महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
नलका दूत बनकर राजमहलमें जाना और दमयन्तीको देवताओंका संदेश सुनाना
बृहदश्व उवाच
तेभ्यः प्रतिज्ञाय नलः करिष्य इति भारत ।
अथैतान् परिपप्रच्छ कृताञ्जलिरुपस्थितः ॥ १ ॥
के वै भवन्तः कश्चासौ यस्याहं दूत ईप्सितः ।
किं च तद् वो मया कार्यं कथयध्वं यथातथम् ॥ २ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं—भारत! देवताओंसे उनकी सहायता करनेकी प्रतिज्ञा करके राजा नलने हाथ जोड़ पास जाकर उनसे पूछा—'आपलोग कौन हैं? और वह कौन व्यक्ति है, जिसके पास जानेके लिये आपने मुझे दूत बनानेकी इच्छा की है तथा आपलोगोंका वह कौन-सा कार्य है, जो मेरे द्वारा सम्पन्न होनेयोग्य है, यह ठीक-ठीक बताइये' ॥ १-२ ॥
एवमुक्तो नैषधेन मघवानभ्यभाषत ।
अमरान् वै निबोधास्मान् दमयन्त्यर्थमागतान् ॥ ३ ॥
निषधराज नलके इस प्रकार पूछनेपर इन्द्रने कहा—'भूपाल! तुम हमें देवता समझो, हम दमयन्तीको प्राप्त करनेके लिये यहाँ आये हैं' ॥ ३ ॥
अहमिन्द्रोऽयमग्निश्च तथैवायमपां पतिः ।
शरीरान्तकरो नृणां यमोऽयमपि पार्थिव ॥ ४ ॥
त्वं वै समागतानस्मान् दमयन्त्यै निवेदय ।
लोकपाला महेन्द्राद्याः समायान्ति दिदृक्षवः ॥ ५ ॥
'मैं इन्द्र हूँ, ये अग्निदेव हैं, ये जलके स्वामी वरुण और ये प्राणियोंके शरीरका नाश करनेवाले साक्षात् यमराज हैं। आप दमयन्तीके पास जाकर उसे हमारे आगमनकी सूचना दे दीजिये और कहिये—महेन्द्र आदि लोकपाल तुम्हें देखनेके लिये आ रहे हैं ॥ ४-५ ॥
प्राप्तुमिच्छन्ति देवास्त्वां शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः ।
तेषामन्यतमं देवं पतित्वे वरयस्व ह ॥ ६ ॥
'इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम—ये देवतालोग तुम्हें प्राप्त करना चाहते हैं। तुम उनमेंसे किसी एक देवताको पतिरूपमें चुन लो' ॥ ६ ॥
एवमुक्तः स शक्रेण नलः प्राञ्जलिरब्रवीत् ।
एकार्थं समुपेतं मां न प्रेषयितुमर्हथ ॥ ७ ॥