भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 502

कुशलं चैव मां पृष्ट्वा पश्चादिदमभाषत ।। ७ ।। ‘बाहुकने बार-बार लंबी साँसें खींचकर अनेक बार रोदन किया और मुझसे कुशल-समाचार पूछकर फिर वह इस प्रकार कहने लगा— ।। ७ ।। वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः । आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गो न संशयः ।। ८ ।। ‘उत्तम कुलकी स्त्रियाँ बड़े भारी संकटमें पड़कर भी स्वयं अपनी रक्षा करती हैं। ऐसा करके वे सत्य और स्वर्ग दोनोंपर विजय पा लेती हैं, इसमें संशय नहीं है ।। ८ ।। रहिता भर्तृभिश्चैव न कुप्यन्ति कदाचन । प्राणांश्चारित्रकवचान् धारयन्ति वरस्त्रियः ।। ९ ।। ‘श्रेष्ठ नारियाँ अपने पतियोंसे परित्यक्त होनेपर भी कभी क्रोध नहीं करतीं। वे सदाचाररूपी कवचसे आवृत प्राणोंको धारण करती हैं ।। ९ ।। विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च । यत् सा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोद्धुमर्हति ।। १० ।। ‘वह पुरुष बड़े संकटमें था, सुखके साधनोंसे वंचित होकर किंकर्तव्यविमूढ हो गया था। ऐसी दशामें यदि उसने अपनी पत्नीका परित्याग किया है तो इसके लिये पत्नीको उसपर क्रोध नहीं करना चाहिये ।। १० ।। प्राणयात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैर्हृतवाससः । आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ।। ११ ।। ‘जीविका पानेके लिये चेष्टा करते समय पक्षियोंने जिसके वस्त्रका अपहरण कर लिया था और जो अनेक प्रकारकी मानसिक चिन्ताओंसे दग्ध हो रहा था, उस पुरुषपर श्यामाको क्रोध नहीं करना चाहिये ।। ११ ।। सत्कृतासत्कृता वापि पतिं दृष्ट्वा तथागतम् । भ्रष्टराज्यं श्रिया हीनं क्षुधितं व्यसनाप्लुतम् ।। १२ ।। ‘पतिने उसका सत्कार किया हो या असत्कार—उसे चाहिये कि पतिको वैसे संकटमें पड़ा देखकर उसे क्षमा कर दे; क्योंकि वह राज्य और लक्ष्मीसे वंचित हो भूखसे पीड़ित एवं विपत्तिके अथाह सागरमें डूबा हुआ था’ ।। १२ ।। तस्य तद् वचनं श्रुत्वा त्वरितोऽहमिहागतः । श्रुत्वा प्रमाणं भवती राज्ञश्चैव निवेदय ।। १३ ।। ‘बाहुककी वह बात सुनकर मैं तुरंत यहाँ चला आया। यह सब सुनकर अब कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयमें तुम्हीं प्रमाण हो। (तुम्हारी इच्छा हो तो) महाराजको भी ये बातें सूचित कर दो’ ।। १३ ।। एतच्छ्रुत्वाश्रुपूर्णाक्षी पर्णादस्य विशाम्पते । दमयन्ती रहोऽभ्येत्य मातरं प्रत्यभाषत ।। १४ ।।