महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ
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एवं तव महाबाहो दोषो न भवितेति ह ॥ ३० ॥
‘निषधराज! मैं उन देवताओंके समीप ही आपका वरण कर लूँगी। महाबाहो! ऐसा होनेपर आपको दोष नहीं लगेगा’ ॥ ३० ॥
एतावदेव विबुधा यथावृत्तमुपाहृतम् ।
मयाऽशेषे प्रमाणं तु भवन्तस्त्रिदशेश्वराः ॥ ३१ ॥
देवताओ! दमयन्तीके महलका इतना ही वृत्तान्त है, जिसे मैंने ठीक-ठीक निवेदन कर दिया। देवेश्वरगण! अब इस सम्पूर्ण विषयमें आप सब देवतालोग ही प्रमाण हैं, अर्थात् आप ही साक्षी हैं ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलकर्तृकदेवदौत्ये
षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकर्तृक देवदौत्यविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५६ ॥