भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 470

दुःखित होनेपर भी हाथियोंके झुंडसे कुचलकर मर न सकी ॥ ३९ ॥
न ह्यदैवकृतं किंचिन्नराणामिह विद्यते ।
न च मे बालभावेऽपि किंचित् पापकृतं कृतम् ॥ ४० ॥
कर्मणा मनसा वाचा यदिदं दुःखमागतम् ।
‘मनुष्योंको इस जगत्में कोई भी सुख या दुःख ऐसा नहीं मिलता, जो विधाताका दिया हुआ न हो। मैंने बचपनमें भी मन, वाणी अथवा क्रियाद्वारा ऐसा पाप नहीं किया है, जिससे मुझे यह दुःख प्राप्त होता ॥ ४० १/२ ॥
मन्ये स्वयंवरकृते लोकपालाः समागताः ॥ ४१ ॥
प्रत्याख्याता मया तत्र नलस्यार्थाय देवताः ।
नूनं तेषां प्रभावेण वियोगं प्राप्तवत्यहम् ॥ ४२ ॥
एवमादीनि दुःखार्ता सा विलप्य वराङ्गना ।
प्रलापानि तदा तानि दमयन्ती पतिव्रता ॥ ४३ ॥
‘मैं समझती हूँ, स्वयंवरके लिये जो लोकपाल देवगण पधारे थे, नलके कारण मैंने उनका तिरस्कार कर दिया था। अवश्य उन्हीं देवताओंके प्रभावसे आज मुझे वियोगका कष्ट प्राप्त हुआ है।’ इस प्रकार दुःखसे आतुर हुई सुन्दरी पतिव्रता दमयन्तीने उस समय अनेक प्रकारसे विलाप एवं प्रलाप किये ॥ ४१—४३ ॥
हतशेषैः सह तदा ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।
अगच्छद् राजशार्दूल चन्द्रलेखेव शारदी ॥ ४४ ॥
गच्छन्ती साचिराद् बाला पुरमासादयन्महत् ।
सायाह्ने चेदिराजस्य सुबाहोः सत्यदर्शिनः ॥ ४५ ॥
नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर मरनेसे बचे हुए वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ यात्रा करती हुई शरत्कालके चन्द्रमाकी कलाके समान वह सुन्दरी युवती थोड़े ही समयमें संध्या होते-होते सत्यदर्शी चेदिराज सुबाहुकी राजधानीमें जा पहुँची ॥ ४४-४५ ॥
अथ वस्त्रार्धसंवीता प्रविवेश पुरोत्तमम् ।
तं विह्वलां कृशां दीनां मुक्तकेशीममार्जिताम् ॥ ४६ ॥
शरीरमें आधी साड़ीको लपेटे हुए ही उसने उस उत्तम नगरमें प्रवेश किया। वह विह्वल, दीन और दुर्बल हो रही थी। उसके सिरके बाल खुले हुए थे। उसने स्नान नहीं किया था ॥ ४६ ॥
उन्मत्तामिव गच्छन्तीं ददृशुः पुरवासिनः ।
प्रविशन्तीं तु तां दृष्ट्वा चेदिराजपुरीं तदा ॥ ४७ ॥
अनुजग्मुस्तत्र बाला ग्रामिपुत्राः कुतूहलात् ।
सा तैः परिवृतागच्छत् समीपं राजवेश्मनः ॥ ४८ ॥