भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 412

ततो हाहेति सहसा मुक्तः शब्दो नराधिपैः ॥ २८ ॥ फिर तो दूसरे राजाओंके मुखसे सहसा ‘हाहाकार’-का शब्द निकल पड़ा ॥ २८ ॥ देवैर्महर्षिभिस्तत्र साधु साध्विति भारत । विस्मितैरिरितः शब्दः प्रशंसद्भिर्नलं नृपम् ॥ २९ ॥ भारत! देवता और महर्षि वहाँ साधुवाद देने लगे। सबने विस्मित होकर राजा नलकी प्रशंसा करते हुए इनके सौभाग्यको सराहा ॥ २९ ॥ दमयन्तीं तु कौरव्य वीरसेनसुतो नृपः । आश्वासयद् वरारोहां प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ३० ॥ कुरुनन्दन! वीरसेनकुमार नलने उल्लसित हृदयसे सुन्दरी दमयन्तीको आश्वासन देते हुए कहा— ॥ ३० ॥ यत् त्वं भजसि कल्याणि पुमांसं देवसंनिधौ । तस्मान्मां विद्धि भर्तारमेवं ते वचने रतम् ॥ ३१ ॥ ‘कल्याणी! तुम देवताओंके समीप जो मुझ-जैसे पुरुषका वरण कर रही हो, इस अलौकिक अनुरागके कारण अपने इस पतिको तुम सदा अपनी प्रत्येक आज्ञाके पालनमें तत्पर समझो ॥ ३१ ॥ यावच्च मे धरिष्यन्ति प्राणा देहे शुचिस्मिते । तावत् त्वयि भविष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३२ ॥ ‘पवित्र मुसकानवाली देवि! मेरे इस शरीरमें जबतक प्राण रहेंगे, तबतक तुममें मेरा अनन्य अनुराग बना रहेगा, यह मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ’ ॥ ३२ ॥ दमयन्ती तथा वाग्भिरभिनन्द्य कृताञ्जलिः । तौ परस्परतः प्रीतौ दृष्ट्वा त्वग्निपुरोगमान् ॥ ३३ ॥ तानेव शरणं देवाञ्जग्मुतुर्मनसा तदा । इसी प्रकार दमयन्तीने भी हाथ जोड़कर विनीत वचनोंद्वारा महाराज नलका अभिनन्दन किया। वे दोनों एक-दूसरेको पाकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सामने अग्नि आदि देवताओंको देखकर मन-ही-मन उनकी ही शरण ली ॥ ३३ १/२ ॥ वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः ॥ ३४ ॥ प्रहृष्टमनसः सर्वे नलायाष्टौ वरान् ददुः । दमयन्तीने जब नलका वरण कर लिया, तब उन सब महातेजस्वी लोकपालोंने प्रसन्नचित्त होकर नलको आठ वरदान दिये ॥ ३४ १/२ ॥ प्रत्यक्षदर्शनं यज्ञे गतिं चानुत्तमां शुभाम् ॥ ३५ ॥ नैषधाय ददौ शक्रः प्रीयमाणः शचीपतिः । शचीपति इन्द्रने प्रसन्न होकर निषधराज नलको यह वर दिया कि ‘मैं यज्ञमें तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा और अन्तमें सर्वोत्तम शुभ गति प्रदान करूँगा’ ॥ ३५ १/२ ॥