महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 425, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयथा च पुष्करस्याक्षाः पतन्ति वशवर्तिनः । तथा विपर्ययश्चापि नलस्याक्षेषु दृश्यते ॥ १५ ॥ ‘जैसे पुष्करके पासे उसकी इच्छाके अनुसार पड़ रहे हैं, वैसे ही नलके पासे विपरीत पड़ते देखे जा रहे हैं ॥ १५ ॥ सुहृत्स्वजनवाक्यानि यथावन्न शृणोति च । ममापि च तथा वाक्यं नाभिनन्दति मोहितः ॥ १६ ॥ नूनं मन्ये न दोषोऽस्ति नैषधस्य महात्मनः । यत् तु मे वचनं राजा नाभिनन्दति मोहितः ॥ १७ ॥ ‘वे सुहृदों और स्वजनोंके वचन अच्छी तरह नहीं सुनते हैं। जूएने उन्हें ऐसा मोहित कर रखा है कि इस समय वे मेरी बातका भी आदर नहीं कर रहे हैं। मैं इसमें महामना नैषधका निश्चय ही कोई दोष नहीं मानती। जूएसे मोहित होनेके कारण ही राजा मेरी बातका अभिनन्दन नहीं कर रहे हैं ॥ १६-१७ ॥ शरणं त्वां प्रपन्नास्मि सारथे कुरु मद्द्वचः । न हि मे शुध्यते भावः कदाचित् विनशेदपि ॥ १८ ॥ ‘सारथे! मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ, मेरी बात मानो। मेरे मनमें अशुभ विचार आते हैं, इससे अनुमान होता है कि राजा नलका राज्यसे च्युत होना सम्भव है ॥ १८ ॥ नलस्य दयितानश्वान् योजयित्वा मनोजवान् । इदमारोप्य मिथुनं कुण्डिनं यातुमर्हसि ॥ १९ ॥ ‘तुम महाराजके प्रिय, मनके समान वेगशाली अश्वोंको रथमें जोतकर उसपर इन दोनों बच्चोंको बिठा लो और कुण्डिनपुरको चले जाओ’ ॥ १९ ॥ मम ज्ञातिषु निक्षिप्य दारकौ स्यन्दनं तथा । अश्वांश्चैमान् यथाकामं वस वान्यत्र गच्छ वा ॥ २० ॥ ‘वहाँ इन दोनों बालकोंको, इस रथको और इन घोड़ोंको भी मेरे भाई-बन्धुओंकी देख-रेखमें सौंपकर तुम्हारी इच्छा हो तो वहीं रह जाना या अन्यत्र कहीं चले जाना’ ॥ २० ॥ दमयन्त्यास्तु तद् वाक्यं वार्ष्णेयो नलसारथिः । न्यवेदयदशेषेण नलामात्येषु मुख्यशः ॥ २१ ॥ दमयन्तीकी यह बात सुनकर नलके सारथि वार्ष्णेयने नलके मुख्य-मुख्य मन्त्रियोंसे यह सारा वृत्तान्त निवेदित किया ॥ २१ ॥ तैः समेत्य विनिश्चित्य सोऽनुज्ञातो महीपते । ययौ मिथुनमारोप्य विदर्भांस्तेन वाहिना ॥ २२ ॥ राजन्! उनसे मिलकर इस विषयपर भलीभाँति विचार करके उन मन्त्रियोंकी आज्ञा ले सारथि वार्ष्णेयने दोनों बालकोंको रथपर बैठाकर विदर्भ देशको प्रस्थान किया ॥ २२ ॥ हयांस्तत्र विनिक्षिप्य सूतो रथवरं च तम् ।