महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुरवासियोंने उसे उन्मत्ताकी भाँति जाते देखा। चेदिनरेशकी राजधानीमें उसे प्रवेश करते देख उस समय बहुत-से ग्रामीण बालक कौतूहलवश उसके साथ हो लिये थे। उनसे घिरी हुई दमयन्ती राजमहलके समीप गयी॥ ४७-४८॥
तां प्रासादगतापश्यद् राजमाता जनैर्वृताम्।
धात्रीमुवाच गच्छैनामानयेह ममान्तिकम् ॥ ४९ ॥
उस समय राजमाताने उसे महलपरसे देखा। वह जनसाधारणसे घिरी हुई थी। राजमाताने धायसे कहा—‘जाओ, इस युवतीको मेरे पास ले आओ ॥ ४९ ॥
जनेन क्लिश्यते बाला दुःखिता शरणार्थिनी।
तादृग् रूपं च पश्यामि विद्योतयति मे गृहम् ॥ ५० ॥
‘इसे लोग तंग कर रहे हैं। यह दुःखिनी युवती कोई आश्रय चाहती है। मुझे इसका रूप ऐसा दिखायी देता है, जो मेरे घरको प्रकाशित कर देगा ॥ ५० ॥
उन्मत्तवेषा कल्याणी श्रीरिवायतलोचना।
सा जनं वारयित्वा तं प्रासादतलमुत्तमम् ॥ ५१ ॥
आरोप्य विस्मिता राजन् दमयन्तीमपृच्छत।
एवमप्यसुखाविष्टा बिभर्षि परमं वपुः ॥ ५२ ॥
‘इसका वेष तो उन्मत्तके समान है, परंतु यह विशाल नेत्रोंवाली युवती कल्याणमयी लक्ष्मीके समान जान पड़ती है।' धाय उन सब लोगोंको हटाकर उसे उत्तम राजमहलकी अट्टालिकापर चढ़ा ले आयी। राजन्! तत्पश्चात् विस्मित होकर राजमाताने दमयन्तीसे पूछा—‘अहो! तुम इस प्रकार दुःखसे दबी होनेपर भी इतना सुन्दर रूप कैसे धारण करती हो? ॥ ५१-५२ ॥