महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 539, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें(कि एक ही दिनके बाद होनेवाले स्वयंवरका समाचार देकर ऋतुपर्णको बुलाया जाय) ।। २९ ।। त्वामृते न हि लोकेऽन्य एकाह्ना पृथिवीपते । समर्थो योजनशतं गन्तुमश्वैर्नराधिप ।। ३० ।। नरेश्वर! पृथ्वीनाथ! मैं यह अच्छी तरह जानती हूँ कि इस जगत्में आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो एक ही दिनमें घोड़े जुते हुए रथकी सवारीसे सौ योजन दूरतक जानेमें समर्थ हो ।। ३० ।। स्पृशेयं तेन सत्येन पादावेतौ महीपते । यथा नासत्कृतं किंचिन्मनसापि चराम्यहम् ।। ३१ ।। महीपते! मैं मनसे भी कभी कोई असदाचरण नहीं करती हूँ और इसी सत्यकी शपथ खाकर आपके इन दोनों चरणोंका स्पर्श करती हूँ ।। ३१ ।। अयं चरति लोकेऽस्मिन् भूतसाक्षी सदागतिः । एष मे मुञ्चतु प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ।। ३२ ।। ये सदा गतिशील वायुदेवता इस जगत्में निरन्तर विचरते रहते हैं, अतः ये सम्पूर्ण भूतोंके साक्षी हैं। यदि मैंने पाप किया है तो ये मेरे प्राणोंका हरण कर लें ।। ३२ ।। यथा चरति तिग्मांशुः परेण भुवनं सदा । स मुञ्चतु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ।। ३३ ।। प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यदेव समस्त भुवनोंके ऊपर विचरते हैं, (अतः वे भी सबके शुभाशुभ कर्म देखते रहते हैं।) यदि मैंने पाप किया है तो ये मेरे प्राणोंका हरण कर लें ।। ३३ ।। चन्द्रमाः सर्वभूतानामन्तश्चरति साक्षिवत् । स मुञ्चतु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ।। ३४ ।। चित्तके अभिमानी देवता चन्द्रमा समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें साक्षीरूपसे विचरते हैं। यदि मैंने पाप किया है तो वे मेरे प्राणोंका हरण कर लें ।। ३४ ।। एते देवास्त्रयः कृत्स्नं त्रैलोक्यं धारयन्ति वै । विब्रुवन्तु यथा सत्यमेतद् देवास्त्यजन्तु माम् ।। ३५ ।। ये पूर्वोक्त तीन देवता सम्पूर्ण त्रिलोकीको धारण करते हैं। मेरे कथनमें कितनी सच्चाई है, इसे देवतालोग स्वयं स्पष्ट करें। यदि मैं झूठ बोलती हूँ तो देवता मेरा त्याग कर दें ।। ३५ ।। एवमुक्तस्तथा वायुरन्तरिक्षादभाषत । नैषा कृतवती पापं नल सत्यं ब्रवीमि ते ।। ३६ ।।