महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब वे सब मन्त्री राजा नलका आदेश जानकर 'हमारा अहोभाग्य है', ऐसा कहते हुए नलके पास आये ।। तास्तु सर्वाः प्रकृतयो द्वितीयं समुपस्थिताः । न्यवेदयद् भीमसुता न च तत् प्रत्यनन्दत ।। ७ ।। वे सारी (मन्त्री आदि) प्रकृतियाँ दूसरी बार राजद्वारपर उपस्थित हुईं। दमयन्तीने इसकी सूचना महाराज नलको दी, परन्तु उन्होंने इस बातका अभिनन्दन नहीं किया ।। ७ ।। वाक्यमप्रतिनन्दन्तं भर्तारमभिवीक्ष्य सा । दमयन्ती पुनर्वेश्म व्रीडिता प्रविवेश ह ।। ८ ।। निशम्य सततं चाक्षान् पुण्यश्लोकपराङ्मुखान् । नलं च हृतसर्वस्वं धात्रीं पुनरुवाच ह ।। ९ ।। बृहत्सेने पुनर्गच्छ वार्ष्णेयं नलशासनात् । सूतमानय कल्याणि महत् कार्यमुपस्थितम् ।। १० ।। पतिको अपनी बातका प्रसन्नतापूर्वक उत्तर देते न देख दमयन्ती लज्जित हो पुनः महलके भीतर चली गयी। वहाँ फिर उसने सुना कि सारे पासे लगातार पुण्यश्लोक राजा नलके विपरीत पड़ रहे हैं और उनका सर्वस्व अपहृत हो रहा है। तब उसने पुनः धायसे कहा—'बृहत्सेने! फिर राजा नलकी आज्ञासे जाओ और वार्ष्णेय सूतको बुला लाओ। कल्याणि! एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है' ।। ८—१० ।। बृहत्सेना तु सा श्रुत्वा दमयन्त्याः प्रभाषितम् । वार्ष्णेयमानयामास पुरुषैराप्तकारिभिः ।। ११ ।। वार्ष्णेयं तु ततो भैमी सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा । उवाच देशकालज्ञा प्राप्तकालमनिन्दिता ।। १२ ।। बृहत्सेनाने दमयन्तीकी बात सुनकर विश्वसनीय पुरुषोंद्वारा वार्ष्णेयको बुलाया। तब अनिन्द्य स्वभाववाली और देश-कालको जाननेवाली भीमकुमारी दमयन्तीने वार्ष्णेयको मधुर वाणीमें सान्त्वना देते हुए यह समयोचित बात कही— ।। ११-१२ ।। जानीषे त्वं यथा राजा सम्यग् वृत्तः सदा त्वयि । तस्य त्वं विषमस्थस्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि ।। १३ ।। 'सूत! तुम जानते हो कि महाराज तुम्हारे प्रति कैसा अच्छा बर्ताव करते थे। आज वे विषम संकटमें पड़ गये हैं, अतः तुम्हें भी उनकी सहायता करनी चाहिये ।। १३ ।। यथा यथा हि नृपतिः पुष्करेणैव जीयते । तथा तथास्य वै द्यूते रागो भूयोऽभिवर्धते ।। १४ ।। 'राजा जैसे-जैसे पुष्करसे पराजित हो रहे हैं, वैसे-ही-वैसे जूएमेंग उनकी आसक्ति बढ़ती जा रही है ।।