भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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रोग आदिसे पीड़ित मनुष्यको सोनेके लिये शय्या, थके-माँदे हुएको बैठनेके लिये आसन, प्यासेको पानी और भूखेको भोजन तो देना ही चाहिये ॥ ५५ ॥

चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्यात् सुभाषिताम् ।
उत्थाय चासनं दद्यादेष धर्मः सनातनः ।
प्रत्युत्थायाभिगमनं कुर्यान्न्यायेन चार्चनम् ॥ ५६ ॥
जो अपने घरपर आ जाय, उसे प्रेमभरी दृष्टिसे देखे, मनसे उसके प्रति उत्तम भाव रखे, उससे मीठे वचन बोले और उठकर उसके लिये आसन दे। यह गृहस्थका सनातन धर्म है। अतिथिको आते देख उठकर उसकी अगवानी और यथोचित रीतिसे उसका आदर-सत्कार करे ॥ ५६ ॥

अग्निहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातयोऽतिथिबान्धवाः ।
पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च निर्दहेयुरपूजिताः ॥ ५७ ॥
यदि गृहस्थ मनुष्य अग्निहोत्र, साँड, जाति-भाई, अतिथि-अभ्यागत, बन्धु-बान्धव, स्त्री-पुत्र तथा भृत्यजनोंका आदर-सत्कार न करे तो वे अपनी क्रोधाग्निसे उसे जला सकते हैं ॥ ५७ ॥

आत्मार्थं पाचयेन्नान्नं न वृथा घातयेत् पशून् ।
न च तत् स्वयमश्रीयाद् विधिवद् यन्न निर्वपेत् ॥ ५८ ॥
केवल अपने लिये अन्न न पकावे (देवता-पितरों एवं अतिथियोंके उद्देश्यसे ही भोजन बनानेका विधान है), निकम्मे पशुओंकी भी हिंसा न करे और जिस वस्तुको विधिपूर्वक देवता आदिके लिये अर्पित न करे, उसे स्वयं भी न खाय ॥ ५८ ॥

श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च वयोभ्यश्चावपेद् भुवि ।
वैश्वदेवं हि नामैतत् सायं प्रातश्च दीयते ॥ ५९ ॥
कुत्तों, चाण्डालों और कौवोंके लिये पृथ्वीपर अन्न डाल दे। यह वैश्वदेव नामक महान् यज्ञ है, जिसका अनुष्ठान प्रातःकाल और सायंकालमें भी किया जाता है ॥ ५९ ॥

विघसाशी भवेत् तस्मान्नित्यं चामृतभोजनः ।
विघसो भुक्तशेषं तु यज्ञशेषं तथामृतम् ॥ ६० ॥
अतः गृहस्थ मनुष्य प्रतिदिन विघस एवं अमृत भोजन करे। घरके सब लोगोंके भोजन कर लेनेपर जो अन्न शेष रह जाय उसे ‘विघस’ कहते हैं तथा बलि-वैश्वदेवसे बचे हुए अन्नका नाम ‘अमृत’ है ॥ ६० ॥

चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद् वाचं दद्याच्च सूनृताम् ।
अनुव्रजेदुपासीत स यज्ञः पञ्चदक्षिणः ॥ ६१ ॥
अतिथिको नेत्र दे (उसे प्रेमभरी दृष्टिसे देखे), मन दे (मनसे हित-चिन्तन करे) तथा मधुर वाणी प्रदान करे (सत्य, प्रिय, हितकी बात कहे)। जब वह जाने लगे तब कुछ दूरतक