महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 459, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंनलकी प्रियतमा महारानी राजकुमारी दमयन्तीसे ऐसा कहकर वे सभी तपस्वी अग्निहोत्र और आश्रमसहित अदृश्य हो गये ॥ ९६ ॥
सा दृष्ट्वा महदाश्चर्यं विस्मिता ह्यभवत् तदा ।
दमयन्त्यनवद्याङ्गी वीरसेननृपस्नुषा ॥ ९७ ॥
उस समय राजा वीरसेनकी पुत्रवधू सर्वाङ्गसुन्दरी दमयन्ती वह महान् आश्चर्यकी बात देखकर बड़े विस्मयमें पड़ गयी ॥ ९७ ॥
किं नु स्वप्नो मया दृष्टः कोऽयं विधिरिहाभवत् ।
क्व नु ते तापसाः सर्वे क्व तदाश्रममण्डलम् ॥ ९८ ॥
(उसने सोचा—) 'क्या मैंने कोई स्वप्न देखा है? यहाँ यह कैसी अद्भुत घटना हो गयी? वे सब तपस्वी कहाँ चले गये और वह आश्रममण्डल कहाँ है?' ॥ ९८ ॥
क्व सा पुण्यजला रम्या नदी द्विजनिषेविता ।
क्व नु ते ह नगा हृद्याः फलपुष्पोपशोभिताः ॥ ९९ ॥
'वह पुण्यसलिला रमणीय नदी, जिसपर पक्षी निवास कर रहे थे, कहाँ चली गयी? फल और फूलोंसे सुशोभित वे मनोरम वृक्ष कहाँ विलीन हो गये!' ॥ ९९ ॥
ध्यात्वा चिरं भीमसुता दमयन्ती शुचिस्मिता ।
भर्तृशोकपरा दीना विवर्णवदनाभवत् ॥ १०० ॥
पवित्र मुसकानवाली भीमपुत्री दमयन्ती बहुत देरतक इन सब बातोंपर विचार करती रही। तत्पश्चात् वह पतिशोकपरायण और दीन हो गयी तथा उसके मुखपर उदासी छा गयी ॥ १०० ॥
सा गत्वाथापरां भूमिं बाष्पसंदिग्धया गिरा ।
विललापाश्रुपूर्णाक्षी दृष्ट्वाशोकतरुं ततः ॥ १०१ ॥
उपगम्य तरुश्रेष्ठमशोकं पुष्पितं वने ।
पल्लवापीडितं हृद्यं विहङ्गैरनुनादितम् ॥ १०२ ॥
तदनन्तर वह दूसरे स्थानपर जाकर अश्रुगद्गद वाणीसे विलाप करने लगी। उसने आँसू भरे नेत्रोंसे देखा, वहाँसे कुछ ही दूरपर एक अशोकका वृक्ष था। दमयन्ती उसके पास गयी। वह तरुवर अशोक-फूलोंसे भरा था। उस वनमें पल्लवोंसे लदा हुआ और पक्षियोंके कलरवोंसे गुंजायमान वह वृक्ष बड़ा ही मनोरम जान पड़ता था ॥ १०१-१०२ ॥
अहो बतायमगमः श्रीमानस्मिन् वनान्तरे ।
आपीडैर्बहुभिर्भाति श्रीमान् पर्वतराडिव ॥ १०३ ॥
(उसे देखकर वह मन-ही-मन कहने लगी—) 'अहो! इस वनके भीतर यह अशोक बड़ा ही सुन्दर है। यह अनेक प्रकारके फल, फूल आदि अलंकारोंसे अलंकृत सुन्दर गिरिराजकी भाँति सुशोभित हो रहा है' ॥ १०३ ॥
विशोकां कुरु मां क्षिप्रमशोक प्रियदर्शन ।