महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते । स्नेहात् तु सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च ॥ २७ ॥ ‘मनके दुःखका मूल कारण क्या है? इसका पता लगानेपर ‘स्नेह’ (संसारमें आसक्ति)-की ही उपलब्धि होती है। इसी स्नेहके कारण ही जीव कहीं आसक्त होता और दुःख पाता है ॥ २७ ॥
स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भयानि च । शोकहर्षौ तथाऽऽयासः सर्वं स्नेहात् प्रवर्तते ॥ २८ ॥ स्नेहाद् भावोऽनुरागश्च प्रजज्ञे विषये तथा । अश्रेयस्कावुभावेतौ पूर्वस्तत्र गुरुः स्मृतः ॥ २९ ॥ ‘दुःखका मूल कारण है आसक्ति। आसक्तिसे ही भय होता है। शोक, हर्ष तथा क्लेश—इन सबकी प्राप्ति भी आसक्तिके कारण ही होती है। आसक्तिसे ही विषयोंमें भाव और अनुराग होते हैं। ये दोनों ही अमंगलकारी हैं। इनमें भी पहला अर्थात् विषयोंके प्रति भाव महान् अनर्थकारक माना गया है ॥ २८-२९ ॥
कोटराग्निर्यथाशेषं समूलं पादपं दहेत् । धर्मार्थौ तु तथाल्पोऽपि रागदोषो विनाशयेत् ॥ ३० ॥ ‘जैसे खोखलेमें लगी हुई आग सम्पूर्ण वृक्षको जड़-मूलसहित जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार विषयोंके प्रति थोड़ी-सी भी आसक्ति धर्म और अर्थ दोनोंका नाश कर देती है ॥ ३० ॥
विप्रयोगे न तु त्यागी दोषदर्शी समागमे । विरागं भजते जन्तुर्निर्वैरो निरवग्रहः ॥ ३१ ॥ ‘विषयोंके प्राप्त न होनेपर जो उनका त्याग करता है, वह त्यागी नहीं है; अपितु जो विषयोंके प्राप्त होनेपर भी उनमें दोष देखकर उनका परित्याग करता है, वस्तुतः वही त्यागी है—वही वैराग्यको प्राप्त होता है। उसके मनमें किसीके प्रति द्वेषभाव न होनेके कारण वह निर्वैर तथा बन्धनमुक्त होता है ॥ ३१ ॥
तस्मात् स्नेहं न लिप्सेत मित्रेभ्यो धनसंचयात् । स्वशरीरसमुत्थं च ज्ञानेन विनिवर्तयेत् ॥ ३२ ॥ ‘इसलिये मित्रों तथा धनराशिको पाकर इनके प्रति स्नेह (आसक्ति) न करे। अपने शरीरसे उत्पन्न हुई आसक्तिको ज्ञानसे निवृत्त करे ॥ ३२ ॥
ज्ञानान्वितेषु युक्तेषु शास्त्रज्ञेषु कृतात्मसु । न तेषु सज्जते स्नेहः पद्मपत्रेष्विवोदकम् ॥ ३३ ॥ ‘जो ज्ञानी, योगयुक्त, शास्त्रज्ञ तथा मनको वशमें रखनेवाले हैं, उनपर आसक्तिका प्रभाव उसी प्रकार नहीं पड़ता, जैसे कमलके पत्तेपर जल नहीं ठहरता ॥ ३३ ॥
रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते ।