भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 43

'कितने ही मनुष्योंके लिये अर्थ ही अनर्थका कारण बन जाता है; क्योंकि अर्थद्वारा सिद्ध होनेवाले श्रेय (सांसारिक भोग)-में आसक्त मनुष्य वास्तविक कल्याणको नहीं प्राप्त होता ।। ४१ ।। तस्मादर्थागमाः सर्वे मनोमोहविवर्धनाः । कार्पण्यं दर्पमानौ च भयमुद्वेग एव च ।। ४२ ।। अर्थजानि विदुः प्राज्ञाः दुःखान्येतानि देहिनाम् । अर्थस्योत्पादने चैव पालने च तथा क्षये ।। ४३ ।। सहन्ति च महद् दुःखं घ्नन्ति चैवार्थकारणात् । अर्था दुःखं परित्यक्तुं पालिताश्चैव शत्रवः ।। ४४ ।। 'इसलिये धन-प्राप्तिके सभी उपाय मनमें मोह बढ़ानेवाले हैं। कृपणता, घमण्ड, अभिमान, भय और उद्वेग इन्हें विद्वानोंने देहधारियोंके लिये धनजनित दुःख माना है। धनके उपार्जन, संरक्षण तथा व्ययमें मनुष्य महान् दुःख सहन करते हैं और धनके ही कारण एक-दूसरेको मार डालते हैं। धनको त्यागनेमें भी महान् दुःख होता है और यदि उसकी रक्षा की जाय तो वह शत्रु का-सा काम करता है* ।। ४२—४४ ।। दुःखेन चाधिगम्यन्ते तस्मान्नाशं न चिन्तयेत् । असंतोषपरा मूढाः संतोषं यान्ति पण्डिताः ।। ४५ ।। 'धनकी प्राप्ति भी दुःखसे ही होती है। इसलिये उसका चिन्तन न करे; क्योंकि धनकी चिन्ता करना अपना नाश करना है। मूर्ख मनुष्य सदा असंतुष्ट रहते हैं और विद्वान् पुरुष संतुष्ट ।। ४५ ।। अन्तो नास्ति पिपासायाः संतोषः परमं सुखम् । तस्मात् संतोषमेवेह परं पश्यन्ति पण्डिताः ।। ४६ ।। 'धनकी प्यास कभी बुझती नहीं है; अतः संतोष ही परम सुख है। इसीलिये ज्ञानीजन संतोषको ही सबसे उत्तम समझते हैं ।। ४६ ।। अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं रत्नसंचयः । ऐश्वर्यं प्रियसैंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डितः ।। ४७ ।। 'यौवन, रूप, जीवन, रत्नोंका संग्रह, ऐश्वर्य तथा प्रियजनोंका एकत्र निवास—ये सभी अनित्य हैं; अतः विद्वान् पुरुष उनकी अभिलाषा न करे ।। ४७ ।। त्यजेत संचयांस्तस्मात्तज्जान् क्लेशान् सहेत च । न हि संचयवान् कश्चिद् दृश्यते निरुपद्रवः । अतश्च धार्मिकैः पुंभिरनीहार्थः प्रशस्यते ।। ४८ ।। 'इसलिये धन-संग्रहका त्याग करे और उसके त्यागसे जो क्लेश हो, उसे धैर्यपूर्वक सह ले। जिनके पास धनका संग्रह है, ऐसा कोई भी मनुष्य उपद्रवरहित नहीं देखा जाता। अतः