भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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'अर्थसंकट, दुस्तर दुःख तथा स्वजनोंपर आयी हुई विपत्तियोंमें आप-जैसे ज्ञानी शारीरिक और मानसिक दुःखोंसे पीडित नहीं होते ।। १९ ।। श्रूयतां चाभिधास्यामि जनकेन यथा पुरा । आत्मव्यवस्थानाकरा गीताः श्लोका महात्मना ।। २० ।। 'पूर्वकालमें महात्मा राजा जनकने अन्तःकरणको स्थिर करनेवाले कुछ श्लोकोंका गान किया था। मैं उन श्लोकोंका वर्णन करता हूँ, आप सुनिये— ।। २० ।। मनोदेहसमुत्थाभ्यां दुःखाभ्यामर्दितं जगत् । तयोर्व्याससमासाभ्यां शमोपायमिमं शृणु ।। २१ ।। 'सारा जगत् मानसिक और शारीरिक दुःखोंसे पीडित है। उन दोनों प्रकारके दुःखोंकी शान्तिका यह उपाय संक्षेप और विस्तारसे सुनिये ।। २१ ।। व्याधेरनिष्टसंस्पर्शाच्छ्रमादिष्टविवर्जनात् । दुःखं चतुर्भिः शारीरं कारणैः सम्प्रवर्तते ।। २२ ।। 'रोग, अप्रिय घटनाओंकी प्राप्ति, अधिक परिश्रम तथा प्रिय वस्तुओंका वियोग—इन चार कारणोंसे शारीरिक दुःख प्राप्त होता है ।। २२ ।। तदा तत्प्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात् । आधिव्याधिप्रशमनं क्रियायोगद्वयेन तु ।। २३ ।। 'समयपर इन चारों कारणोंका प्रतीकार करना एवं कभी भी उसका चिन्तन न करना—ये दो क्रियायोग (दुःखनिवारक उपाय) हैं। इन्हींसे आधि-व्याधिकी शान्ति होती है ।। २३ ।। मतिमन्तो ह्यतो वैद्याः शमं प्रागेव कुर्वते । मानसस्य प्रियाख्यानैः सम्भोगोपनयैर्नृणाम् ।। २४ ।। 'अतः बुद्धिमान् तथा विद्वान् पुरुष प्रिय वचन बोलकर तथा हितकर भोगोंकी प्राप्ति कराकर पहले मनुष्योंके मानसिक दुःखोंका ही निवारण किया करते हैं ।। २४ ।। मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते । अयःपिण्डेन तप्तेन कुम्भसंस्थमिवोदकम् ।। २५ ।। 'क्योंकि मनमें दुःख होनेपर शरीर भी संतप्त होने लगता है; ठीक वैसे ही, जैसे तपाया हुआ लोहेका गोला डाल देनेपर घड़ेमें रखा हुआ शीतल जल भी गरम हो जाता है ।। २५ ।। मानसं शमयेत् तस्माज्ज्ञानेनाग्निमिवाम्बुना । प्रशान्ते मानसे ह्यस्य शरीरमुपशाम्यति ।। २६ ।। 'इसलिये जलसे अग्निको शान्त करनेकी भाँति ज्ञानके द्वारा मानसिक दुःखको शान्त करना चाहिये। मनका दुःख मिट जानेपर मनुष्यके शरीरका दुःख भी दूर हो जाता है ।। २६ ।।