भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 472

भासि विद्युदिवाभ्रेषु शंस मे कासि कस्य वा ।
न हि ते मानुषं रूपं भूषणैरपि वर्जितम् ॥ ५३ ॥
असहाया नरेभ्यश्च नोद्विजस्यमरप्रभे ।
‘मेघमालामें प्रकाशित होनेवाली बिजलीकी भाँति तुम इस दुःखमें भी कैसी तेजस्विनी दिखायी देती हो। मुझसे बताओ, तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो? यद्यपि तुम्हारे शरीरपर कोई आभूषण नहीं है तो भी तुम्हारा यह रूप मानव-जगत्का नहीं जान पड़ता। देवताकी-सी दिव्य कान्ति धारण करनेवाली वत्से! तुम असहाय-अवस्थामें होकर भी लोगोंसे डरती क्यों नहीं?’ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या भैमी वचनमब्रवीत् ॥ ५४ ॥
उसकी वह बात सुनकर भीमकुमारीने कहा— ॥ ५४ ॥
मानुषीं मां विजानीहि भर्तारं समनुव्रताम् ।
सैरन्ध्रीजातिसम्पन्नां भुजिष्यां कामवासिनीम् ॥ ५५ ॥
‘माताजी! आप मुझे मानव-कन्या ही समझिये। मैं अपने पतिके चरणोंमें अनुराग रखनेवाली एक नारी हूँ। मेरी अन्तःपुरमें काम करनेवाली सैरन्ध्री जाति है। मैं सेविका हूँ और जहाँ इच्छा होती है, वहीं रहती हूँ ॥
फलमूलाशनामेकां यत्रसायंप्रतिश्रयाम् ।
असंख्येयगुणो भर्ता मां च नित्यमनुव्रतः ॥ ५६ ॥