महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 416, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
देवताओंके द्वारा नलके गुणोंका गान और उनके निषेध करनेपर भी नलके विरुद्ध कलियुगका कोप
बृहदश्व उवाच
वृते तु नैषधे भैम्या लोकपाला महौजसः ।
यान्तो ददृशुरायान्तं द्वापरं कलिना सह ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं— राजन्! भीमकुमारी दमयन्तीद्वारा निषधनरेश नलका वरण हो जानेपर जब महातेजस्वी लोकपालगण स्वर्गलोकको जा रहे थे, उस समय मार्गमें उन्होंने देखा कि कलियुगके साथ द्वापर आ रहा है ॥ १ ॥
अथाब्रवीत् कलिं शक्रः सम्प्रेक्ष्य बलवृत्रहा ।
द्वापरेण सहायेन कले ब्रूहि क्व यास्यसि ॥ २ ॥
कलियुगको देखकर बल और वृत्रासुरका नाश करनेवाले इन्द्रने पूछा— 'कले! बताओ तो सही द्वापरके साथ कहाँ जा रहे हो?' ॥ २ ॥
ततोऽब्रवीत् कलिः शक्रं दमयन्त्याः स्वयंवरम् ।
गत्वा हि वरयिष्ये तां मनो हि मम तां गतम् ॥ ३ ॥
तब कलिने इन्द्रसे कहा— 'देवराज! मैं दमयन्तीके स्वयंवरमें जाकर उसका वरण करूँगा; क्योंकि मेरा मन उसके प्रति आसक्त हो गया है' ॥ ३ ॥
तमब्रवीत् प्रहस्येन्द्रो निवृत्तः स स्वयंवरः ।
वृतस्तया नलो राजा पतिरस्मत्समीपतः ॥ ४ ॥
तब इन्द्रने हँसकर कहा— 'वह स्वयंवर तो हो गया। हमारे समीप ही दमयन्तीने राजा नलको अपना पति चुन लिया ॥ ४ ॥
एवमुक्तस्तु शक्रेण कलिः कोपसमन्वितः ।
देवानान्त्र्य तान् सर्वानुवाचेदं वचस्तदा ॥ ५ ॥
इन्द्रके ऐसा कहनेपर कलियुगको क्रोध चढ़ आया और उसी समय उसने उन सब देवताओंको सम्बोधित करके यह बात कही— ॥ ५ ॥
देवानां मानुषं मध्ये यत् सा पतिमविन्दत ।
ततस्तस्या भवेन्न्याय्यं विपुलं दण्डधारणम् ॥ ६ ॥
'दमयन्तीने देवताओंके बीचमें मनुष्यका पतिरूपमें वरण किया है। अतः उसे बड़ा भारी दण्ड देना उचित प्रतीत होता है' ॥ ६ ॥
एवमुक्ते तु कलिना प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः ।