महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविपरीत फल है। यदि हमारे ग्रह विपरीत न होते तो और किस हेतुसे यह संकट हमारे ऊपर कैसे आ सकता था?' ।। २०—२४ ।।
अपरे त्वब्रुवन् दीना ज्ञातिद्रव्यविनाकृताः ।
यासावद्य महासार्थे नारी ह्युन्मत्तदर्शना ।। २५ ।।
प्रविष्टा विकृताकारा कृत्वा रूपममानुषम् ।
तयेयं विहिता पूर्वं माया परमदारुणा ।। २६ ।।
दूसरे लोग जो अपने कुटुम्बीजनों और धनके विनाशसे दीन हो रहे थे, वे इस प्रकार कहने लगे—'आज हमारे विशाल जनसमूहके साथ वह जो उन्मत्त-जैसी दिखायी देनेवाली नारी आ गयी थी, वह विकराल आकारवाली राक्षसी थी तो भी अलौकिक सुन्दर रूप धारण करके हमारे दलमें घुस गयी थी। उसीने पहलेसे ही यह अत्यन्त भयंकर माया फैला रखी थी ।। २५-२६ ।।
राक्षसी वा ध्रुवं यक्षी पिशाची वा भयंकरी ।
तस्याः सर्वमिदं पापं नात्र कार्या विचारणा ।। २७ ।।
पश्यामो यदि तां पापां सार्थघ्नीं नैकदुःखदाम् ।
लोष्ठभिः पांसुभिश्चैव तृणैः काष्ठैश्च मुष्टिभिः ।। २८ ।।
अवश्यमेव हन्यामः सार्थस्य किल कृत्यकाम् ।
'निश्चय ही वह राक्षसी, यक्षी अथवा भयंकर पिशाची थी—इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं कि यह सारा पापपूर्ण कृत्य उसीका किया हुआ है। उसने हमें अनेक प्रकारका दुःख दिया और प्रायः सारे दलका विनाश कर डाला। वह पापिनी समूचे सार्थके लिये अवश्य ही कृत्या बनकर आयी थी। यदि हम उसे देख लेंगे तो ढेलोंसे, धूल और तिनकोंसे, लकड़ियों और मुक्कोंसे भी अवश्य मार डालेंगे ।। २७-२८ १/२ ।।
दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा वाक्यं तेषां सुदारुणम् ।। २९ ।।
ह्रीता भीता च संविग्ना प्राद्रवद् यत्र काननम् ।
आशङ्कमाना तत्पापमात्मानं पर्यदेवयत् ।। ३० ।।
'उनका वह अत्यन्त भयंकर वचन सुनकर दमयन्ती लज्जासे गड़ गयी और भयसे व्याकुल हो उठी। उनके पापपूर्ण संकल्पके संघटित होनेकी आशंका करके वह उसी ओर भाग गयी, जहाँ घना जंगल था। वहाँ जाकर अपनी इस परिस्थितिपर विचार करके वह विलाप करने लगी— ।। २९-३० ।।
अहो ममोपरि विधेः संरम्भो दारुणो महान् ।
नानुबध्नाति कुशलं कस्येदं कर्मणः फलम् ।। ३१ ।।
'अहो! मुझपर विधाताका अत्यन्त भयानक और महान् कोप है, जिससे मुझे कहीं भी कुशल-क्षेमकी प्राप्ति नहीं होती। न जाने, यह हमारे किस कर्मका फल है? ।। ३१ ।।
न स्मराम्यशुभं किंचित् कृतं कस्यचिदण्वपि ।