महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 460, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंवीतशोकभयाबाधं कच्चित् त्वं दृष्टवान् नृपम् ॥ १०४ ॥ नलं नामारिदमनं दमयन्त्याः प्रियं पतिम् । निषधानामधिपतिं दृष्टवानसि मे प्रियम् ॥ १०५ ॥ (अब उसने अशोकसे कहा—) ‘प्रियदर्शन अशोक! तुम शीघ्र ही मेरा शोक दूर कर दो। क्या तुमने शोक, भय और बाधासे रहित शत्रुदमन राजा नलको देखा है? क्या मेरे प्रियतम, दमयन्तीके प्राणवल्लभ, निषधनरेश नलपर तुम्हारी दृष्टि पड़ी है? ॥ १०४-१०५ ॥
एकवस्त्रार्धसंवीतं सुकुमारतनुत्वचम् । व्यसनेनार्दितं वीरमरण्यमिदमागतम् ॥ १०६ ॥ ‘उन्होंने एक साड़ीके आधे टुकड़ेसे अपने शरीरको ढँक रखा है, उनके अंगोंकी त्वचा बड़ी सुकुमार है। वे वीरवर नल भारी संकटसे पीड़ित होकर इस वनमें आये हैं ॥ १०६ ॥
यथा विशोका गच्छेयमशोकनग तत् कुरु । सत्यनामा भवाशोक अशोकः शोकनाशनः ॥ १०७ ॥ ‘अशोकवृक्ष! तुम ऐसा करो, जिससे मैं यहाँसे शोकरहित होकर जाऊँ। अशोक उसे कहते हैं, जो शोकका नाश करनेवाला हो, अतः अशोक! तुम अपने नामको सत्य एवं सार्थक करो’ ॥ १०७ ॥
एवं साशोकवृक्षं तमार्ता वै परिगम्य ह । जगाम दारुणतरं देशं भैमी वराङ्गना ॥ १०८ ॥ इस प्रकार शोकार्त हुई सुन्दरी दमयन्ती उस अशोकवृक्षकी परिक्रमा करके वहाँसे अत्यन्त भयंकर स्थानकी ओर गयी ॥ १०८ ॥
सा ददर्श नगान् नैकान् नैकाश्च सरितस्तथा । नैकांश्च पर्वतान् रम्यान् नैकांश्च मृगपक्षिणः ॥ १०९ ॥ कन्दरांश्च नितम्बांश्च नदीश्चाद्भुतदर्शनाः । ददर्श तान् भीमसुता पतिमन्वेषती तदा ॥ ११० ॥ गत्वा प्रकृष्टमध्वानं दमयन्ती शुचिस्मिता । ददर्शाथ महासार्थं हस्त्यश्वरथसंकुलम् ॥ १११ ॥ उत्तरन्तं नदीं रम्यां प्रसन्नसलिलां शुभाम् । सुशीततोयां विस्तीर्णां हृदिनीं वेतसैर्वृताम् ॥ ११२ ॥ उसने अनेक प्रकारके वृक्ष, अनेकानेक सरिताओं, बहुसंख्यक रमणीय पर्वतों, अनेक मृग-पक्षियों, पर्वतकी कन्दराओं तथा उनके मध्यभागों और अद्भुत नदियोंको देखा। पतिका अन्वेषण करनेवाली दमयन्तीने उस समय पूर्वोक्त सभी वस्तुओंको देखा। इस तरह बहुत दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके बाद पवित्र मुसकानवाली दमयन्तीने एक बहुत बड़े सार्थ (व्यापारियोंके दल)-को देखा, जो हाथी, घोड़े तथा रथसे व्याप्त था। वह व्यापारियोंका