भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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धर्मात्मा पुरुष उसी धनकी प्रशंसा करते हैं जो दैवेच्छासे न्यायपूर्वक स्वतः प्राप्त हो गया हो ॥ ४८ ॥

धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता ।
प्रक्षालनाद्धि पंकस्य श्रेयो न स्पर्शनं नृणाम् ॥ ४९ ॥
‘जो धर्म करनेके लिये धनोपार्जनकी इच्छा करता है उसका धनकी इच्छा न करना ही अच्छा है। कीचड़ लगाकर धोनेकी अपेक्षा मनुष्योंके लिये उसका स्पर्श न करना ही श्रेष्ठ है ॥ ४९ ॥

युधिष्ठिरैवं सर्वेषु न स्पृहां कर्तुमर्हसि ।
धर्मेण यदि ते कार्यं विमुक्तेच्छो भवार्थतः ॥ ५० ॥
‘युधिष्ठिर! इस प्रकार आपके लिये किसी भी वस्तुकी अभिलाषा करनी उचित नहीं है। यदि आपको धर्मसे ही प्रयोजन हो तो धनकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर दें’ ॥ ५० ॥

युधिष्ठिर उवाच

नार्थोपभोगलिप्सार्थमियमर्थेप्सुता मम ।
भरणार्थं तु विप्राणां ब्रह्मन् काङ्क्षे न लोभतः ॥ ५१ ॥
युधिष्ठिरने कहा— ब्रह्मन्! मैं जो धन चाहता हूँ वह इसलिये नहीं कि मुझे धनसम्बन्धी भोग भोगनेकी इच्छा है। मैं तो ब्राह्मणोंके भरण-पोषणके लिये ही धनकी इच्छा रखता हूँ, लोभवश नहीं ॥ ५१ ॥

कथं ह्यस्मद्विधो ब्रह्मन् वर्तमानो गृहाश्रमे ।
भरणं पालनं चापि न कुर्यादनुयायिनाम् ॥ ५२ ॥
विप्रवर! गृहस्थ-आश्रममें रहनेवाला मेरे-जैसा पुरुष अपने अनुयायियोंका भरण-पोषण भी न करे, यह कैसे उचित हो सकता है? ॥ ५२ ॥

संविभागो हि भूतानां सर्वेषामेव दृश्यते ।
तथैवापचमानेभ्यः प्रदेयं गृहमेधिना ॥ ५३ ॥
गृहस्थके भोजनमें देवता, पितर, मनुष्य एवं समस्त प्राणियोंका हिस्सा देखा जाता है। गृहस्थका यह धर्म है कि वह अपने हाथसे भोजन न बनानेवाले संन्यासी आदिको अवश्य पका-पकाया अन्न दे ॥ ५३ ॥

तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता ।
सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ ५४ ॥
आसनके लिये तृण (कुश), बैठनेके लिये स्थान, जल और चौथी मधुर वाणी, सत्पुरुषोंके घरमें इन चार वस्तुओंका अभाव कभी नहीं होता ॥ ५४ ॥

देयमार्तस्य शयनं स्थितश्रान्तस्य चासनम् ।
तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य च भोजनम् ॥ ५५ ॥