महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्तव्यमिति यत् कार्यं नाभिमानात् समाचरेत् ॥ ७६ ॥ इनमें पहले बताये हुए चार धर्म पितृयानके मार्गमें स्थित हैं; अर्थात् इन चारोंका सकामभावसे अनुष्ठान करनेपर ये पितृयानमार्गसे ले जाते हैं। अग्निहोत्र और संध्योपासनादि जो अवश्य करनेयोग्य कर्म हैं, उन्हें कर्तव्य-बुद्धिसे ही अभिमान छोड़कर करे ॥ ७६ ॥
उत्तरो देवयानस्तु सद्भिराचरितः सदा । अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत् ॥ ७७ ॥ अन्तिम चार धर्मोंको देवयानमार्गका स्वरूप बताया गया है। साधु पुरुष सदा उसी मार्गका आश्रय लेते हैं। आगे बताये जानेवाले आठ अंगोंसे युक्त मार्गद्वारा अपने अन्तःकरणको शुद्ध करके कर्तव्य-कर्मोंका कर्तृत्वके अभिमानसे रहित होकर पालन करे ॥ ७७ ॥
सम्यक्संकल्पसम्बन्धात् सम्यक् चेन्द्रियनिग्रहात् । सम्यग्व्रतविशेषाच्च सम्यक् च गुरुसेवनात् ॥ ७८ ॥ सम्यगाहारयोगाच्च सम्यक् चाध्ययनागमात् । सम्यक्कर्मोपसंन्यासात् सम्यक् चित्तनिरोधनात् ॥ ७९ ॥ पूर्णतया संकल्पोंको एक ध्येयमें लगा देनेसे, इन्द्रियोंको भली प्रकार वशमें कर लेनेसे, अहिंसादि व्रतोंका अच्छी प्रकार पालन करनेसे, भली प्रकार गुरुकी सेवा करनेसे, यथायोग्य योगसाधनोपयोगी आहार करनेसे, वेदादिका भली प्रकार अध्ययन करनेसे, कर्मोंको भलीभाँति भगवत्समर्पण करनेसे और चित्तका भली प्रकार निरोध करनेसे मनुष्य परम कल्याणको प्राप्त होता है ॥ ७८-७९ ॥
एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषवः । रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्यं देवता गताः ॥ ८० ॥ संसारको जीतनेकी इच्छावाले बुद्धिमान् पुरुष इसी प्रकार राग-द्वेषसे मुक्त होकर कर्म करते हैं। इन्हीं नियमोंके पालनसे देवतालोग ऐश्वर्यको प्राप्त हुए हैं ॥ ८० ॥
रुद्राः साध्यास्तथाऽऽदित्या वसवोऽथ तथाश्विनौ । योगैश्वर्येण संयुक्ता धारयन्ति प्रजा इमाः ॥ ८१ ॥ रुद्र, साध्य, आदित्य, वसु तथा दोनों अश्विनीकुमार योगजनित ऐश्वर्यसे युक्त होकर इन प्रजाजनोंका धारण-पोषण करते हैं ॥ ८१ ॥
तथा त्वमपि कौन्तेय शममास्थाय पुष्कलम् । तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत ॥ ८२ ॥ कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार आप भी मन और इन्द्रियोंको भलीभाँति वशमें करके तपस्याद्वारा सिद्धि तथा योगजनित ऐश्वर्य प्राप्त करनेकी चेष्टा कीजिये ॥ ८२ ॥
पितृमातृमयी सिद्धिः प्राप्ता कर्ममयी च ते ।