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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

ततो हाहेति सहसा मुक्तः शब्दो नराधिपैः ॥ २८ ॥ फिर तो दूसरे राजाओंके मुखसे सहसा ‘हाहाकार’-का शब्द निकल पड़ा ॥ २८ ॥ देवैर्महर्षिभिस्तत्र साधु साध्विति भारत । विस्मितैरिरितः शब्दः प्रशंसद्भिर्नलं नृपम् ॥ २९ ॥ भारत! देवता और महर्षि वहाँ साधुवाद देने लगे। सबने विस्मित होकर राजा नलकी प्रशंसा करते हुए इनके सौभाग्यको सराहा ॥ २९ ॥ दमयन्तीं तु कौरव्य वीरसेनसुतो नृपः । आश्वासयद् वरारोहां प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ३० ॥ कुरुनन्दन! वीरसेनकुमार नलने उल्लसित हृदयसे सुन्दरी दमयन्तीको आश्वासन देते हुए कहा— ॥ ३० ॥ यत् त्वं भजसि कल्याणि पुमांसं देवसंनिधौ । तस्मान्मां विद्धि भर्तारमेवं ते वचने रतम् ॥ ३१ ॥ ‘कल्याणी! तुम देवताओंके समीप जो मुझ-जैसे पुरुषका वरण कर रही हो, इस अलौकिक अनुरागके कारण अपने इस पतिको तुम सदा अपनी प्रत्येक आज्ञाके पालनमें तत्पर समझो ॥ ३१ ॥ यावच्च मे धरिष्यन्ति प्राणा देहे शुचिस्मिते । तावत् त्वयि भविष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३२ ॥ ‘पवित्र मुसकानवाली देवि! मेरे इस शरीरमें जबतक प्राण रहेंगे, तबतक तुममें मेरा अनन्य अनुराग बना रहेगा, यह मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ’ ॥ ३२ ॥ दमयन्ती तथा वाग्भिरभिनन्द्य कृताञ्जलिः । तौ परस्परतः प्रीतौ दृष्ट्वा त्वग्निपुरोगमान् ॥ ३३ ॥ तानेव शरणं देवाञ्जग्मुतुर्मनसा तदा । इसी प्रकार दमयन्तीने भी हाथ जोड़कर विनीत वचनोंद्वारा महाराज नलका अभिनन्दन किया। वे दोनों एक-दूसरेको पाकर बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सामने अग्नि आदि देवताओंको देखकर मन-ही-मन उनकी ही शरण ली ॥ ३३ १/२ ॥ वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः ॥ ३४ ॥ प्रहृष्टमनसः सर्वे नलायाष्टौ वरान् ददुः । दमयन्तीने जब नलका वरण कर लिया, तब उन सब महातेजस्वी लोकपालोंने प्रसन्नचित्त होकर नलको आठ वरदान दिये ॥ ३४ १/२ ॥ प्रत्यक्षदर्शनं यज्ञे गतिं चानुत्तमां शुभाम् ॥ ३५ ॥ नैषधाय ददौ शक्रः प्रीयमाणः शचीपतिः । शचीपति इन्द्रने प्रसन्न होकर निषधराज नलको यह वर दिया कि ‘मैं यज्ञमें तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा और अन्तमें सर्वोत्तम शुभ गति प्रदान करूँगा’ ॥ ३५ १/२ ॥

अग्निरात्मभवं प्रादाद् यत्र वाञ्छति नैषधः ॥ ३६ ॥
लोकानात्मप्रभांश्चैव ददौ तस्मै हुताशनः ।
हविष्यभोक्ता अग्निदेवने नलको अपने ही समान तेजस्वी लोक प्रदान किये और यह भी कहा कि 'राजा नल जहाँ चाहेंगे, वहीं मैं प्रकट हो जाऊँगा' ॥ ३६ ½ ॥
यमस्त्वन्नरसं प्रादाद् धर्मे च परमां स्थितिम् ॥ ३७ ॥
यमराजने यह कहा कि 'राजा नलकी बनायी हुई रसोईमें उत्तमोत्तम रस एवं स्वाद उपलब्ध होगा और धर्ममें इनकी दृढ़ निष्ठा बनी रहेगी' ॥ ३७ ॥
अपां पतिरपां भावं यत्र वाञ्छति नैषधः ।
स्रजश्चोत्तमगन्धाढ्याः सर्वे च मिथुनं ददुः ॥ ३८ ॥
जलके स्वामी वरुणने नलकी इच्छाके अनुसार जल प्रकट होनेका वर दिया और यह भी कहा कि 'तुम्हारी पुष्पमालाएँ सदा उत्तम गन्धसे सम्पन्न होंगी।' इस प्रकार सब देवताओंने दो-दो वर दिये ॥ ३८ ॥
वरानेवं प्रदायास्य देवास्ते त्रिदिवं गताः ।
पार्थिवाश्चानुभूयास्य विवाहं विस्मयान्विताः ॥ ३९ ॥
दमयन्त्याश्च मुदिताः प्रतिजग्मुर्यथागतम् ।

इस प्रकार राजा नलको वरदान देकर वे देवता-लोग स्वर्गलोकको चले गये। स्वयंवरमें आये हुए राजा भी विस्मयविमुग्ध हो नल और दमयन्तीके विवाहोत्सवका-सा अनुभव करते हुए प्रसन्नतापूर्वक जैसे आये थे, वैसे लौट गये ॥ ३९ १/२ ॥

गतेषु पार्थिवेंद्रेषु भीमः प्रीतो महामनाः ॥ ४० ॥ विवाहं कारयामास दमयन्त्या नलस्य च । सब नरेशोंके विदा हो जानेपर महामना भीमने बड़ी प्रसन्नताके साथ नल-दमयन्तीका शास्त्रविधिके अनुसार विवाह कराया ॥ ४० १/२ ॥

उष्य तत्र यथाकामं नैषधो द्विपदां वरः ॥ ४१ ॥ भीमेन समनुज्ञातो जगाम नगरं स्वकम् । मनुष्योंमें श्रेष्ठ निषधनरेश नल अपनी इच्छाके अनुसार कुछ दिनोंतक ससुरालमें रहे, फिर विदर्भनरेश भीमकी आज्ञा ले (दमयन्तीसहित) अपनी राजधानीको चले गये ॥ ४१ १/२ ॥

अवाप्य नारीरत्नं तु पुण्यश्लोकोऽपि पार्थिवः ॥ ४२ ॥ रेमे सह तया राजञ्छच्येव बलवृत्रहा । राजन्! पुण्यश्लोक महाराज नलने भी उस रमणीरत्नको पाकर उसके साथ उसी प्रकार विहार किया, जैसे शचीके साथ इन्द्र करते हैं ॥ ४२ १/२ ॥

अतीव मुदितो राजा भ्राजमानोऽंशुमानिव ॥ ४३ ॥ अरञ्जयत् प्रजा वीरो धर्मेण परिपालयन् । राजा नल सूर्यके समान प्रकाशित होते थे। वीरवर नल अत्यन्त प्रसन्न रहकर अपनी प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए उसे प्रसन्न रखते थे ॥ ४३ १/२ ॥

ईजे चाप्यश्वमेधेन ययातिरिव नाहुषः ॥ ४४ ॥ अन्यैश्च बहुभिर्धीमान् क्रतुभिश्चाप्तदक्षिणैः । उन बुद्धिमान् नरेशने नहुषनन्दन ययातिकी भाँति अश्वमेध तथा पर्याप्त दक्षिणावाले दूसरे बहुत-से यज्ञोंका भी अनुष्ठान किया ॥ ४४ १/२ ॥

पुनश्च रमणीयेषु वनेषूपवनेषु च ॥ ४५ ॥ दमयन्त्या सह नलो विजहारामरोपमः । तदनन्तर देवतुल्य राजा नलने दमयन्तीके साथ रमणीय वनों और उपवनोंमें विहार किया ॥ ४५ १/२ ॥

जनयामास च ततो दमयन्त्यां महामनाः । इन्द्रसेनं सुतं चापि इन्द्रसेनां च कन्यकाम् ॥ ४६ ॥ महामना नलने दमयन्तीके गर्भसे इन्द्रसेन नामक एक पुत्र और इन्द्रसेना नामवाली एक कन्याको जन्म दिया ॥ ४६ ॥

एवं स यजमानश्च विहरंश्च नराधिपः ।
ररक्ष वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिपः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार यज्ञोंका अनुष्ठान तथा सुखपूर्वक विहार करते हुए महाराज नलने धन-धान्यसे सम्पन्न वसुन्धराका पालन किया ॥ ४७ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीस्वयंवरे
सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत दमयन्ती-स्वयंवरविषयक सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 416)

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अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

देवताओंके द्वारा नलके गुणोंका गान और उनके निषेध करनेपर भी नलके विरुद्ध कलियुगका कोप

बृहदश्व उवाच

वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः ।
यान्तो ददृशुरायान्तं द्वापरं कलिना सह ॥ १ ॥

बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! भीमकुमारी दमयन्तीद्वारा निषधनरेश नलका वरण हो जानेपर जब महातेजस्वी लोकपालगण स्वर्गलोकको जा रहे थे, उस समय मार्गमें उन्होंने देखा कि कलियुगके साथ द्वापर आ रहा है ॥ १ ॥

अथाब्रवीत् कलिं शक्रः सम्प्रेक्ष्य बलवृत्रहा ।
द्वापरेण सहायेन कले ब्रूहि क्व यास्यसि ॥ २ ॥

कलियुगको देखकर बल और वृत्रासुरका नाश करनेवाले इन्द्रने पूछा— 'कले! बताओ तो सही द्वापरके साथ कहाँ जा रहे हो?' ॥ २ ॥

ततोऽब्रवीत् कलिः शक्रं दमयन्त्याः स्वयंवरम् ।
गत्वा हि वरयिष्ये तां मनो हि मम तां गतम् ॥ ३ ॥

तब कलिने इन्द्रसे कहा— 'देवराज! मैं दमयन्तीके स्वयंवरमें जाकर उसका वरण करूँगा; क्योंकि मेरा मन उसके प्रति आसक्त हो गया है' ॥ ३ ॥

तमब्रवीत् प्रहस्येन्द्रो निवृत्तः स स्वयंवरः ।
वृतस्तया नलो राजा पतिरस्मत्समीपतः ॥ ४ ॥

तब इन्द्रने हँसकर कहा— 'वह स्वयंवर तो हो गया। हमारे समीप ही दमयन्तीने राजा नलको अपना पति चुन लिया ॥ ४ ॥

एवमुक्तस्तु शक्रेण कलिः कोपसमन्वितः ।
देवानान्त्र्य तान् सर्वानुवाचेदं वचस्तदा ॥ ५ ॥

इन्द्रके ऐसा कहनेपर कलियुगको क्रोध चढ़ आया और उसी समय उसने उन सब देवताओंको सम्बोधित करके यह बात कही— ॥ ५ ॥

देवानां मानुषं मध्ये यत् सा पतिमविन्दत ।
ततस्तस्या भवेन्न्याय्यं विपुलं दण्डधारणम् ॥ ६ ॥

'दमयन्तीने देवताओंके बीचमें मनुष्यका पतिरूपमें वरण किया है। अतः उसे बड़ा भारी दण्ड देना उचित प्रतीत होता है' ॥ ६ ॥

एवमुक्ते तु कलिना प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः ।

अस्माभिः समनुज्ञाते दमयन्त्या नलो वृतः ॥ ७ ॥ कलियुगके ऐसा कहनेपर देवताओंने उत्तर दिया—'दमयन्तीने हमारी आज्ञा लेकर नलका वरण किया है॥ का च सर्वगुणोपेतं नाश्रयेत नलं नृपम् । यो वेद धर्मानखिलान् यथावच्चरितव्रतः ॥ ८ ॥ योऽधीते चतुरो वेदान् सर्वानारव्यानपञ्चमान् । नित्यं तृप्ता गृहे यस्य देवा यज्ञेषु धर्मतः । अहिंसानिरतो यश्च सत्यवादी दृढव्रतः ॥ ९ ॥ यस्मिन् दाक्ष्यं धृतिर्ज्ञानं तपः शौचं दमः शमः । ध्रुवाणि पुरुषव्याघ्रे लोकपालसमे नृपे ॥ १० ॥ एवंरूपं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले । आत्मानं स शपेन्मूढो हन्यादात्मानमात्मना ॥ ११ ॥ 'राजा नल सर्वगुणसम्पन्न हैं। कौन स्त्री उनका वरण नहीं करेगी? जिन्होंने भलीभाँति ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके चारों वेदों तथा पंचम वेद समस्त इतिहास-पुराणका भी अध्ययन किया है, जो सब धर्मोंको जानते हैं, जिनके घरपर पंचयज्ञोंमें धर्मके अनुसार सम्पूर्ण देवता नित्य तृप्त होते हैं, जो अहिंसा-परायण, सत्यवादी तथा दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं, जिन नरश्रेष्ठ लोकपाल-सदृश तेजस्वी नलमें दक्षता, धैर्य, ज्ञान, तप, शौच, शम और दम आदि गुण नित्य निवास करते हैं। कले! ऐसे राजा नलको जो मूढ़ शाप देनेकी इच्छा रखता है, वह मानो अपनेको ही शाप देता है। अपने द्वारा अपना ही विनाश करता है॥ ८—११ ॥

एवंगुणं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले । कृच्छ्रे स नरके मज्जेदगाधे विपुले ह्रदे । एवमुक्त्वा कलिं देवा द्वापरं च दिवं ययुः ॥ १२ ॥ 'ऐसे सद्गुणसम्पन्न महाराज नलको जो शाप देनेकी कामना करेगा, वह कष्टसे भरे हुए अगाध एवं विशाल नरककुण्डमें निमग्न होगा।' कलियुग और द्वापरसे ऐसा कहकर देवतालोग स्वर्गमें चले गये ॥ १२ ॥

ततो गतेषु देवेषु कलिर्द्वापरमब्रवीत् । संहर्तुं नोत्सहे कोपं नले वत्स्यामि द्वापर ॥ १३ ॥ भ्रंशयिष्यामि तं राज्यान्न भैम्या सह रंस्यते । त्वमप्यक्षान् समाविश्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥ १४ ॥ तदनन्तर देवताओंके चले जानेपर कलियुगने द्वापरसे कहा—'द्वापर! मैं अपने क्रोधका उपसंहार नहीं कर सकता। नलके भीतर निवास करूँगा और उन्हें राज्यसे वंचित

कर दूँगा। जिससे वे दमयन्तीसे रमण नहीं कर सकेंगे। तुम्हें भी जूएके पासोंमें प्रवेश करके मेरी सहायता करनी चाहिये' ।। १३-१४ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कलिदेवसंवादे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें कलि-देवता-संवादविषयक अट्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५८ ।।

अध्याय (पृष्ठ 419)

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एकोनषष्टितमोऽध्यायः

नलमें कलियुगका प्रवेश एवं नल और पुष्करकी द्यूतक्रीडा, प्रजा और दमयन्तीके निवारण करनेपर भी राजाका द्यूतसे निवृत्त नहीं होना

बृहदश्व उवाच

एवं स समयं कृत्वा द्वापरेण कलिः सह ।
आजगाम ततस्तत्र यत्र राजा स नैषधः ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! इस प्रकार द्वापरके साथ संकेत करके कलियुग उस स्थानपर आया, जहाँ निषधराज नल रहते थे ॥ १ ॥

स नित्यमन्तरप्रेप्सुर्निषधेष्ववसच्चिरम् ।
अथास्य द्वादशे वर्षे ददर्श कलिरन्तरम् ॥ २ ॥
वह प्रतिदिन राजा नलका छिद्र देखता हुआ निषधदेशमें दीर्घकालतक टिका रहा। बारह वर्षोंके बाद एक दिन कलिको एक छिद्र दिखायी दिया ॥ २ ॥

कृत्वा मूत्रमुपस्पृश्य संध्यामन्वास्त नैषधः ।
अकृत्वा पादयोः शौचं तत्रैनं कलिराविशत् ॥ ३ ॥
राजा नल उस दिन लघुशंका करके आये और हाथ-मुँह धोकर आचमन करनेके पश्चात् संध्योपासना करने बैठ गये; पैरोंको नहीं धोया। यह छिद्र देखकर कलियुग उनके भीतर प्रविष्ट हो गया ॥ ३ ॥

स समाविश्य च नलं समीपं पुष्करस्य च ।
गत्वा पुष्करमाहेदमेहि दीव्य नलेन वै ॥ ४ ॥
नलमें आविष्ट होकर कलियुगने दूसरा रूप धारण करके पुष्करके पास जाकर कहा—'चलो, राजा नलके साथ जूआ खेलो ॥ ४ ॥

अक्षद्यूते नलं जेता भवान् हि सहितो मया ।
निषधान् प्रतिपद्यस्व जित्वा राज्यं नलं नृपम् ॥ ५ ॥
मेरे साथ रहकर तुम जूएमं अवश्य राजा नलको जीत लोगे। इस प्रकार महाराज नलको उनके राज्यसहित जीतकर निषधदेशको अपने अधिकारमें कर लो' ॥ ५ ॥

एवमुक्तस्तु कलिना पुष्करो नलमभ्ययात् ।
कलिश्चैव वृषो भूत्वा गवां पुष्करमभ्ययात् ॥ ६ ॥
कलिके ऐसा कहनेपर पुष्कर राजा नलके पास गया। कलि भी साँड़ बनकर पुष्करके साथ हो लिया ॥ ६ ॥

आसाद्य तु नलं वीरं पुष्करः परवीरहा । दीव्यावेत्यब्रवीद् भ्राता वृषेणेति मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पुष्करने वीरवर नलके पास जाकर उनसे बार-बार कहा—'हम दोनों धर्मपूर्वक जूआ खेलें।' पुष्कर राजा नलका भाई लगता था ॥ ७ ॥ न चक्षमे ततो राजा समाह्वानं महामनाः । वैदर्भ्याः प्रेक्षमाणायाः पणकालममन्यत ॥ ८ ॥ महामना राजा नल द्यूतके लिये पुष्करके आह्वानको न सह सके। विदर्भराजकुमारी दमयन्तीके देखते-देखते उसी क्षण जूआ खेलनेका उपयुक्त अवसर समझ लिया ॥ ८ ॥ हिरण्यस्य सुवर्णस्य यानयुग्यस्य वाससाम् । आविष्टः कलिना द्यूते जीयते स्म नलस्तदा ॥ ९ ॥ तमक्षमदसम्मत्तं सुहृदां न तु कश्चन । निवारणेऽभवच्छक्तो दीव्यमानमरिंदमम् ॥ १० ॥ तब कलियुगसे आविष्ट होकर राजा नल हिरण्य, सुवर्ण, रथ आदि वाहन और बहुमूल्य वस्त्र दाँवपर लगाते तथा हार जाते थे। सुहृदोंमें कोई भी ऐसा नहीं था, जो द्यूतक्रीड़ाके मदसे उन्मत्त शत्रुदमन नलको उस समय जूआ खेलनेसे रोक सके ॥ ९-१० ॥ ततः पौरजनाः सर्वे मन्त्रिभिः सह भारत । राजानं द्रष्टुमागच्छन् निवारयितुमातुरम् ॥ ११ ॥ भारत! तदनन्तर समस्त पुरवासी मनुष्य मन्त्रियोंके साथ राजासे मिलने तथा उन आतुर नरेशको द्यूतक्रीडासे रोकनेके लिये वहाँ आये ॥ ११ ॥ ततः सूत उपागम्य दमयन्त्यै न्यवेदयत् । एष पौरजनो देवि द्वारि तिष्ठति कार्यवान् ॥ १२ ॥ इसी समय सारथिने महलमें जाकर महारानी दमयन्तीसे निवेदन किया—'देवि! ये पुरवासीलोग कार्यवश राजद्वारपर खड़े हैं ॥ १२ ॥ निवेद्यतां नैषधाय सर्वाः प्रकृतयः स्थिताः । अमृष्यमाणा व्यसनं राज्ञो धर्मार्थदर्शिनः ॥ १३ ॥ 'आप निषधराजसे निवेदन कर दें। धर्म-अर्थका तत्त्व जाननेवाले महाराजके भावी संकटको सहन न कर सकनेके कारण मन्त्रियोंसहित सारी प्रजा द्वारपर खड़ी है' ॥ १३ ॥ ततः सा बाष्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता । उवाच नैषधं भैमी शोकोपहतचेतना ॥ १४ ॥ यह सुनकर दुःखसे दुर्बल हुई दमयन्तीने शोकसे अचेत-सी होकर आँसू बहाते हुए गद्गदवाणीमें निषध-नरेशसे कहा— ॥ १४ ॥

राजन् पौरजनो द्वारि त्वां दिदृक्षुरवस्थितः । मन्त्रिभिः सहितः सर्वै राजभक्तिपुरस्कृतः ॥ १५ ॥ तं द्रष्टुमर्हसीत्येवं पुनः पुनरभाषत । तं तथा रुचिरापाङ्गीं विलपन्तीं तथाविधाम् ॥ १६ ॥ आविष्टः कलिना राजा नाभ्यभाषत किंचन । ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे ते चैव पुरवासिनः ॥ १७ ॥ नायमस्तीति दुःखार्ता व्रीडिता जग्मुरालयान् । तथा तदभवद् द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च । युधिष्ठिर बहून् मासान् पुण्यश्लोकस्त्वजीयत ॥ १८ ॥ ‘महाराज! पुरवासी प्रजा राजभक्तिपूर्वक आपसे मिलनेके लिये समस्त मन्त्रियोंके साथ द्वारपर खड़ी है। आप उन्हें दर्शन दें।' दमयन्तीने इन वाक्योंको बार-बार दुहराया। मनोहर नयनप्रान्तवाली विदर्भ-कुमारी इस प्रकार विलाप करती रह गयी, परंतु कलियुगसे आविष्ट हुए राजाने उससे कोई बाततक न की। तब वे सब मन्त्री और पुरवासी दुःखसे आतुर और लज्जित हो यह कहते हुए अपने-अपने घर चले गये कि ‘यह राजा नल अब राज्यपर अधिक समयतक रहनेवाला नहीं है।' युधिष्ठिर! पुष्कर और नलकी वह द्यूतक्रीडा

कई महीनोंतक चलती रही। पुण्यश्लोक महाराज नल उसमें हारते ही जा रहे थे ॥ १५—१८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलद्यूते एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥

इस प्रकार श्रीमद्भारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलद्यूतविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 423)

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षष्टितमोऽध्यायः

दुःखित दमयन्तीका वार्ष्णेयके द्वारा कुमार-कुमारीको कुण्डिनपुर भेजना

बृहदश्व उवाच

दमयन्ती ततो दृष्ट्वा पुण्यश्लोकं नराधिपम् ।
उन्मत्तवदनुन्मत्ता देवने गतचेतसम् ॥ १ ॥
भयशोकसमाविष्टा राजन् भीमसुता ततः ।
चिन्तयामास तत् कार्यं सुमहत् पार्थिवं प्रति ॥ २ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! तदनन्तर दमयन्तीने देखा कि पुण्यश्लोक महाराज नल उन्मत्तकी भाँति द्यूतक्रीडामें आसक्त हैं। वह स्वयं सावधान थी। उनकी वैसी अवस्था देख भीमकुमारी भय और शोकसे व्याकुल हो गयी और महाराजके हितके लिये किसी महत्त्वपूर्ण कार्यका चिन्तन करने लगी ॥ १-२ ॥

सा शङ्कमाना तत् पापं चिकीर्षन्ती च तत्प्रियम् ।
नलं च हृतसर्वस्वमुपलभ्येदमब्रवीत् ॥ ३ ॥
उसके मनमें यह आशंका हो गयी कि राजापर बहुत बड़ा कष्ट आनेवाला है। वह उनका प्रिय एवं हित करना चाहती थी। अतः महाराजके सर्वस्वका अपहरण होता जान धायको बुलाकर (इस प्रकार बोली) ॥ ३ ॥

बृहत्सेनामतियशां तां धात्रीं परिचारिकाम् ।
हितां सर्वार्थकुशलामनुरक्तां सुभाषिताम् ॥ ४ ॥
उसकी धायका नाम बृहत्सेना था। वह अत्यन्त यशस्विनी और परिचर्याके कार्यमें निपुण थी। समस्त कार्योंके साधनमें कुशल, हितैषिणी, अनुरागिणी और मधुरभाषिणी थी ॥ ४ ॥

बृहत्सेने व्रजामात्यानानाय्य नलशासनात् ।
आचक्ष्व यद्धृतं द्रव्यमवशिष्टं च यद् वसु ॥ ५ ॥
(दमयन्तीने उससे कहा)—‘बृहत्सेने! तुम मन्त्रियोंके पास जाओ तथा राजा नलकी आज्ञासे उन्हें बुला लाओ। फिर उन्हें यह बताओ कि अमुक-अमुक द्रव्य हारा जा चुका है और अमुक धन अभी अवशिष्ट है’ ॥ ५ ॥

ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे विज्ञाय नलशासनम् ।
अपि नो भागधेयं स्यादित्युक्त्वा नलमाव्रजन् ॥ ६ ॥

तब वे सब मन्त्री राजा नलका आदेश जानकर 'हमारा अहोभाग्य है', ऐसा कहते हुए नलके पास आये ।। तास्तु सर्वाः प्रकृतयो द्वितीयं समुपस्थिताः । न्यवेदयद् भीमसुता न च तत् प्रत्यनन्दत ।। ७ ।। वे सारी (मन्त्री आदि) प्रकृतियाँ दूसरी बार राजद्वारपर उपस्थित हुईं। दमयन्तीने इसकी सूचना महाराज नलको दी, परन्तु उन्होंने इस बातका अभिनन्दन नहीं किया ।। ७ ।। वाक्यमप्रतिनन्दन्तं भर्तारमभिवीक्ष्य सा । दमयन्ती पुनर्वेश्म व्रीडिता प्रविवेश ह ।। ८ ।। निशम्य सततं चाक्षान् पुण्यश्लोकपराङ्मुखान् । नलं च हृतसर्वस्वं धात्रीं पुनरुवाच ह ।। ९ ।। बृहत्सेने पुनर्गच्छ वार्ष्णेयं नलशासनात् । सूतमानय कल्याणि महत् कार्यमुपस्थितम् ।। १० ।। पतिको अपनी बातका प्रसन्नतापूर्वक उत्तर देते न देख दमयन्ती लज्जित हो पुनः महलके भीतर चली गयी। वहाँ फिर उसने सुना कि सारे पासे लगातार पुण्यश्लोक राजा नलके विपरीत पड़ रहे हैं और उनका सर्वस्व अपहृत हो रहा है। तब उसने पुनः धायसे कहा—'बृहत्सेने! फिर राजा नलकी आज्ञासे जाओ और वार्ष्णेय सूतको बुला लाओ। कल्याणि! एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है' ।। ८—१० ।। बृहत्सेना तु सा श्रुत्वा दमयन्त्याः प्रभाषितम् । वार्ष्णेयमानयामास पुरुषैराप्तकारिभिः ।। ११ ।। वार्ष्णेयं तु ततो भैमी सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा । उवाच देशकालज्ञा प्राप्तकालमनिन्दिता ।। १२ ।। बृहत्सेनाने दमयन्तीकी बात सुनकर विश्वसनीय पुरुषोंद्वारा वार्ष्णेयको बुलाया। तब अनिन्द्य स्वभाववाली और देश-कालको जाननेवाली भीमकुमारी दमयन्तीने वार्ष्णेयको मधुर वाणीमें सान्त्वना देते हुए यह समयोचित बात कही— ।। ११-१२ ।। जानीषे त्वं यथा राजा सम्यग् वृत्तः सदा त्वयि । तस्य त्वं विषमस्थस्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि ।। १३ ।। 'सूत! तुम जानते हो कि महाराज तुम्हारे प्रति कैसा अच्छा बर्ताव करते थे। आज वे विषम संकटमें पड़ गये हैं, अतः तुम्हें भी उनकी सहायता करनी चाहिये ।। १३ ।। यथा यथा हि नृपतिः पुष्करेणैव जीयते । तथा तथास्य वै द्यूते रागो भूयोऽभिवर्धते ।। १४ ।। 'राजा जैसे-जैसे पुष्करसे पराजित हो रहे हैं, वैसे-ही-वैसे जूएमेंग उनकी आसक्ति बढ़ती जा रही है ।।

यथा च पुष्करस्याक्षाः पतन्ति वशवर्तिनः । तथा विपर्ययश्चापि नलस्याक्षेषु दृश्यते ॥ १५ ॥ ‘जैसे पुष्करके पासे उसकी इच्छाके अनुसार पड़ रहे हैं, वैसे ही नलके पासे विपरीत पड़ते देखे जा रहे हैं ॥ १५ ॥ सुहृत्स्वजनवाक्यानि यथावन्न शृणोति च । ममापि च तथा वाक्यं नाभिनन्दति मोहितः ॥ १६ ॥ नूनं मन्ये न दोषोऽस्ति नैषधस्य महात्मनः । यत् तु मे वचनं राजा नाभिनन्दति मोहितः ॥ १७ ॥ ‘वे सुहृदों और स्वजनोंके वचन अच्छी तरह नहीं सुनते हैं। जूएने उन्हें ऐसा मोहित कर रखा है कि इस समय वे मेरी बातका भी आदर नहीं कर रहे हैं। मैं इसमें महामना नैषधका निश्चय ही कोई दोष नहीं मानती। जूएसे मोहित होनेके कारण ही राजा मेरी बातका अभिनन्दन नहीं कर रहे हैं ॥ १६-१७ ॥ शरणं त्वां प्रपन्नास्मि सारथे कुरु मद्द्वचः । न हि मे शुध्यते भावः कदाचित् विनशेदपि ॥ १८ ॥ ‘सारथे! मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ, मेरी बात मानो। मेरे मनमें अशुभ विचार आते हैं, इससे अनुमान होता है कि राजा नलका राज्यसे च्युत होना सम्भव है ॥ १८ ॥ नलस्य दयितानश्वान् योजयित्वा मनोजवान् । इदमारोप्य मिथुनं कुण्डिनं यातुमर्हसि ॥ १९ ॥ ‘तुम महाराजके प्रिय, मनके समान वेगशाली अश्वोंको रथमें जोतकर उसपर इन दोनों बच्चोंको बिठा लो और कुण्डिनपुरको चले जाओ’ ॥ १९ ॥ मम ज्ञातिषु निक्षिप्य दारकौ स्यन्दनं तथा । अश्वांश्चैमान् यथाकामं वस वान्यत्र गच्छ वा ॥ २० ॥ ‘वहाँ इन दोनों बालकोंको, इस रथको और इन घोड़ोंको भी मेरे भाई-बन्धुओंकी देख-रेखमें सौंपकर तुम्हारी इच्छा हो तो वहीं रह जाना या अन्यत्र कहीं चले जाना’ ॥ २० ॥ दमयन्त्यास्तु तद् वाक्यं वार्ष्णेयो नलसारथिः । न्यवेदयदशेषेण नलामात्येषु मुख्यशः ॥ २१ ॥ दमयन्तीकी यह बात सुनकर नलके सारथि वार्ष्णेयने नलके मुख्य-मुख्य मन्त्रियोंसे यह सारा वृत्तान्त निवेदित किया ॥ २१ ॥ तैः समेत्य विनिश्चित्य सोऽनुज्ञातो महीपते । ययौ मिथुनमारोप्य विदर्भांस्तेन वाहिना ॥ २२ ॥ राजन्! उनसे मिलकर इस विषयपर भलीभाँति विचार करके उन मन्त्रियोंकी आज्ञा ले सारथि वार्ष्णेयने दोनों बालकोंको रथपर बैठाकर विदर्भ देशको प्रस्थान किया ॥ २२ ॥ हयांस्तत्र विनिक्षिप्य सूतो रथवरं च तम् ।

इन्द्रसेनां च तां कन्यामिन्द्रसेनं च बालकम् ॥ २३ ॥
आमन्त्र्य भीमं राजानमार्तः शोचन् नलं नृपम् ।
अटमानस्ततोऽयोध्यां जगाम नगरीं तदा ॥ २४ ॥
वहाँ पहुँचकर उसने घोड़ोंको, उस श्रेष्ठ रथ-को तथा उस बालिका इन्द्रसेनाको एवं राजकुमार इन्द्रसेनको वहीं रख दिया तथा राजा भीमसे विदा ले आर्तभावसे राजा नलकी दुर्दशाके लिये शोक करता हुआ घूमता-घामता अयोध्या नगरीमें चला गया ॥ २३-२४ ॥
ऋतुपर्णं स राजानमुपतस्थे सुदुःखितः ।
भृतिं चोपययौ तस्य सारथ्येन महीपते ॥ २५ ॥
युधिष्ठिर! वह अत्यन्त दुःखी हो राजा ऋतुपर्णकी सेवामें उपस्थित हुआ और उनका सारथि बनकर जीविका चलाने लगा ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कुण्डिनं प्रति कुमारयोः प्रस्थापने षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलकी कन्या और पुत्रको कुण्डिनपुर भेजनेसे सम्बन्ध रखनेवाला साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥

अध्याय (पृष्ठ 427)

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एकषष्टितमोऽध्यायः

नलका जूएमें हारकर दमयन्तीके साथ वनको जाना और पक्षियोंद्वारा आपद्ग्रस्त नलके वस्त्रका अपहरण

बृहदश्व उवाच

ततस्तु याते वार्ष्णेये पुण्यश्लोकस्य दीव्यतः ।
पुष्करेण हृतं राज्यं यच्चान्यद् वसु किंचन ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं—युधिष्ठिर! तदनन्तर वार्ष्णेयके चले जानेपर जूआ खेलनेवाले पुण्यश्लोक महाराज नलके सारे राज्य और जो कुछ धन था, उन सबका जूएमें पुष्करने अपहरण कर लिया ॥ १ ॥

हृतराज्यं नलं राजन् प्रहसन् पुष्करोऽब्रवीत् ।
द्यूतं प्रवर्ततां भूयः प्रतिपाणोऽस्ति कस्तव ॥ २ ॥
राजन्! राज्य हार जानेपर नलसे पुष्करने हँसते हुए कहा कि ‘क्या फिर जूआ आरम्भ हो? अब तुम्हारे पास दाँवपर लगानेके लिये क्या है?’ ॥ २ ॥

शिष्टा ते दमयन्त्येका सर्वमन्यज्जितं मया ।
दमयन्त्याः पणः साधु वर्ततां यदि मन्यसे ॥ ३ ॥
‘तुम्हारे पास केवल दमयन्ती शेष रह गयी है और सब वस्तुएँ तो मैंने जीत ली हैं, यदि तुम्हारी राय हो तो दमयन्तीको दाँवपर रखकर एक बार फिर जूआ खेला जाय’ ॥ ३ ॥

पुष्करेणैवमुक्तस्य पुण्यश्लोकस्य मन्युना ।
व्यदीर्यतेव हृदयं न चैनं किंचिदब्रवीत् ॥ ४ ॥
पुष्करके ऐसा कहनेपर पुण्यश्लोक महाराज नलका हृदय शोकसे विदीर्ण-सा हो गया, परंतु उन्होंने उससे कुछ कहा नहीं ॥ ४ ॥

ततः पुष्करमालोक्य नलः परममन्युमान् ।
उत्सृज्य सर्वगात्रेभ्यो भूषणानि महायशाः ॥ ५ ॥
एकवासा ह्यसंवीतः सुहृच्छोकविवर्धनः ।
निश्चक्राम ततो राजा त्यक्त्वा सुविपुलां श्रियम् ॥ ६ ॥
तदनन्तर महायशस्वी नलने अत्यन्त दुःखित हो पुष्करकी ओर देखकर अपने सब अंगोंके आभूषण उतार दिये और केवल एक अधोवस्त्र धारण करके चादर ओढ़े बिना ही अपनी विशाल सम्पत्तिको त्यागकर सुहृदोंका शोक बढ़ाते हुए वे राजभवनसे निकल पड़े ॥ ५-६ ॥

दमयन्त्येकवस्त्राथ गच्छन्तं पृष्ठतोऽन्वगात् ।

स तया बाह्यतः सार्धं त्रिरात्रं नैषधोऽवसत् ।। ७ ।। दमयन्तीके शरीरपर भी एक ही वस्त्र था। वह जाते हुए राजा नलके पीछे हो ली। वे उसके साथ नगरसे बाहर तीन राततक टिके रहे ।। ७ ।। पुष्करस्तु महाराज घोषयामास वै पुरे । नले यः सम्यगातिष्ठेत् स गच्छेद् वध्यतां मम ।। ८ ।। महाराज! पुष्करने उस नगरमें यह घोषणा करा दी—डुग्गी पिटवा दी कि ‘जो नलके साथ अच्छा बर्ताव करेगा, वह मेरा वध्य होगा’ ।। ८ ।। पुष्करस्य तु वाक्येन तस्य विद्वेषणेन च । पौरा न तस्य सत्कारं कृतवन्तो युधिष्ठिर ।। ९ ।। युधिष्ठिर! पुष्करके उस वचनसे और नलके प्रति पुष्करका द्वेष होनेसे पुरवासियोंने राजा नलका कोई सत्कार नहीं किया ।। ९ ।। स तथा नगराभ्याशे सत्कारार्हो न सत्कृतः । त्रिरात्रमुषितो राजा जलमात्रेण वर्तयन् ।। १० ।। इस प्रकार राजा नल अपने नगरके समीप तीन राततक केवल जलमात्रका आहार करके टिके रहे। वे सर्वथा सत्कारके योग्य थे तो भी उनका सत्कार नहीं किया गया ।। १० ।। पीड्यमानः क्षुधा तत्र फलमूलानि कर्षयन् । प्रातिष्ठत ततो राजा दमयन्ती तमन्वगात् ।। ११ ।। वहाँ भूखसे पीड़ित हो फल-मूल आदि जुटाते हुए राजा नल वहाँसे अन्यत्र चले गये। केवल दमयन्ती उनके पीछे-पीछे गयी ।। ११ ।। क्षुधया पीड्यमानस्तु नलो बहुतिथेऽहनि । अपश्यच्छकुनान् कांश्चिद्धिरण्यसदृशच्छदान् ।। १२ ।। इसी प्रकार नल बहुत दिनोंतक क्षुधासे पीड़ित रहे। एक दिन उन्होंने कुछ ऐसे पक्षी देखे, जिनकी पाँखें सोनेकी-सी थीं ।। १२ ।। स चिन्तयामास तदा निषधाधिपतिर्बली । अस्ति भक्ष्यो ममाद्यायं वसु चेदं भविष्यति ।। १३ ।। उन्हें देखकर (क्षुधातुर और आपत्तिग्रस्त होनेके कारण) बलवान् निषधनरेशके मनमें यह बात आयी कि ‘यह पक्षियोंका समुदाय ही आज मेरा भक्ष्य हो सकता है और इनकी ये पाँखें मेरे लिये धन हो जायँगी’ ।। १३ ।।

ततस्तान् परिधानेन वाससा स समावृणोत् ।
तस्य तद् वस्त्रमादाय सर्वे जग्मुर्विहायसा ।। १४ ।।
तदनन्तर उन्होंने अपने अधोवस्त्रसे उन पक्षियोंको ढँक दिया। किंतु वे सब पक्षी उनका वह वस्त्र लेकर आकाशमें उड़ गये ।। १४ ।।
उत्पतन्तः खगा वाक्यमेतदाहुस्ततो नलम् ।
दृष्ट्वा दिग्वाससं भूमौ स्थितं दीनमधोमुखम् ।। १५ ।।
उड़ते हुए उन पक्षियोंने राजा नलको दीनभावसे नीचे मुँह किये धरतीपर नग्न खड़ा देख उनसे कहा— ।।
वयमक्षाः सुदुर्बुद्धे तव वासो जिहीर्षवः ।
आगता न हि नः प्रीतिः सवाससि गते त्वयि ।। १६ ।।
‘ओ खोटी बुद्धिवाले नरेश! हम (पक्षी नहीं,) पासे हैं और तुम्हारा वस्त्र अपहरण करनेकी इच्छासे ही यहाँ आये थे। तुम वस्त्र पहने हुए ही वहाँसे चले आये थे, इससे हमें प्रसन्नता नहीं हुई थी’ ।। १६ ।।
तान् समीपगतानक्षानात्मानं च विवाससम् ।
पुण्यश्लोकस्तदा राजन् दमयन्तीमथाब्रवीत् ।। १७ ।।

येषां प्रकोपादैश्वर्यात् प्रच्युतोऽहमनिन्दिते । प्राणयात्रां न विन्देयं दुःखितः क्षुधयान्वितः ॥ १८ ॥ येषां कृते न सत्कारमकुर्वन् मयि नैषधाः । इमे ते शकुना भूत्वा वासो भीरु हरन्ति मे ॥ १९ ॥ राजन्! उन पासोंको नजदीकसे जाते देख और अपने-आपको नग्नावस्थामें पाकर पुण्यश्लोक नलने उस समय दमयन्तीसे कहा—'सती साध्वी रानी! जिनके क्रोधसे मेरा ऐश्वर्य छिन गया, मैं क्षुधापीड़ित एवं दुःखित होकर जीवन-निर्वाहके लिये अन्नतक नहीं पा रहा हूँ और जिनके कारण निषधदेशकी प्रजाने मेरा सत्कार नहीं किया, भीरु! वे ही ये पासे हैं, जो पक्षी होकर मेरा वस्त्र लिये जा रहे हैं ॥ १७—१९ ॥ वैषम्यं परमं प्राप्तो दुःखितो गतचेतनः । भर्ता तेऽहं निबोधेदं वचनं हितमात्मनः ॥ २० ॥ 'मैं बड़ी विषम परिस्थितिमें पड़ गया हूँ। दुःखके मारे मेरी चेतना लुप्त-सी हो रही है। मैं तुम्हारा पति हूँ, अतः तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ, इसे सुनो— ॥ २० ॥ एते गच्छन्ति बहवः पन्थानो दक्षिणापथम् । अवन्तीमृक्षवन्तं च समतिक्रम्य पर्वतम् ॥ २१ ॥ 'ये बहुत-से मार्ग हैं, जो दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं। यह मार्ग ऋक्षवान् पर्वतको लाँघकर अवन्ती-देशको जाता है ॥ २१ ॥ एष विन्ध्यो महाशैलः पयोष्णी च समुद्रगा । आश्रमाश्च महर्षीणां बहुमूलफलान्विताः ॥ २२ ॥ एष पन्था विदर्भाणामसौ गच्छति कोसलान् । अतः परं च देशोऽयं दक्षिणे दक्षिणापथः ॥ २३ ॥ 'यह महान् पर्वत विन्ध्य दिखायी दे रहा है और यह समुद्रगामिनी पयोष्णी नदी है। यहाँ महर्षियोंके बहुत-से आश्रम हैं, जहाँ प्रचुर मात्रामें फल-मूल उपलब्ध हो सकते हैं। यह विदर्भदेशका मार्ग है और वह कोसलदेशको जाता है। दक्षिण दिशामें इसके बादका देश दक्षिणापथ कहलाता है' ॥ २२-२३ ॥ एतद् वाक्यं नलो राजा दमयन्तीं समाहितः । उवाचासकृदार्तो हि भैमीमुद्दिश्य भारत ॥ २४ ॥ भारत! राजा नलने एकाग्रचित्त होकर बड़ी आतुरताके साथ दमयन्तीसे उपर्युक्त बातें बार-बार कहीं ॥ २४ ॥ ततः सा बाष्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता । उवाच दमयन्ती तं नैषधं करुणं वचः ॥ २५ ॥ तब दमयन्ती अत्यन्त दुःखसे दुर्बल हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई गद्गद वाणीमें राजा नलसे यह करुण वचन बोली— ॥ २५ ॥

उद्वेजते मे हृदयं सीदन्त्यङ्गानि सर्वशः ।
तव पार्थिव संकल्पं चिन्तयन्त्याः पुनः पुनः ॥ २६ ॥
हृतराज्यं हृतद्रव्यं विवस्त्रं क्षुच्छ्रमान्वितम् ।
कथमुत्सृज्य गच्छेयमहं त्वां निर्जने वने ॥ २७ ॥
‘महाराज! आपका मानसिक संकल्प क्या है, इसपर जब मैं बार-बार विचार करती हूँ, तब मेरा हृदय उद्विग्न हो उठता है और सारे अंग शिथिल हो उठते हैं। आपका राज्य छिन गया। धन नष्ट हो गया। आपके शरीरपर वस्त्रतक नहीं रह गया तथा आप भूख और परिश्रमसे कष्ट पा रहे हैं। ऐसी अवस्थामें इस निर्जन वनमें आपको असहाय छोड़कर मैं कैसे जा सकती हूँ? ॥

श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य चिन्तयानस्य तत् सुखम् ।
वने घोरे महाराज नाशयिष्याम्यहं क्लमम् ॥ २८ ॥
‘महाराज! जब आप भयंकर वनमें थके-माँदे भूखसे पीड़ित हो अपने पूर्व सुखका चिन्तन करते हुए अत्यन्त दुःखी होने लगेंगे, उस समय मैं सान्त्वनाद्वारा आपके संतापका निवारण करूँगी ॥ २८ ॥

न च भार्यासमं किंचिद् विद्यते भिषजां मतम् ।
औषधं सर्वदुःखेषु सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २९ ॥
‘चिकित्सकोंका मत है कि समस्त दुःखोंकी शान्तिके लिये पत्नीके समान दूसरी कोई औषध नहीं है; यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ’ ॥ २९ ॥

नल उवाच

एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं दमयन्ति सुमध्यमे ।
नास्ति भार्यासमं मित्रं नरस्यार्तस्य भेषजम् ॥ ३० ॥
**नलने कहा—**सुमध्यमा दमयन्ती! तुम जैसा कहती हो वह ठीक है। दुःखी मनुष्यके लिये पत्नीके समान दूसरा कोई मित्र या औषध नहीं है ॥ ३० ॥

न चाहं त्यक्तकामस्त्वां किमलं भीरु शङ्कसे ।
त्यजेयमहमात्मानं न चैव त्वामनिन्दिते ॥ ३१ ॥
भीरु! मैं तुम्हें त्यागना नहीं चाहता, तुम इतनी अधिक शंका क्यों करती हो? अनिन्दिते! मैं अपने शरीरका त्याग कर सकता हूँ, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता ॥ ३१ ॥

दमयन्त्युवाच

यदि मां त्वं महाराज न विहातुमिहेच्छसि ।
तत् किमर्थं विदर्भाणां पन्थाः समुपदिश्यते ॥ ३२ ॥
**दमयन्तीने कहा—**महाराज! यदि आप मुझे त्यागना नहीं चाहते तो विदर्भदेशका मार्ग क्यों बता रहे हैं? ॥ ३२ ॥