महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 420, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंआसाद्य तु नलं वीरं पुष्करः परवीरहा । दीव्यावेत्यब्रवीद् भ्राता वृषेणेति मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पुष्करने वीरवर नलके पास जाकर उनसे बार-बार कहा—'हम दोनों धर्मपूर्वक जूआ खेलें।' पुष्कर राजा नलका भाई लगता था ॥ ७ ॥ न चक्षमे ततो राजा समाह्वानं महामनाः । वैदर्भ्याः प्रेक्षमाणायाः पणकालममन्यत ॥ ८ ॥ महामना राजा नल द्यूतके लिये पुष्करके आह्वानको न सह सके। विदर्भराजकुमारी दमयन्तीके देखते-देखते उसी क्षण जूआ खेलनेका उपयुक्त अवसर समझ लिया ॥ ८ ॥ हिरण्यस्य सुवर्णस्य यानयुग्यस्य वाससाम् । आविष्टः कलिना द्यूते जीयते स्म नलस्तदा ॥ ९ ॥ तमक्षमदसम्मत्तं सुहृदां न तु कश्चन । निवारणेऽभवच्छक्तो दीव्यमानमरिंदमम् ॥ १० ॥ तब कलियुगसे आविष्ट होकर राजा नल हिरण्य, सुवर्ण, रथ आदि वाहन और बहुमूल्य वस्त्र दाँवपर लगाते तथा हार जाते थे। सुहृदोंमें कोई भी ऐसा नहीं था, जो द्यूतक्रीड़ाके मदसे उन्मत्त शत्रुदमन नलको उस समय जूआ खेलनेसे रोक सके ॥ ९-१० ॥ ततः पौरजनाः सर्वे मन्त्रिभिः सह भारत । राजानं द्रष्टुमागच्छन् निवारयितुमातुरम् ॥ ११ ॥ भारत! तदनन्तर समस्त पुरवासी मनुष्य मन्त्रियोंके साथ राजासे मिलने तथा उन आतुर नरेशको द्यूतक्रीडासे रोकनेके लिये वहाँ आये ॥ ११ ॥ ततः सूत उपागम्य दमयन्त्यै न्यवेदयत् । एष पौरजनो देवि द्वारि तिष्ठति कार्यवान् ॥ १२ ॥ इसी समय सारथिने महलमें जाकर महारानी दमयन्तीसे निवेदन किया—'देवि! ये पुरवासीलोग कार्यवश राजद्वारपर खड़े हैं ॥ १२ ॥ निवेद्यतां नैषधाय सर्वाः प्रकृतयः स्थिताः । अमृष्यमाणा व्यसनं राज्ञो धर्मार्थदर्शिनः ॥ १३ ॥ 'आप निषधराजसे निवेदन कर दें। धर्म-अर्थका तत्त्व जाननेवाले महाराजके भावी संकटको सहन न कर सकनेके कारण मन्त्रियोंसहित सारी प्रजा द्वारपर खड़ी है' ॥ १३ ॥ ततः सा बाष्पकलया वाचा दुःखेन कर्शिता । उवाच नैषधं भैमी शोकोपहतचेतना ॥ १४ ॥ यह सुनकर दुःखसे दुर्बल हुई दमयन्तीने शोकसे अचेत-सी होकर आँसू बहाते हुए गद्गदवाणीमें निषध-नरेशसे कहा— ॥ १४ ॥