भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 458

'भगवन्! क्या आपके इस रमणीय तपोवनमें निषधनरेश नल आये थे? ब्रह्मन्! जिनके लिये मैं व्याघ्र, सिंह आदि पशुओंसे सेवित अत्यन्त दारुण, भयंकर, घोर वनमें आयी हूँ॥ ८७-८८ ॥

यदि कैश्चिदहोरात्रैर्न द्रक्ष्यामि नलं नृपम् । आत्मानं श्रेयसा योक्ष्ये देहस्यास्य विमोचनात् ॥ ८९ ॥ 'यदि कुछ ही दिन-रातमें मैं राजा नलको नहीं देखूँगी तो इस शरीरका परित्याग करके आत्माका कल्याण करूँगी ॥ ८९ ॥

को नु मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम् । कथं भविष्याम्यद्याहं भर्तृशोकाभिपीडिता ॥ ९० ॥ 'उन पुरुषरत्न नलके बिना जीवन धारण करनेसे मेरा क्या प्रयोजन है? अब मैं पतिशोकसे पीड़ित होकर न जाने कैसी हो जाऊँगी?' ॥ ९० ॥

तथा विलपतीमेकामरण्ये भीमनन्दिनीम् । दमयन्तीमथोचुस्ते तापसाः सत्यदर्शिनः ॥ ९१ ॥ इस प्रकार वनमें अकेली विलाप करती हुई भीमनन्दिनी दमयन्तीसे सत्यका दर्शन करनेवाले उन तपस्वियोंने कहा— ॥ ९१ ॥

उदर्कस्तव कल्याणि कल्याणो भविता शुभे । वयं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ॥ ९२ ॥ 'कल्याणि! शुभे! हम अपने तपोबलसे देख रहे हैं, तुम्हारा भविष्य परम कल्याणमय होगा। तुम शीघ्र ही निषधनरेश नलका दर्शन प्राप्त करोगी ॥ ९२ ॥

निषधानामधिपतिं नलं रिपुनिपातिनम् । भैमि धर्मभृतां श्रेष्ठं द्रक्ष्यसे विगतज्वरम् ॥ ९३ ॥ 'भीमकुमारी! तुम शत्रुओंका संहार करनेवाले निषधदेशके अधिपति और धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा नलको सब प्रकारकी चिन्ताओंसे रहित देखोगी ॥ ९३ ॥

विमुक्तं सर्वपापेभ्यः सर्वरत्नसमन्वितम् । तदेव नगरं श्रेष्ठं प्रशासतमरिंदमम् ॥ ९४ ॥ द्विषतां भयकर्तारं सुहृदां शोकनाशनम् । पतिं द्रक्ष्यसि कल्याणि कल्याणाभिजनं नृपम् ॥ ९५ ॥ 'तुम्हारे पति सब प्रकारके पापजनित दुःखोंसे मुक्त और सम्पूर्ण रत्नोंसे सम्पन्न होंगे। शत्रुदमन राजा नल फिर उसी श्रेष्ठ नगरका शासन करेंगे। वे शत्रुओंके लिये भयदायक और सुहृदोंके लिये शोकका नाश करनेवाले होंगे। कल्याणि! इस प्रकार सत्कुलमें उत्पन्न अपने पतिको तुम (नरेशके पदपर प्रतिष्ठित) देखोगी' ॥ ९४-९५ ॥

एवमुक्त्वा नलस्येष्टां महिषीं पार्थिवात्मजाम् । अन्तर्हितास्तापसास्ते साग्निहोत्राश्रमास्तथा ॥ ९६ ॥