महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिक्लिष्टासि यैस्तत्र यैश्चासि समुपेक्षिता। तेषामुत्कृत्तशिरसां भूमिः पास्यति शोणितम्॥ ४०॥ 'जिन लोगोंने तुम्हें सभामें क्लेश पहुँचाया और जिन्होंने चुपचाप रहकर उस अन्यायकी उपेक्षा की है, उन सबके कटे हुए मस्तकोंका रक्त यह पृथ्वी पीयेगी'॥ ४०॥ एवं बहुविधा वाचस्त ऊचुर्भरतर्षभ। सर्वे तेजस्विनः शूराः सर्वे चाहतलक्षणाः॥ ४१॥ भरतकुलतिलक! इस प्रकार उन वीरोंने अनेक प्रकारकी बातें कही थीं। वे सब-के-सब तेजस्वी और शूरवीर हैं। उनके शुभ लक्षण अमित हैं॥ ४१॥ ते धर्मराजेन वृता वर्षादूर्ध्वं त्रयोदशात्। पुरस्कृत्योपयास्यन्ति वासुदेवं महारथाः॥ ४२॥ धर्मराजने तेरहवें वर्षके बाद युद्ध करनेके लिये उनका वरण किया है। वे महारथी वीर भगवान् श्रीकृष्णको आगे रखकर आक्रमण करेंगे॥ ४२॥ रामश्च कृष्णश्च धनंजयश्च प्रद्युम्नसाम्बौ युयुधानभीमौ। माद्रीसुतौ केकयराजपुत्राः पाञ्चालपुत्राः सह मत्स्यराज्ञा॥ ४३॥ एतान् सर्वान् लोकवीरानजेयान् महात्मनः सानुबन्धान् ससैन्यान्। को जीवितार्थी समरेऽभ्युदीयात् क्रुद्धान् सिंहान् केसरिणो यथैव॥ ४४॥ बलराम, श्रीकृष्ण, अर्जुन, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, भीमसेन, नकुल, सहदेव, केकयराजकुमार, द्रुपद और उनके पुत्र तथा मत्स्यनरेश विराट—ये सब-के-सब विश्वविख्यात अजेय वीर हैं। ये महामना जब अपने सगे-सम्बन्धियों और सेनाके साथ धावा करेंगे, उस समय क्रोधमें भरे हुए केसरी सिंहोंके समान उन महावीरोंका समरमें जीवनकी इच्छा रखनेवाला कौन पुरुष सामना करेगा? ॥ ४३-४४॥
धृतराष्ट्र उवाच
यन्माब्रवीद् विदुरो द्यूतकाले त्वं पाण्डवाञ्जेष्यसि चेन्नरेन्द्र। ध्रुवं कुरूणामयमन्तकालो महाभयो भविता शोणितौघः॥ ४५॥ **धृतराष्ट्र बोले—**संजय! जब जूआ खेला जा रहा था, उस समय विदुरने मुझसे जो यह बात कही थी कि नरेन्द्र! यदि आप पाण्डवोंको जूएमं जीतेंगे तो निश्चय ही यह कौरवोंके