भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 417, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 417

अस्माभिः समनुज्ञाते दमयन्त्या नलो वृतः ॥ ७ ॥ कलियुगके ऐसा कहनेपर देवताओंने उत्तर दिया—'दमयन्तीने हमारी आज्ञा लेकर नलका वरण किया है॥ का च सर्वगुणोपेतं नाश्रयेत नलं नृपम् । यो वेद धर्मानखिलान् यथावच्चरितव्रतः ॥ ८ ॥ योऽधीते चतुरो वेदान् सर्वानारव्यानपञ्चमान् । नित्यं तृप्ता गृहे यस्य देवा यज्ञेषु धर्मतः । अहिंसानिरतो यश्च सत्यवादी दृढव्रतः ॥ ९ ॥ यस्मिन् दाक्ष्यं धृतिर्ज्ञानं तपः शौचं दमः शमः । ध्रुवाणि पुरुषव्याघ्रे लोकपालसमे नृपे ॥ १० ॥ एवंरूपं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले । आत्मानं स शपेन्मूढो हन्यादात्मानमात्मना ॥ ११ ॥ 'राजा नल सर्वगुणसम्पन्न हैं। कौन स्त्री उनका वरण नहीं करेगी? जिन्होंने भलीभाँति ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके चारों वेदों तथा पंचम वेद समस्त इतिहास-पुराणका भी अध्ययन किया है, जो सब धर्मोंको जानते हैं, जिनके घरपर पंचयज्ञोंमें धर्मके अनुसार सम्पूर्ण देवता नित्य तृप्त होते हैं, जो अहिंसा-परायण, सत्यवादी तथा दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं, जिन नरश्रेष्ठ लोकपाल-सदृश तेजस्वी नलमें दक्षता, धैर्य, ज्ञान, तप, शौच, शम और दम आदि गुण नित्य निवास करते हैं। कले! ऐसे राजा नलको जो मूढ़ शाप देनेकी इच्छा रखता है, वह मानो अपनेको ही शाप देता है। अपने द्वारा अपना ही विनाश करता है॥ ८—११ ॥

एवंगुणं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले । कृच्छ्रे स नरके मज्जेदगाधे विपुले ह्रदे । एवमुक्त्वा कलिं देवा द्वापरं च दिवं ययुः ॥ १२ ॥ 'ऐसे सद्गुणसम्पन्न महाराज नलको जो शाप देनेकी कामना करेगा, वह कष्टसे भरे हुए अगाध एवं विशाल नरककुण्डमें निमग्न होगा।' कलियुग और द्वापरसे ऐसा कहकर देवतालोग स्वर्गमें चले गये ॥ १२ ॥

ततो गतेषु देवेषु कलिर्द्वापरमब्रवीत् । संहर्तुं नोत्सहे कोपं नले वत्स्यामि द्वापर ॥ १३ ॥ भ्रंशयिष्यामि तं राज्यान्न भैम्या सह रंस्यते । त्वमप्यक्षान् समाविश्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥ १४ ॥ तदनन्तर देवताओंके चले जानेपर कलियुगने द्वापरसे कहा—'द्वापर! मैं अपने क्रोधका उपसंहार नहीं कर सकता। नलके भीतर निवास करूँगा और उन्हें राज्यसे वंचित

महाभारत (खंड २) - वन पर्व · पृष्ठ 417, कुल 2580 में से · BharatKosha