महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 469, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्मणा मनसा वाचा कस्येदं कर्मणः फलम् ॥ ३२ ॥
‘मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी किसीका थोड़ा-सा भी अमंगल किया हो, इसकी याद नहीं आती, फिर यह मेरे किस कर्मका फल मिल रहा है? ॥ ३२ ॥
नूनं जन्मान्तरकृतं पापमापतितं महत् ।
अपश्चिमामिमां कष्टामापदं प्राप्तवत्यहम् ॥ ३३ ॥
‘निश्चय ही यह मेरे दूसरे जन्मोंके किये हुए पापका महान् फल प्राप्त हुआ है, जिससे मैं इस अनन्त कष्टमें पड़ गयी हूँ ॥ ३३ ॥
भर्तृराज्यापहरणं स्वजनाच्च पराजयः ।
भर्त्रा सह वियोगश्च तनयाभ्यां च विच्युतिः ॥ ३४ ॥
‘मेरे स्वामीके राज्यका अपहरण हुआ, उन्हें आत्मीयजनसे ही पराजित होना पड़ा, मेरा अपने पतिदेवसे वियोग हुआ और अपनी संतानोंके दर्शनसे भी वंचित हो गयी हूँ ॥ ३४ ॥
निर्नाथता वने वासो बहुव्यालनिषेविते ।
‘इतना ही नहीं, असंख्य सर्प आदि जन्तुओंसे भरे हुए इस वनमें मुझे अनाथकी-सी दशामें रहना पड़ता है' ॥
अथापरेद्युः सम्प्राप्ते हतशिष्टा जनास्तदा ॥ ३५ ॥
देशात् तस्माद् विनिष्क्रम्य शोचन्ते वैशसं कृतम् ।
भ्रातरं पितरं पुत्रं सखायं च नराधिप ॥ ३६ ॥
तदनन्तर दूसरा दिन प्रारम्भ होनेपर मरनेसे बचे हुए लोग उस स्थानसे निकलकर उस विकट संहारके लिये शोक करने लगे। राजन्! कोई भाईके लिये दुःखी था, कोई पिताके लिये; किसीको पुत्रका शोक था और किसीको मित्रका ॥ ३५-३६ ॥
अशोचत् तत्र वैदर्भी किं नु मे दुष्कृतं कृतम् ।
योऽपि मे निर्जनेऽरण्ये सम्प्राप्तोऽयं जनार्णवः ॥ ३७ ॥
स हतो हस्तियूथेन मन्दभाग्यान्ममैव तत् ।
प्राप्तव्यं सुचिरं दुःखं नूनमद्यापि वै मया ॥ ३८ ॥
विदर्भराजकुमारी दमयन्ती भी इसके लिये शोक करने लगी कि ‘मैंने कौन-सा पाप किया है, जिससे इस निर्जन वनमें मुझे जो यह समुद्रके समान जनसमुदाय प्राप्त हो गया था, वह भी मेरे ही दुर्भाग्यसे हाथियोंके झुंडद्वारा मारा गया। निश्चय ही मुझे अभी दीर्घकालतक दुःख-ही-दुःख भोगना है ॥ ३७-३८ ॥
नाप्राप्तकालो म्रियते श्रुतं वृद्धानुशासनम् ।
या नाहमद्य मृदिता हस्तियूथेन दुःखिता ॥ ३९ ॥
‘जिसकी मृत्युका समय नहीं आया है, वह इच्छा होते हुए भी मर नहीं सकता। वृद्ध पुरुषोंका यह जो उपदेश मैंने सुन रखा है, यह ठीक ही जान पड़ता है, तभी तो आज मैं