भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 421

राजन् पौरजनो द्वारि त्वां दिदृक्षुरवस्थितः । मन्त्रिभिः सहितः सर्वै राजभक्तिपुरस्कृतः ॥ १५ ॥ तं द्रष्टुमर्हसीत्येवं पुनः पुनरभाषत । तं तथा रुचिरापाङ्गीं विलपन्तीं तथाविधाम् ॥ १६ ॥ आविष्टः कलिना राजा नाभ्यभाषत किंचन । ततस्ते मन्त्रिणः सर्वे ते चैव पुरवासिनः ॥ १७ ॥ नायमस्तीति दुःखार्ता व्रीडिता जग्मुरालयान् । तथा तदभवद् द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च । युधिष्ठिर बहून् मासान् पुण्यश्लोकस्त्वजीयत ॥ १८ ॥ ‘महाराज! पुरवासी प्रजा राजभक्तिपूर्वक आपसे मिलनेके लिये समस्त मन्त्रियोंके साथ द्वारपर खड़ी है। आप उन्हें दर्शन दें।' दमयन्तीने इन वाक्योंको बार-बार दुहराया। मनोहर नयनप्रान्तवाली विदर्भ-कुमारी इस प्रकार विलाप करती रह गयी, परंतु कलियुगसे आविष्ट हुए राजाने उससे कोई बाततक न की। तब वे सब मन्त्री और पुरवासी दुःखसे आतुर और लज्जित हो यह कहते हुए अपने-अपने घर चले गये कि ‘यह राजा नल अब राज्यपर अधिक समयतक रहनेवाला नहीं है।' युधिष्ठिर! पुष्कर और नलकी वह द्यूतक्रीडा