भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 538, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 538

दूताश्चरन्ति पृथिवीं कृत्स्नां नृपतिशासनात् । भैमी किल स्म भर्तारं द्वितीयं वरयिष्यति ॥ २३ ॥ 'विदर्भनरेशकी आज्ञासे सारी पृथ्वीपर दूत विचरते हैं और यह घोषणा कर रहे हैं कि दमयन्ती द्वितीय पतिका वरण करेगी ॥ २३ ॥

स्वैरवृत्ता यथाकाममनुरूपमिवात्मनः । श्रुत्वैव चैवं त्वरितो भार्ङ्गासुरिरुपस्थितः ॥ २४ ॥ 'दमयन्ती स्वेच्छाचारिणी है और अपनी रुचिके अनुसार किसी अनुरूप पतिका वरण कर सकती है', यह सुनकर ही राजा ऋतुपर्ण बड़ी उतावलीके साथ यहाँ उपस्थित हुए हैं' ॥ २४ ॥

दमयन्ती तु तच्छ्रुत्वा नलस्य परिदेवितम् । प्राञ्जलिर्वेपमाना च भीता वचनमब्रवीत् ॥ २५ ॥ दमयन्ती नलका यह विलाप सुनकर काँप उठी और भयभीत हो हाथ जोड़कर यह वचन बोली ॥ २५ ॥

दमयन्त्युवाच न मामर्हसि कल्याण दोषेण परिशङ्कितुम् । मया हि देवानुत्सृज्य वृतस्त्वं निषधाधिप ॥ २६ ॥ दमयन्तीने कहा—कल्याणमय निषधनरेश! आपको मुझपर दोषारोपण करते हुए मेरे चरित्रपर संदेह नहीं करना चाहिये। (आपके प्रति अनन्य प्रेमके कारण ही) मैंने देवताओंको छोड़कर आपका वरण किया है ॥ २६ ॥

तवाभिगमनार्थं तु सर्वतो ब्राह्मणा गताः । वाक्यानि मम गाथाभिर्गायमाना दिशो दश ॥ २७ ॥ आपका पता लगानेके लिये ही चारों ओर ब्राह्मणलोग भेजे गये और वे मेरी कही हुई बातोंको सब दिशाओंमें गाथाके रूपमें गाते फिरे ॥ २७ ॥

ततस्त्वां ब्राह्मणो विद्वान् पर्णादो नाम पार्थिव । अभ्यगच्छत् कोसलायामृतुपर्णनिवेशने ॥ २८ ॥ राजन्! इसी योजनाके अनुसार पर्णाद नामक विद्वान् ब्राह्मण अयोध्यापुरीमें ऋतुपर्णके राजभवनमें गये थे ॥

तेन वाक्ये कृते सम्यक् प्रतिवाक्ये तथाऽऽहृते । उपायोऽयं मया दृष्टो नैषधानयने तव ॥ २९ ॥ उन्होंने वहाँ मेरी बात उपस्थित की और वहाँसे आपके द्वारा प्राप्त हुआ ठीक-ठीक उत्तर वे ले आये। निषधराज! इसके बाद आपको यहाँ बुलानेके लिये मुझे यह उपाय सूझा