महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 462, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंयक्षी वा राक्षसी वा त्वमुताहोऽसि वराङ्गना । सर्वथा कुरु नः स्वस्ति रक्ष वास्माननिन्दिते ॥ १२० ॥ यथायं सर्वथा सार्थः क्षेमी शीघ्रमितो व्रजेत् । तथा विधत्स्व कल्याणि यथा श्रेयो हि नो भवेत् ॥ १२१ ॥ 'तुम यक्षी हो या राक्षसी अथवा कोई श्रेष्ठ देवांगना हो? अनिन्दिते! सर्वथा हमारा कल्याण एवं संरक्षण करो। कल्याणि! यह हमारा समूह शीघ्र कुशलपूर्वक यहाँसे चला जाय और हमलोगोंका सब प्रकारसे भला हो, ऐसी कृपा करो' ॥ १२०-१२१ ॥ तथोक्ता तेन सार्थेन दमयन्ती नृपात्मजा । प्रत्युवाच ततः साध्वी भर्तृव्यसनपीडिता ॥ १२२ ॥ उस यात्रीदलके द्वारा जब ऐसी बात कही गयी, तब पतिके वियोगजनित दुःखसे पीड़ित साध्वी राजकुमारी दमयन्तीने उन सबको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ १२२ ॥ सार्थवाहं च सार्थं च जना ये चात्र केचन । युवस्थविरबालाश्च सार्थस्य च पुरोगमाः ॥ १२३ ॥ मानुषीं मां विजानीत मनुजाधिपतेः सुताम् । नृपस्नुषां राजभार्यां भर्तृदर्शनलालसाम् ॥ १२४ ॥ 'इस जनसमुदायके जो सरदार हों, उनसे, इस जनसमूहसे तथा इसके (भीतर रहनेवाले और) आगे चलनेवाले जो बाल-वृद्ध और युवक मनुष्य हों, उन सबसे मेरा यह कहना है कि आप सब लोग मुझे मानवी समझें। मैं एक नरेशपुत्री, महाराजकी पुत्रवधू तथा राजपत्नी हूँ। अपने स्वामीके दर्शनकी इच्छासे इस वनमें भटक रही हूँ ॥ १२३-१२४ ॥ विदर्भराण्मम पिता भर्ता राजा च नैषधः । नलो नाम महाभागस्तं मृग्याम्यपराजितम् ॥ १२५ ॥ 'विदर्भराज भीम मेरे पिता हैं, निषधनरेश महाभाग राजा नल मेरे पति हैं। मैं उन्हीं अपराजित वीर नलकी खोज कर रही हूँ ॥ १२५ ॥ यदि जानीत नृपतिं क्षिप्रं शंसत मे प्रियम् । नलं पुरुषशार्दूलममित्रगणसूदनम् ॥ १२६ ॥ 'यदि आपलोग शत्रुसमूहका संहार करनेवाले मेरे प्रियतम पुरुषसिंह महाराज नलके विषयमें कुछ जानते हों तो शीघ्र बतावें' ॥ १२६ ॥ तामुवाचानवद्याङ्गीं सार्थस्य महतः प्रभुः । सार्थवाहः शुचिर्नाम शृणु कल्याणि मद्वचः ॥ १२७ ॥ उस महान् समूहका मालिक और समस्त यात्रीदलका संचालक (वणिक्) शुचिनामसे प्रसिद्ध था। उसने उस सुन्दरीसे कहा—'कल्याणि! मेरी बात सुनो'— ॥ १२७ ॥ अहं सार्थस्य नेता वै सार्थवाहः शुचिस्मिते । मनुष्यं नलनामानं न पश्यामि यशस्विनि ॥ १२८ ॥