महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 466, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिहतोष्ट्राश्वबहुलाः पदातिजनसंकुलाः । भयादाधावमानाश्च परस्परहतास्तदा ॥ १३ ॥ घोरान् नादान् विमुञ्चन्तो निपेतुर्धरणीतले । वृक्षेष्वारुह्य संरब्धाः पतिता विषमेषु च ॥ १४ ॥ उनके बहुत-से ऊँट और घोड़े मारे गये और उस समुदायमें बहुत-से पैदल लोग भी थे। वे सब लोग उस समय भयसे चारों ओर भागते हुए एक-दूसरेसे टकराकर चोट खा जाते थे। घोर आर्तनाद करते हुए सभी लोग धरतीपर गिरने लगे। कुछ लोग बड़े वेगसे वृक्षोंपर चढ़ते हुए नीचेकी विषम भूमियोंपर गिर पड़ते थे ॥ १३-१४ ॥
एवं प्रकारैर्बहुभिर्देवेनाक्रम्य हस्तिभिः । राजन् विनिहतं सर्वं समृद्धं सार्थमण्डलम् ॥ १५ ॥ राजन्! इस प्रकार दैववश बहुतेरे जंगली हाथियोंने आक्रमण करके (प्रायः) उस सम्पूर्ण समृद्धिशाली व्यापारियोंके समुदायको नष्ट कर दिया ॥ १५ ॥
आरावः सुमहांश्चासीत् त्रैलोक्यभयकारकः । एषोऽग्निरुत्थितः कष्टस्त्रायध्वं धावताधुना ॥ १६ ॥ रत्नराशिविशीर्णोऽयं गृह्णीध्वं किं प्रधावत ।