महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 398, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रके ऐसा कहनेपर नल हाथ जोड़कर बोले—'देवताओ! मेरा भी एकमात्र यही प्रयोजन है, जो आपलोगोंका है; अतः एक ही प्रयोजनके लिये आये हुए मुझे दूत बनाकर न भेजिये' ॥ ७ ॥
कथं तु जातसंकल्पः स्त्रियमुत्सृजते पुमान् ।
परार्थमीदृशं वक्तुं तत् क्षमन्तु महेश्वराः ॥ ८ ॥
‘देवेश्वरो! जिसके मनमें किसी स्त्रीको प्राप्त करनेका संकल्प हो गया है, वह पुरुष उसी स्त्रीको दूसरेके लिये कैसे छोड़ सकता है? अतः आपलोग ऐसी बात कहनेके लिये मुझे क्षमा करें’ ॥ ८ ॥
देवा ऊचुः
करिष्य इति संश्रुत्य पूर्वमस्मासु नैषध ।
न करिष्यसि कस्मात् त्वं व्रज नैषध मा चिरम् ॥ ९ ॥
देवताओंने कहा—निषधनरेश! तुम पहले हमलोगोंसे हमारा कार्य सिद्ध करनेके लिये प्रतिज्ञा कर चुके हो, फिर तुम उस प्रतिज्ञाका पालन कैसे नहीं करोगे? इसलिये निषधराज! तुम शीघ्र जाओ; देर न करो ॥ ९ ॥
बृहदश्व उवाच
एवमुक्तः स देवैस्तैर्नैषधः पुनरब्रवीत् ।
सुरक्षितानि वेश्मानि प्रवेष्टुं कथमुत्सहे ॥ १० ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं—राजन्! उन देवताओंके ऐसा कहनेपर निषधनरेशने पुनः उनसे पूछा—'विदर्भराजके सभी भवन (पहरेदारोंसे) सुरक्षित हैं। मैं उनमें कैसे प्रवेश कर सकता हूँ?' ॥ १० ॥
प्रवेक्ष्यसीति तं शक्रः पुनरेवाभ्यभाषत ।
जगाम स तथेत्युक्त्वा दमयन्त्या निवेशनम् ॥ ११ ॥
तब इन्द्रने पुनः उत्तर दिया—'तुम वहाँ प्रवेश कर सकोगे।' तत्पश्चात् राजा नल 'तथास्तु' कहकर दमयन्तीके महलमें गये ॥ ११ ॥
ददर्श तत्र वैदर्भीं सखीगणसमावृताम् ।
देदीप्यमानां वपुषा श्रिया च वरवर्णिनीम् ॥ १२ ॥
वहाँ उन्होंने देखा, सखियोंसे घिरी हुई परम सुन्दरी विदर्भराजकुमारी दमयन्ती अपने सुन्दर शरीर और दिव्य कान्तिसे अत्यन्त उद्भासित हो रही है ॥ १२ ॥
अतीवसुकुमाराङ्गीं तनुमध्यां सुलोचनाम् ।
आक्षिपन्तीमिव प्रभां शशिनः स्वेन तेजसा ॥ १३ ॥
उसके अंग परम सुकुमार हैं, कटिके ऊपरका भाग अत्यन्त पतला है और नेत्र बड़े सुन्दर हैं एवं वह अपने तेजसे चन्द्रमाकी प्रभाको भी तिरस्कृत-सी कर रही है ॥ १३ ॥