भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 461

समूह स्वच्छ जलसे सुशोभित एक सुन्दर रमणीय नदीको पार कर रहा था। नदीका जल बहुत ठंडा था। उसका पाट चौड़ा था। उसमें कई कुण्ड थे और वह किनारेपर उगे हुए बेंतके वृक्षोंसे आच्छादित हो रही थी ॥ १०९—११२ ॥

प्रोद्घुष्टां क्रौञ्चकुररैश्चक्रवाकोपकूजिताम् । कूर्मग्राहझषाकीर्णां विपुलद्वीपशोभिताम् ॥ ११३ ॥

उसके तटपर क्रौंच, कुरर और चक्रवाक आदि पक्षी कूज रहे थे। कछुए, मगर और मछलियोंसे भरी हुई वह नदी विस्तृत टापूसे सुशोभित हो रही थी ॥ ११३ ॥

सा दृष्ट्वैव महासार्थं नलपत्नी यशस्विनी । उपसर्प्य वरारोहा जनमध्यं विवेश ह ॥ ११४ ॥

उस बहुत बड़े समूहको देखते ही यशस्विनी नलपत्नी सुन्दरी दमयन्ती उसके पास पहुँच कर लोगोंकी भीड़में घुस गयी ॥ ११४ ॥

उन्मत्तरूपा शोकार्ता तथा वस्त्रार्धसंवृता । कृशा विवर्णा मलिना पांसुध्वस्तशिरोरुहा ॥ ११५ ॥

उसका रूप उन्मत्त स्त्रीका-सा जान पड़ता था, वह शोकसे पीड़ित, दुर्बल, उदास और मलिन हो रही थी। उसने आधे वस्त्रसे अपने शरीरको ढक रखा था और उसके केशोंपर धूल जम गयी थी ॥ ११५ ॥

तां दृष्ट्वा तत्र मनुजाः केचिद् भीताः प्रदुद्रुवुः । केचिच्चिन्तापरा जग्मुः केचित् तत्र विचुक्रुशुः ॥ ११६ ॥

वहाँ दमयन्तीको सहसा देखकर कितने ही मनुष्य भयसे भाग खड़े हुए। कोई-कोई भारी चिन्तामें पड़ गये और कुछ लोग तो चीखने-चिल्लाने लगे ॥ ११६ ॥

प्रहसन्ति स्म तां केचिदभ्यसूयन्ति चापरे । अकुर्वत दयां केचित् पप्रच्छुश्चापि भारत ॥ ११७ ॥

कुछ लोग उसकी हँसी उड़ाते थे और कुछ उसमें दोष देख रहे थे। भारत! उन्हींमें कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें उसपर दया आ गयी और उन्होंने उसका समाचार पूछा — ॥ ११७ ॥

कासि कस्यासि कल्याणि किं वा मृगयसे वने । त्वां दृष्ट्वा व्यथिताः स्मेह कच्चित् त्वमसि मानुषी ॥ ११८ ॥

'कल्याणि! तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो और इस वनमें क्या खोज रही हो? तुम्हें देखकर हम बहुत दुःखी हैं। क्या तुम मानवी हो? ॥ ११८ ॥

वद सत्यं वनस्यास्य पर्वतस्याथवा दिशः । देवता त्वं हि कल्याणि त्वां वयं शरणं गताः ॥ ११९ ॥

'कल्याणि! सच बताओ, तुम इस वन, पर्वत अथवा दिशाकी अधिष्ठात्री देवी तो नहीं हो? हम सब लोग तुम्हारी शरणमें आये हैं ॥ ११९ ॥