महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुधिष्ठिर! विदर्भराजकुमारीके ऐसा कहनेपर राजा नल पुनः वहीं लौट आये, जहाँ देवताओंसे उनकी भेंट हुई थी ॥ २२ ॥ तमपश्यंस्तथाऽऽयान्तं लोकपाला महेश्वराः। दृष्ट्वा चैनं ततोऽपृच्छन् वृत्तान्तं सर्वमेव तम्॥ २३॥ महान् शक्तिशाली लोकपालोंने इस प्रकार राजा नलको लौटते देखा और उन्हें देखकर उनसे सारा वृत्तान्त पूछा— ॥ २३ ॥ कच्चिद् दृष्टा त्वया राजन् दमयन्ती शुचिस्मिता। किमब्रवीच्च नः सर्वान् वद भूमिप तेऽनघ॥ २४ ॥ ‘राजन्! क्या तुमने पवित्र मुसकानवाली दमयन्तीको देखा है? पापरहित भूपाल! हम सब लोगोंको उसने क्या संदेश दिया, बताओ’ ॥ २४ ॥
नल उवाच
भवद्भिरहमादिष्टो दमयन्त्या निवेशनम्। प्रविष्टः सुमहाकक्षं दण्डिभिः स्थविरैर्वृतम्॥ २५॥ **नलने कहा—**देवताओ! आपकी आज्ञा पाकर मैं दमयन्तीके महलमें गया। उसकी ड्योढ़ी विशाल थी और दण्डधारी बूढ़े रक्षक उसे घेरकर पहरा दे रहे थे ॥ २५ ॥ प्रविशन्तं च मां तत्र न कश्चिद् दृष्टवान् नरः। ऋते तां पार्थिवसुतां भवतामेव तेजसा॥ २६॥ आपलोगोंके प्रभावसे उसमें प्रवेश करते समय मुझे वहाँ उस राजकन्या दमयन्तीके सिवा दूसरे किसी मनुष्यने नहीं देखा ॥ २६ ॥ सख्यश्चास्या मया दृष्टास्ताभिश्चाप्युपलक्षितः। विस्मिताश्चाभवन् सर्वा दृष्ट्वा मां विबुधेश्वराः ॥ २७॥ दमयन्तीकी सखियोंको भी मैंने देखा और उन सखियोंने भी मुझे देखा। देवेश्वरो! वे सब मुझे देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं ॥ २७ ॥ वर्ण्यमानेषु च मया भवत्सु रुचिरानना। मामेव गतसंकल्पा वृणीते सा सुरोत्तमाः ॥ २८॥ श्रेष्ठ देवताओ! जब मैं आपलोगोंके प्रभावका वर्णन करने लगा, उस समय सुमुखी दमयन्तीने मुझमें ही अपना मानसिक संकल्प रखकर मेरा ही वरण किया ॥ २८ ॥ अब्रवीच्चैव मां बाला आयान्तु सहिताः सुराः। त्वया सह नरव्याघ्र मम यत्र स्वयंवरः ॥ २९॥ उस बालाने मुझसे यह भी कहा कि ‘नरव्याघ्र! सब देवता आपके साथ उस स्थानपर पधारें, जहाँ मेरा स्वयंवर होनेवाला है ॥ २९ ॥ तेषामहं संनिधौ त्वां वरयिष्यामि नैषध।