महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयुधिष्ठिर! पर्णादका यह कथन सुनकर दमयन्तीके नेत्रोंमें आँसू भर आया। उसने एकान्तमें जाकर अपनी मातासे कहा— ।। १४ ।।
अयमर्थो न संवेद्यो भीमे मातः कदाचन ।
त्वत्संनिधौ नियोक्ष्येऽहं सुदेवं द्विजसत्तमम् ।। १५ ।।
यथा न नृपतिर्भीमः प्रतिपद्येत मे मतम् ।
तथा त्वया प्रकर्तव्यं मम चेत् प्रियमिच्छसि ।। १६ ।।
'माँ! पिताजीको यह बात कदापि मालूम न होनी चाहिये। मैं तुम्हारे ही सामने विप्रवर सुदेवको इस कार्यमें लगाऊँगी। तुम ऐसी चेष्टा करो, जिससे पिताजीको मेरा विचार ज्ञात न हो। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहती हो तो तुम्हें इसके लिये सचेष्ट रहना होगा ।। १५-१६ ।।
यथा चाहं समानीता सुदेवेनाशु बान्धवान् ।
तेनैव मङ्गलेनाशु सुदेवो यातु मा चिरम् ।। १७ ।।
समानेतुं नलं मातरयोध्यां नगरीमितः ।
'जैसे सुदेवने मुझे यहाँ लाकर बन्धु-बान्धवोंसे शीघ्र मिला दिया, उसी मंगलमय उद्देश्यकी सिद्धिके लिये सुदेव ब्राह्मण फिर शीघ्र ही यहाँसे अयोध्या जायँ, देर न करें। माँ! वहाँ जानेका उद्देश्य है, महाराज नलको यहाँ ले आना' ।। १७ १/२ ।।
विश्रान्तं तु ततः पश्चात् पर्णादं द्विजसत्तमम् ।। १८ ।।
अर्चयामास वैदर्भी धनेनातीव भाविनी ।
नले चेहागते तत्र भूयो दास्यामि ते वसु ।। १९ ।।
इतनेहीमें विप्रवर पर्णाद जब विश्राम कर चुके, तब विदर्भराजकुमारी दमयन्तीने बहुत धन देकर उनका सत्कार किया और यह भी कहा—'महाराज नलके यहाँ पधारनेपर मैं आपको और भी धन दूँगी ।। १८-१९ ।।
त्वया हि मे बहु कृतं यदन्यो न करिष्यति ।
यद् भर्त्राहं समेष्यामि शीघ्रमेव द्विजोत्तम ।। २० ।।
'विप्रवर! आपने मेरा बहुत बड़ा उपकार किया, जो दूसरा नहीं कर सकता; क्योंकि अब मैं अपने स्वामीसे शीघ्र ही मिल सकूँगी' ।। २० ।।