्होंने क्लेशरहित हुई द्रौपदीसे भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए कहा—‘देवि! दुर्योधन तुम्हारे क्रोधसे निश्चय ही प्राण त्याग देगा ॥ ३६ ॥

प्रतिजानीमहे सत्यं मा शुचो वरवर्णिनि । ये स्म तेऽक्षजितां कृष्णे दृष्ट्वा त्वां प्राहसंस्तदा । मांसानि तेषां खादन्तो हरिष्यन्ति वृकद्विजाः ॥ ३७ ॥ ‘वरवर्णिनि! हम यह सच्ची प्रतिज्ञा करते हैं, तुम शोक न करो। कृष्णे! उस समय तुम्हें जूएमंे जीती हुई देखकर जिन लोगोंने हँसी उड़ायी है, उनके मांस भेड़िये और गीध खायेंगे और नोच-नोचकर ले जायँगे ॥ ३७ ॥

पास्यन्ति रुधिरं तेषां गृध्रा गोमायवस्तथा । उत्तमाङ्गानि कर्षन्तो यैः कृष्टासि सभातले ॥ ३८ ॥ ‘इसी प्रकार जिन्होंने तुम्हें सभाभवनमें घसीटा है, उनके कटे हुए सिरोंको घसीटते हुए गीध और गीदड़ उनके रक्त पीयेंगे ॥ ३८ ॥

तेषां द्रक्ष्यसि पाञ्चालि गात्राणि पृथिवीतले । क्रव्यादैः कृष्यमाणानि भक्ष्यमाणानि चासकृत् ॥ ३९ ॥ ‘पांचालराजकुमारि! तुम देखोगी कि उन दुष्टोंके शरीर इस पृथ्वीपर मांसाहारी गीदड़-गीध आदि पशु-पक्षियोंद्वारा बार-बार घसीटे और खाये जा रहे हैं ॥ ३९ ॥

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