महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदमयन्तीके ऐसा कहनेपर अन्तरिक्षलोकसे वायु-देवताने कहा—‘नल! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, इस दमयन्तीने कभी कोई पाप नहीं किया है ।। ३६ ।।
राजञ्छीलनिधिः स्फीतो दमयन्त्या सुरक्षितः ।
साक्षिणो रक्षिणश्चास्या वयं त्रीन् परिवत्सरान् ।। ३७ ।।
‘राजन्! दमयन्तीने अपने शीलकी उज्ज्वल निधिको सदा सुरक्षित रखा है। हमलोग तीन वर्षोंतक निरन्तर इसके रक्षक और साक्षी रहे हैं ।। ३७ ।।
उपायो विहितश्चायं त्वदर्थमतुलोऽनया ।
न ह्येकाह्ना शतं गन्ता त्वामृतेऽन्यः पुमानिह ।। ३८ ।।
‘तुम्हारी प्राप्तिके लिये दमयन्तीने यह अनुपम उपाय ढूँढ़ निकाला था; क्योंकि इस जगत्में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं है, जो एक दिनमें सौ योजन (रथद्वारा) जा सके ।। ३८ ।।
उपपन्ना त्वया भैमी त्वं च भैम्या महीपते ।
नात्र शङ्का त्वया कार्या संगच्छ सह भार्यया ।। ३९ ।।
‘राजन्! भीमकुमारी दमयन्ती तुम्हारे योग्य है और तुम दमयन्तीके योग्य हो। तुम्हें इसके चरित्रके विषयमें कोई शंका नहीं करनी चाहिये। तुम अपनी पत्नीसे निःशंक होकर मिलो' ।। ३९ ।।