महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउस समय वहाँ तीनों लोकोंको भयमें डालनेवाला महान् आर्तनाद एवं चीत्कार हो रहा था। कोई कहता—‘अरे! इधर बड़े जोरकी आग प्रज्वलित हो उठी है। यह भारी संकट आ गया (अब) दौड़ो और बचाओ।’ दूसरा कहता—‘अरे! ये ढेर-के-ढेर रत्न बिखरे पड़े हैं, इन्हें सँभालकर रखो। इधर-उधर भागते क्यों हो?’ ।। १६½ ।। सामान्यमेतद् द्रविणं न मिथ्यावचनं मम ।। १७ ।। तीसरा कहता था—‘भाई! इस धनपर सबका समान अधिकार है, मेरी यह बात झूठी नहीं है’ ।। १७ ।। एवमेवाभिभाषन्तो विद्रवन्ति भयात् तदा । पुनरेवाभिधास्यामि चिन्तयध्वं सुकातराः ।। १८ ।। कोई कहता—‘ऐ कायरो! मैं फिर तुमसे बात करूँगा, अभी अपनी रक्षाकी चिन्ता करो।’ इस तरहकी बातें करते हुए सब लोग भयसे भाग रहे थे ।। १८ ।। तस्मिंस्तथा वर्तमाने दारुणे जनसंक्षये । दमयन्ती च बुबुधे भयसंत्रस्तमानसा ।। १९ ।। इस प्रकार जब वहाँ भयानक नरसंहार हो रहा था, उसी समय दमयन्ती भी जाग उठी। उसका हृदय भयसे संत्रस्त हो उठा ।। १९ ।। अपश्यद् वैशसं तत्र सर्वलोकभयंकरम् । अदृष्टपूर्वं तद् दृष्ट्वा बाला पद्मनिभेक्षणा ।। २० ।। संसक्तवदनाश्वासा उत्तस्थौ भयविह्वला । ये तु तत्र विनिर्मुक्ताः सार्थात् केचिदविक्षताः ।। २१ ।। तेऽब्रुवन् सहिताः सर्वे कस्येदं कर्मणः फलम् । नूनं न पूजितोऽस्माभिर्मणिभद्रो महायशाः ।। २२ ।। तथा यक्षाधिपः श्रीमान् न वै वैश्रवणः प्रभुः । न पूजा विघ्नकर्तॄणामथवा प्रथमं कृता ।। २३ ।। शकुनानां फलं वाथ विपरीतमिदं ध्रुवम् । ग्रहा न विपरीतास्तु किमन्यदिदमागतम् ।। २४ ।। वहाँ उसने वह महासंहार अपनी आँखों देखा, जो सब लोगोंके लिये भयंकर था। उसने ऐसी दुर्घटना पहले कभी नहीं देखी थी। यह सब देखकर वह कमलनयनी बाला भयसे व्याकुल हो उठी। उसको कहींसे कोई सान्त्वना नहीं मिल रही थी। वह इस प्रकार स्तब्ध हो रही थी, मानो धरतीसे सट गयी हो। तदनन्तर वह किसी प्रकार उठकर खड़ी हुई। दलके जो लोग उस संकटसे मुक्त हो आघातसे बचे हुए थे, वे सब एकत्र हो कहने लगे कि ‘यह हमारे किस कर्मका फल है? निश्चय ही हमने महायशस्वी मणिभद्रका पूजन नहीं किया है। इसी प्रकार हमने श्रीमान् यक्षराज कुबेरकी भी पूजा नहीं की है अथवा विघ्नकर्ता विनायकोंकी भी पहले पूजा नहीं कर ली थी। अथवा हमने पहले जो-जो शकुन देखे थे, उसका यह