भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 474

देख सकी हूँ और न उनका पता ही पा रही हूँ' ।। ६३ ।। तामश्रुपरिपूर्णाक्षीं विलपन्तीं तथा बहु । राजमाताब्रवीदार्ता भैमीमार्तस्वरां स्वयंम् ।। ६४ ।। वसस्व मयि कल्याणि प्रीतिर्मे परमा त्वयि । मृगयिष्यन्ति ते भद्रे भर्तारं पुरुषा मम ।। ६५ ।। भीमकुमारी दमयन्तीके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे एवं वह आर्तस्वरसे बहुत विलाप कर रही थी। राजमाता स्वयं भी उसके दुःखसे दुःखी हो बोली—'कल्याणि! तुम मेरे पास रहो। तुमपर मेरा बहुत प्रेम है। भद्रे! मेरे सेवक तुम्हारे पतिकी खोज करेंगे ।। ६४-६५ ।। अपि वा स्वयमागच्छेत् परिधावन्नितस्ततः । इहैव वसती भद्रे भर्तारमुपलप्स्यसे ।। ६६ ।। 'अथवा यह भी सम्भव है, वे इधर-उधर भटकते हुए स्वयं ही इधर आ निकलें। भद्रे! तुम यहीं रहकर अपने पतिको प्राप्त कर लोगी' ।। ६६ ।। राजमातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती वचोऽब्रवीत् । समयेनोत्सहे वस्तुं त्वयि वीरप्रजायिनि ।। ६७ ।। राजमाताकी यह बात सुनकर दमयन्तीने कहा—'वीरमातः! मैं एक नियमके साथ आपके यहाँ रह सकती हूँ ।। ६७ ।। उच्छिष्टं नैव भुञ्जीयां न कुर्यां पादधावनम् । न चाहं पुरुषानन्यान् प्रभाषेयं कथंचन ।। ६८ ।। 'मैं किसीका जूठा नहीं खाऊँगी, किसीके पैर नहीं धोऊँगी और किसी भी दूसरे पुरुषसे किसी तरह भी वार्तालाप नहीं करूँगी ।। ६८ ।। प्रार्थयेद् यदि मां कश्चिद् दण्ड्यस्ते स पुमान् भवेत् । वध्यश्च तेऽसकृन्मन्द इति मे व्रतमाहितम् ।। ६९ ।। 'यदि कोई पुरुष मुझे प्राप्त करना चाहे तो वह आपके द्वारा दण्डनीय हो और बार-बार ऐसे अपराध करनेवाले मूढ़को आप प्राणदण्ड भी दें, यही मेरा निश्चित व्रत है ।। ६९ ।। भर्तुरन्वेषणार्थं तु पश्येयं ब्राह्मणानहम् । यद्येवमिह वत्स्यामि त्वत्सकाशे न संशयः ।। ७० ।। 'मैं अपने पतिकी खोजके लिये केवल ब्राह्मणोंसे मिल सकती हूँ। यदि यहाँ ऐसी व्यवस्था हो सके तो निश्चय ही आपके निकट निवास करूँगी। इसमें संशय नहीं है ।। अतोऽन्यथा न मे वासो वर्तते हृदये क्वचित् । तां प्रहृष्टेन मनसा राजमातेदमब्रवीत् ।। ७१ ।। 'यदि इसके विपरीत कोई बात हो तो कहीं भी रहनेका मेरे मनमें संकल्प नहीं हो सकता।' यह सुनकर राजमाता प्रसन्नचित्त होकर उससे बोली— ।। ७१ ।। सर्वमेतत् करिष्यामि दिष्ट्या ते व्रतमीदृशम् ।

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