भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 47

तस्यौत्सुक्यं सम्भवति प्रवृत्तिश्चोपजायते ॥ ६८ ॥ मन जिस इन्द्रियके विषयोंका सेवन करने जाता है, उसीमें उस विषयके प्रति उत्सुकता भर जाती है और वह इन्द्रिय उस विषयके उपभोगमें प्रवृत्त हो जाती है ॥ ६८ ॥ ततः संकल्पबीजेन कामेन विषयेषुभिः । विद्धः पतति लोभाग्नौ ज्योतिर्लोभात् पतङ्गवत् ॥ ६९ ॥ तदनन्तर संकल्प ही जिसका बीज है, उस कामके द्वारा विषयरूपी बाणोंसे बिंधकर मनुष्य ज्योतिके लोभसे पतंगकी भाँति लोभकी आगमें गिर पड़ता है ॥ ६९ ॥ ततो विहारैराहारैर्मोहितश्च यथेप्सया । महामोहे सुखे मग्नो नात्मानमवबुध्यते ॥ ७० ॥ इसके बाद इच्छानुसार आहार-विहारसे मोहित हो महामोहमय सुखमें निमग्न रहकर वह मनुष्य अपने आत्माके ज्ञानसे वंचित हो जाता है ॥ ७० ॥ एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु । अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत् ॥ ७१ ॥ इस प्रकार अविद्या, कर्म और तृष्णाद्वारा चक्रकी भाँति भ्रमण करता हुआ मनुष्य संसारकी विभिन्न योनियोंमें गिरता है ॥ ७१ ॥ ब्रह्मादिषु तृणान्तेषु भूतेषु परिवर्तते । जले भुवि तथाऽऽकाशे जायमानः पुनः पुनः ॥ ७२ ॥ फिर तो ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सभी प्राणियोंमें तथा जल, भूमि और आकाशमें वह मनुष्य बारंबार जन्म लेकर चक्कर लगाता रहता है ॥ ७२ ॥ अबुधानां गतिस्त्वेषा बुधानामपि मे शृणु । ये धर्मे श्रेयसि रता विमोक्षरत्तयो जनाः ॥ ७३ ॥ यह अविवेकी पुरुषोंकी गति बतायी गयी है। अब आप मुझसे विवेकी पुरुषोंकी गतिका वर्णन सुनें। जो धर्म एवं कल्याणमार्गमें तत्पर हैं और मोक्षके विषयमें जिनका निरन्तर अनुराग है, वे विवेकी हैं ॥ ७३ ॥ तदिदं वेदवचनं कुरु कर्म त्यजेति च । तस्माद् धर्मानिमान् सर्वान् नाभिमानात् समाचरेत् ॥ ७४ ॥ वेदकी यह आज्ञा है कि कर्म करो और कर्म छोड़ो; अतः आगे बताये जानेवाले इन सभी धर्मोंका अहंकारशून्य होकर अनुष्ठान करना चाहिये ॥ ७४ ॥ इज्याध्ययनदानानि तपः सत्यं क्षमा दमः । अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥ ७५ ॥ यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, मन और इन्द्रियोंका संयम तथा लोभका परित्याग—ये धर्मके आठ मार्ग हैं ॥ ७५ ॥ अत्र पूर्वश्चतुर्वर्गः पितृयाणपथे स्थितः ।