महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 475, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवमुक्त्वा ततो भैमीं राजमाता विशाम्पते ॥ ७२ ॥ उवाचेदं दुहितरं सुनन्दां नाम भारत । सैरन्ध्रीमभिजानीष्व सुनन्दे देवरूपिणीम् ॥ ७३ ॥ ‘बेटी! मैं यह सब करूँगी। सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा व्रत ऐसा उत्तम है।’ राजा युधिष्ठिर! दमयन्तीसे ऐसा कहकर राजमाता अपनी पुत्री सुनन्दासे बोली—‘सुनन्दे! इस सैरन्ध्रीको तुम देवीस्वरूपा समझो ॥ ७२-७३ ॥
वयसा तुल्यतां प्राप्ता सखी तव भवत्वियम् । एतया सह मोदस्व निरुद्विग्नमनाः सदा ॥ ७४ ॥ ‘यह अवस्थामें तुम्हारे समान है, अतः तुम्हारी सखी होकर रहे। तुम इसके साथ सदा प्रसन्नचित्त एवं आनन्दमग्न रहो’ ॥ ७४ ॥
ततः परमसंहृष्टा सुनन्दा गृहमागमत् । दमयन्तीमुपादाय सखीभिः परिवारिता ॥ ७५ ॥ तब सखियोंसे घिरी हुई सुनन्दा अत्यन्त हर्षोल्लासमें भरकर दमयन्तीको साथ ले अपने भवनमें आयी ॥ ७५ ॥
स तत्र पूज्यमाना वै दमयन्ती व्यनन्दत । सर्वकामैः सुविहितैर्निरुद्वेगावसत् तदा ॥ ७६ ॥ सुनन्दा दमयन्तीके इच्छानुसार सब प्रकारकी व्यवस्था करके उसे बड़े आदर-सत्कारके साथ रखने लगी। इससे दमयन्तीको बड़ी प्रसन्नता हुई और वह वहाँ उद्वेगरहित हो रहने लगी ॥ ७६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीचेदिराजगृहवासे पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीका चेदिराजके भवनमें निवासविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६५ ॥