भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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तरह सजाया गया था। पुरवासियोंके द्वार-द्वारपर सुगंध फैलानेके लिये राशि-राशि फूल बिखेरे गये थे॥ ६-७॥

अर्चितानि च सर्वाणि देवतायतनानि च।
ऋतुपर्णोऽपि शुश्राव बाहुकच्छद्मिनं नलम्॥ ८॥
दमयन्त्या समायुक्तं जहृषे च नराधिपः।
सम्पूर्ण देवमन्दिरोंकी सजावट और देवमूर्तियोंकी पूजा की गयी थी। राजा ऋतुपर्णने भी जब यह सुना कि बाहुकके वेषमें राजा नल ही थे और अब वे दमयन्तीसे मिले हैं, तब उन्हें बड़ा हर्ष हुआ॥ ८ १/२ ॥

तमानाय्य नलं राजा क्षमयामास पार्थिवम्॥ ९॥
उन्होंने राजा नलको बुलवाकर उनसे क्षमा माँगी॥ ९॥

स च तं क्षमयामास हेतुभिर्बुद्धिसम्मितः।
स सत्कृतो महीपालो नैषधं विस्मिताननः॥ १०॥
उवाच वाक्यं तत्त्वज्ञो नैषधं वदतां वरः।
बुद्धिमान् नलने भी अनेक युक्तियोंद्वारा उनसे क्षमा-याचना की। नलसे आदर-सत्कार पाकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ एवं तत्त्वज्ञ राजा ऋतुपर्ण मुसकराते हुए मुखसे बोले—॥ १० १/२ ॥

दिष्ट्या समेतो दारैः स्वैर्भवानित्यभ्यनन्दत॥ ११॥
'निषधनरेश! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आप अपनी बिछुड़ी हुई पत्नीसे मिले।' ऐसा कहकर उन्होंने नलका अभिनन्दन किया॥ ११॥

किंचित् तु नापराधं ते कृतवानस्मि नैषध।
अज्ञातवासे वसतो मद्गृहे वसुधाधिप॥ १२॥
(और पुनः कहा—) 'नैषध! भूपालशिरोमणे! आप मेरे घरपर जब अज्ञातवासकी अवस्थामें रहते थे, उस समय मैंने आपका कोई अपराध तो नहीं किया है?॥ १२॥

यदि वाबुद्धिपूर्वाणि यदि बुद्ध्यापि कानिचित्।
मया कृतान्यकार्याणि तानि त्वं क्षन्तुमर्हसि॥ १३॥
'उन दिनों यदि मैंने बिना जाने या जान-बूझकर आपके साथ अनुचित बर्ताव किये हों तो उन्हें आप क्षमा कर दें'॥ १३॥

नल उवाच

न मेऽपराधं कृतवांस्त्वं स्वल्पमपि पार्थिव।
कृतेऽपि च न मे कोपः क्षन्तव्यं हि मया तव॥ १४॥
नलने कहा—'राजन्! आपने मेरा कभी थोड़ासा भी अपराध नहीं किया है और यदि किया भी हो तो उसके लिये मेरे हृदयमें क्रोध नहीं है। मुझे आपके प्रत्येक बर्तावको क्षमा ही करना चाहिये'॥ १४॥